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सर्कस में नकली शेरखान…

-दिनेशराय द्विवेदी||
आम आदमियों के मुखिया ने सर्कस का शो जारी रहते शेरखान को चिढ़ा कर अनुशासन भंग किया था. शेरखान को चिढ़ाना कोई अनुशासनहीनता नहीं, लेकिन सर्कस का शो शुरू होने के बाद इस की इजाजत नहीं दी जा सकती. आखिर शो के अपने कायदे होते हैं. शो के नजदीक होने से कलाकार प्राणी तनाव में आ जाते हैं तो शो शुरू होने के बाद तो उनका तनाव चरम पर होता है. इस काल में तो ऐसी हरकतें निषिद्ध ही रहनी चाहिए. शेर-रक्षकों ने आम आदमियों की शिकायत शो-प्रबंधक को लिखित में दे दी. सुबह मुखिया सो कर भी न उठा था कि उसे आरोप पत्र मिल गया. वही अब उस की चिन्ता का विषय प्रमुख विषय बना हुआ था.tridc0248.1L

मुखिया कभी वैसे ही सर्कस के पचड़े में नहीं था. उसे खाने कमाने से फुरसत कहां. फिर सर्कस शो के महंगे टिकट, वह तो मनोरंजन के लिए भी सर्कस में घुसने से कतराता था. सर्कस के कलाकारों में शामिल होने की तो कल्पना तक करना उसके लिए निषिद्ध कर्म था. वह तो एक बार मित्र उसे पकड़ कर सर्कस दिखाने ले गए. वहां मूंगफली का पैकेट 25 रुपए का, जिसमें मूंगफली 25 भी नहीं. 17 रुपए वाला कोल्ड ड्रिंक 47 रुपए में. बस वहीं से चिढ़ गया, ये तो सरासर भ्रष्टाचार था. उसे समझ आ रहा था कि सर्कस के बाहर भी महंगाई भ्रष्टाचार के कारण है. बस वहीं से उसे जिद सवार हुई कि इसके खिलाफ तो लड़ना पड़ेगा. अकेले तो लड़ाई नहीं की जा सकती थी, उसके लिए तो लोगों को जोड़ना होगा. तभी से मुखिया लोगों को जोड़ता फिर रहा है. उसने भ्रष्टाचार करने वालों का पता लगाने और उन्हें दंडित करने के कानून की मांग की. बहुत लोग इकट्ठे हो गए. तब लोगों ने उसे चिढ़ाया- कानून ऐसे नहीं बदलता. उसके लिए पहले कुछ कलाएं सीखनी पड़ती हैं, सरकस में भरती होना पड़ता है, पब्लिक को खुश करना पड़ता है, पब्लिक खुश हो जाए तो आपको कानून बनाने का अधिकार दे सकती है.

बात मुखिया को चुभ गई. ठान लिया, कलाकारी भी करेगा, सर्कस में भर्ती भी होगा, पब्लिक को खुश भी करेगा. ये कानून बनाने की ताकत तो हासिल करनी होगी. उसने कोशिश की और सर्कस तक पहुंच गया. एक प्रदेश की राजधानी में उसके शो सफल भी रहे. उसकी खूब चर्चा भी हुई, तारीफ भी और निन्दा भी. पर उसे पसन्द करने वालों की संख्या बढ़ती रही. कुछ कर पाता उसके पहले ही पंचवर्षीय प्रदर्शन का वक्त आ गया. प्रदेश से तम्बू उखाड़ना पड़ा. इस प्रदर्शन में वह बेहतरीन कामयाबी हासिल चाहता है ताकि कानून बनाने की और उसे लागू करने की ताकत हासिल कर सके. बस सर्कस के पुराने जमे हुए घाघ कलाकार उसके रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन बने हुए हैं. इनसे तो निपटना है. निपटने के लिए उन्हें समझना जरूरी है. शेरखान इन दिनों अत्यन्त लोकप्रिय है. तो सबसे पहले वह उसे ही समझने चला. शेरखान का अध्ययन शुरु किया तो उसने देखा कि शेरखान की पूंछ नेचरल तरीके से नहीं हिलती. ऐसे हिलती है जैसे मैकेनिकल हो. उसे लगा कि शेरखान की पूंछ नकली है. यदि शेरखान को पूंछ के लिए चिढ़ाया जाए तो वह जरूर चिढ़ेगा.

तभी तो, उसने शेरखान को चिढ़ाने के लिए कहा था- पूंछ कटा, तेरी पूंछ नकली! शेरखान की चिढ़न और गुस्सा देख कर ही वह समझ गया था कि तीर निशाने पर लगा है. उसे यकीन हो गया कि पूंछ नकली है. शेरखान रक्षक तुरन्त दौड़ कर आए और उसे पकड़ कर डांटने लगने तो उसके संदेह ने विस्तार पाया- कहीं ऐसा तो नहीं कि ये पूरा शेरखान ही नकली है? बस मुखिया से थोड़ी गलती हो गई. शेरखान को चिढ़ाने की उत्तेजना में यह ध्यान ही नहीं रहा कि सर्कस का शो शुरू हो चुका है. रहता भी कैसे? वह कोई धंधेबाज सर्कसी तो है नहीं कि इन सबका रट्टा मार के आता. अब आरोप पत्र मिला है, तो उसका जवाब देंगे. वैसे भी उसका इरादा गलत थोड़े ही था. बिना इरादे के तो अपराध भी अपराध नहीं होता. यह तो अनुशासन का तकनीकी ब्रेक मात्र है. फिर भी, शो में कुछ व्यवधान तो हुआ ही है. शायद इसीलिए प्रबंधक को उसे आरोप पत्र देना जरूरी हो गया. वरना इस घटना से तो वह भी खुश ही दिखाई दिया था. दर्शकों को उसमें मजा जो आया था.

पर गलती तो शेरखान रक्षकों की भी थी. आम आदमियों ने तो केवल आंखें ही दिखाईं. शान्ति भंग तो नहीं की थी. उन्हें ऊलजलूल चीजें उठा-उठाकर फेंकने की जरूरत क्या थी? असल में अनुशासन भंग तो रक्षकों ने किया था. उन्हें यह नहीं करना चाहिए था. जरूर वे आम आदमियों से डर गए होंगे. आम आदमी सर्कस में नए जो हैं. नए लोगों से तो हर कोई डरता है. उन पर शेरखान की रक्षा का भार है. उनकी उत्तेजना भी अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती. फिर भी उन्हें हिंसा की शुरुआत नहीं करनी चाहिए थी. आम आदमियों को भी चुपचाप पिट लेना चाहिए था. रंगरूट यदि प्रतिवाद करें तो उनका नए सेटअप में गुजारा मुश्किल हो जाता है. उन्हें प्रतिवाद करना कैसे भी सही नहीं था. यह ठीक रहा कि प्रतिवाद अधिक हिंसक नहीं हुआ. उसने भी माफी मांग कर ठीक ही किया. इससे आम आदमियों की गलती कुछ तो छोटी हुई.

मुखिया तहकीकात में जुटा तो उसे पता लगा कि शेरखान ने कुछ ऐसे लोगों को बहुत लाभ दिए हैं जो शेरखान की खाल सप्लाई करते हैं. वे खाल को ऐसी बना देते हैं जिसे कोई दूसरा प्राणी पहन ले तो कोई आसानी से पहचान ही नहीं सके कि वह शेरखान है या अन्य कोई प्राणी. यह भी जानकारी मिली कि कुछ बरस पहले जंगली प्राणियों की आवाज निकालने की कला सिखाने का एक ट्रेनिंग कैम्प हुआ था और उसमें शेरखान ने यह कहते हुए शिरकत की थी कि वह देखना चाहता है कि इस कला की बारीकियां क्या हैं. इन जानकारियों ने उसे यकीन दिला दिया था कि पूंछ ही नहीं, पूरा का पूरा शेरखान नकली है. उसने निर्णय किया कि वह बाकायदा सर्कस प्रबंधकों को सूचना देकर शेरखान के पिंजरे की तरफ जाएगा, शेरखान से मिलेगा और साबित करेगा कि शेरखान नकली है.

जैसे ही उसे सूचना मिली कि शेरखान पिंजरे में है तो वह प्रबंधक को सूचित कर के पिंजरे की ओर गया. लेकिन इस बार प्रबंधक के ही कुछ कर्मचारियों ने उसे रोक दिया. कहा कि वे शेरखान का मूड देख कर आते हैं. यदि उसका मूड ठीक हुआ तो वे उसे जाने देंगे. कुछ देर बाद उसे बताया गया कि शेरखान का मूड ठीक नहीं वह अपनी नियमित वॉक पर जाने की तैयारी में है. इस वक्त किसी को उससे मिलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. वह खुश-खुश वहीं से वापस लौट चला. उसका मकसद पूरा हो चुका था. अब वह पब्लिक से कह सकता है कि शेरखान की पूंछ ही नहीं पूरा शेरखान नकली और बनावटी है. वह इसके सबूत के तौर पर खाल के व्यापारियों को लाभ देने और ट्रेनिंग कैम्प का हवाला दे सकता था. देखते हैं शेरखान की असलियत में क्या निकलता है?

सरकस में और भी बहुत कुछ है, आम आदमियों और शेरों के सिवा. जोकर भी हैं और झूलों के कलाकार भी, सुन्दर बालाएं भी हैं, हाथी-घोड़े-बकरे और तोते भी, सर्कस में इन सबका महत्व भी कम नहीं. वे क्या कर रहे हैं उसे भी हम जानने की कोशिश करेंगे. पर अभी तो रिंग में शेरखान के स्टूल की जगह पर झगड़ा बढ़ रहा है. चलो देखते हैं, वहां क्या हो रहा है?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.