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बिहार में जबरदस्त जातिगत रस्साकशी…

By   /  March 20, 2014  /  No Comments

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-सुभाष गौतम||

लोक सभा चुनाव में अन्य राज्यों के मुकाबले बिहार में सीटों को लेकर राजनितिक पार्टियों में जातिगत रस्साकशी सबसे ज्यादा रहती है. बिहार में कुल 40 लोक सभा सीट है. 2014 के चुनाव में लगभग सभी राजनितिक पार्टियों ने जातीय समीकरण पर होम वर्क के बाद ही अपना प्रतिनिधि तय किया है. बिहार में कांग्रेस, आरजेडी और एनसीपी गठबंधन में चुनाव लड़ रही है. जिसमे आरजेडी 27 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और कांग्रेस 12 सीटों पर, साथ ही एनसीपी मात्र 1 सिट पर चुनाव लड़ेगी, जिसमे से एक भी वैश्य समाज का प्रतिनिधि नहीं है. ज्यादा तर सवर्णों को ही टिकट दिया गया है. कांग्रेस, आरजेडी ने बिहार में सीटों पर प्रतिनिधि तय करते समय वैश्य समाज को नजरंदाज किया है. वैश्य समाज के हिस्से में एक भी सीट नहीं आई है यूँ कहे कि यूपीए गठबंधन ने किसी वैश्य समाज के प्रतिनिधि को टिकट नहीं दिया है, जिसका निगेटिव असर हो सकता है. बिहार में 22 प्रतिशत वैश्य समाज का वोट हैं. कुल मिलाकर 22 प्रतिशत मतदाता को लुभाने में कांग्रेस, आरजेडी नाकाम हो सकती है.

Bihar MAP

आरजेडी एनसीपी और कांग्रेस ने बिहार में जातीय समीकरण पर ध्यान न देकर अपने लिए कब्र खोदने का कम किया है. वैश्य समाज के आरजेडी कार्यकर्त्ता ने बताया कि आगामी 21 मार्च तक कांगेस व् आरजेडी कि बैठक दिल्ली में होने वाली है जिसमे 5 से 6 सीटों में फेर बदल हो सकता है. इस फेर बदल में कुछ नए लोगो को टिकट दिया जाना है. बिहार में आरजेडी और कांग्रेस के टिकट बटवारे को लेकर वैश्य समाज अपना समाज का कोई प्रतिनिधि न होने से खासा नराज दिख रहा है. कांग्रेस समर्थक वैश्य समाज के लोग बिहार में मुजफरपुर, सीतामढ़ी और बक्सर आदि में बैठक कर कांग्रेस और आरजेडी के खिलाफ मुहीम चलाने का निर्णय कर रही है. बिहार में 22 प्रतिशत वैश्य समाज का वोट हैं जिसको ध्यान में रख कर अन्य राजनितिक पार्टिया लोक सभा सीटों का वितरण किया हैं. जाति समीकरण को ध्यान में रखते हुए एनडीए ने तीन वैश्य प्रतिनिधियों को टिकट दिया है वहीँ जनतादलयूनाइटेड और वाम गठबंधन ने भी दो प्रतिनिधियों को टिकट दिया हैं.

अन्य राज्यों के मुकाबले बिहार में जाति खास मायने रखती है.बिहार में दलितों और मुसलमानों कि स्थिति अभी भी एक दास कि तरह है इसे नकारा नहीं जासकता है. इन्ही दबे कुचले लोगों का प्रतिनिधित्व राम विलास पासवान और मीरा कुमार करतीं अरहीं है. यह बात अलग है कि इन्होने अपने समाज केलिए कुछ किया नहीं सिर्फ सोभा बढ़ाने का काम किया है. बिहार कि राजनीति में दलितों में से आनेवाले यह दोनों बड़े उदहारण हैं. बिहार में वैश्य समाज पिछड़ा वर्ग में आता है, आरजेडी और कांग्रेस अगर वैश्य समाज को अजर अंदाज कर के बिहार में लोक सभा चुनाव में अगर सीटों का बटवारा किया है तो उसकी बड़ी भूल साबित हो सकती है. जो बिहार लोक सभा चुनाव में नासूर साबित हो सकती है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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