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सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा…

By   /  March 21, 2014  /  2 Comments

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कांग्रेस पार्टी के लिए शुक्रवार ब्लैक फ्राइडे बन कर आया क्योंकि इस दिन दो बड़े नेताओं इसका दामन छोड़ दिया. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को एक झटका देते हुए उत्तराखंड के शक्तिशाली नेता और लोकसभा सदस्य सतपाल महाराज ने कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी का हाथ थाम लिया है. वो पिछले 20 साल से कांग्रेस के सदस्य थे. वहीं दूसरी ओर देश के पूर्व गृह मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता रहे बूटा सिंह ने भी पार्टी छोड़ दी है और अब वो समाजवादी पार्टी की तरफ से राजस्थान की जालौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे.satpal

बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा पार्टी मुख्यालय में सतपाल महाराज को पार्टी में शामिल करने की औपचारिकता पूरी किए जाने के बाद सतपाल महाराज ने गुजरात के मुख्यमंत्री की प्रशंसा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री बनने पर नरेन्द्र मोदी ‘भारत को चीन से आगे ले जाएंगे.’ इस राजनीतिक और आध्यात्मिक नेता का नाम सतपाल सिंह रावत है लेकिन अपने प्रशंसकों में वह सतपाल महाराज के रूप से जाने जाते हैं.

उनकी पत्नी अमृता रावत उत्तराखंड विधानसभा में कांग्रेस की विधायक हैं. उत्तराखंड में सतपाल महाराज का अच्छा प्रभाव माना जाता है. सतपाल महाराज पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड के पौड़ी चुनाव क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर जीते थे.

बताया जाता है कि उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र से उम्मीदवारों के चयन में अपनी बात नहीं माने जाने से वह कांग्रेस आलाकमान से नाराज थे.

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हाल ही में उनसे मुलाकात करके उन्हें मनाने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं बनी. वह रावत के मुख्यमंत्री बनने से भी खुश नहीं थे. कहा जाता है कि वह खुद इस कुर्सी की इच्छा रखते थे.

राजीव गांधी मंत्रिमंडल में गृह मंत्री थे बूटा सिंह

कद्दावर नेता बूटा सिंह राजीव गांधी की सरकार में वर्ष 1984 से 1986 तक कृषि मंत्री और 1986 से 1989 तक गृह मंत्री रहे सिंह वर्ष 1962 से 2004 के बीच आठ बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं. जालंधर के मूल निवासी सिंह वर्ष 2004 से 2006 तक बिहार के राज्यपाल रहे. साथ ही वह वर्ष 2007 से 2010 तक राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    जब तक चुनाव नहीं हो जाता यह आवागमन चलता ही रहेगा कुछ चुनाव हारने के बाद तो कुछ टिकट न मिलने पर किसी और चोखट पर चढ़ जायेंगे इनका कोई ईमान नहीं , उन दलों का भी कोई सिद्धांत नहीं सब स्वार्थ से लिपटे लोग है देखते रहिये तमाशा इन गिरगिटों का कल सफ़ेद टोपी थी आज भगवा , कल कोई और भी हो सकती है। जैसे बूटा सिंह सब चौखटों पर चढ़ अब समाजवादी बन गए क्योंकि और कहीं पर टिकट नहीं मिला

  2. जब तक चुनाव नहीं हो जाता यह आवागमन चलता ही रहेगा कुछ चुनाव हारने के बाद तो कुछ टिकट न मिलने पर किसी और चोखट पर चढ़ जायेंगे इनका कोई ईमान नहीं , उन दलों का भी कोई सिद्धांत नहीं सब स्वार्थ से लिपटे लोग है देखते रहिये तमाशा इन गिरगिटों का कल सफ़ेद टोपी थी आज भगवा , कल कोई और भी हो सकती है। जैसे बूटा सिंह सब चौखटों पर चढ़ अब समाजवादी बन गए क्योंकि और कहीं पर टिकट नहीं मिला

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