/सतपाल ने बिछाई बिसात, क्या दे पायेगा हरीश रावत को मात..

सतपाल ने बिछाई बिसात, क्या दे पायेगा हरीश रावत को मात..

-दिलावर सिंह||

कुछ दशकों पहले अपने आपको राम का अवतार बताने वाले सतपाल महाराज ने खुद को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री न बनाये जाने पर नाराज़ हो भाजपा में शामिल होने के बाद अपनी शतरंज की बिसात पर उत्तराखंड के मुख्यमत्री हरीश रावत को पटखनी देने के लिए नई नई चालें चलनी शुरू कर दी हैं.  जिसके चलते पूरे प्रदेश की राजनीति में फिर उबाल आया गया है. कुछ कांग्रेस विधायक इस सतपाल महाराज के सम्पर्क में बताए जा रहे हैं.satpal-rajnath
समर्थक विधायकों में अमृता रावत, मंत्री प्रसाद नैथानी, अनुसूया प्रसाद मैखुरी, राजेन्द्र भंडारी, गणेश गोदयाल, डा. जीतराम और सुंदर लाल मन्द्रवाल आदि को उनका सबसे करीबी बताया जा रहा है जो उनके किसी इशारे में कुछ भी करने को तैयार बताए जा रहे हैं.

हालांकि हरीश रावत की ओर से भी इन विधायकों से सम्पर्क साध बातचीत की जा रही है. ताकि किसी भी हाल में कोई विधायक इधर से उधर न हो.
वहीँ सतपाल के चेहरे मोहरे और प्रभा मंडल को देखते हुए नार्थ ईस्ट में अपना खाता न खोल सकने वाली भाजपा सतपाल महाराज के सहारे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है.

कांग्रेस के गढ़वाल क्षेत्र से सांसद रहे सतपाल महाराज के भाजपा में शामिल होना सिद्धांतहीन और अवसरवादी राजनीति की चरम अभिव्यक्ति है. इस घटनाक्रम कुछ दशकों पहले अपने आपको राम का अवतार बताने वाले सतपाल महाराज ने खुदको उत्तराखंड का मुख्यमंत्री न बनाये जाने पर भाजपा में शामिल होने के बाद अपनी शतरंज की बिसात पर उत्तराखंड के मुख्यमत्री हरीश रावत को पटखनी देने के लिए नई नई चालें चलनी शुरू कर दी हैं, जिसके चलते पूरे प्रदेश की राजनीति में फिर उबाल आया गया है. कुछ कांग्रेस विधायक इस सतपाल महाराज के सम्पर्क में बताए जा रहे हैं.
समर्थक विधायकों में अमृता रावत, मंत्री प्रसाद नैथानी, अनुसूया प्रसाद मैखुरी, राजेन्द्र भंडारी, गणेश गोदयाल, डा. जीतराम और सुंदर लाल मन्द्रवाल आदि को उनका सबसे करीबी बताया जा रहा है जो उनके किसी इशारे में कुछ भी करने को तैयार बताए जा रहे हैं.

हालांकि हरीश रावत की ओर से भी इन विधायकों से सम्पर्क साध बातचीत की जा रही है. ताकि किसी भी हाल में कोई विधायक इधर से उधर न हो.
वहीँ सतपाल के चेहरे मोहरे और प्रभा मंडल को देखते हुए नार्थ ईस्ट में अपना खाता न खोल सकने वाली भाजपा सतपाल महाराज के सहारे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है.

कांग्रेस के गढ़वाल क्षेत्र से सांसद रहे सतपाल महाराज के भाजपा में शामिल होना सिद्धांतहीन और अवसरवादी राजनीति की चरम अभिव्यक्ति है. इस घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस-भाजपा में कोई फर्क नहीं है, इसीलिए इन पार्टियों के बड़े नेता सुगमता से एक पार्टी से दूसरी पार्टी की यात्रा
करते रहते हैं।शामिल होने वाले और शामिल करवाने वालों को कोई भी हिचक नहीं होती है. यह भी साफ हुआ कि इन पार्टियों में बड़े नेता भी सिर्फ सत्ता का सुख भोगने के लिए हैं और किसी उसूल या सिद्धान्त से उनका कोई सरोकार नहीं है. पूरे पाँच साल अपने संसदीय क्षेत्र से गायब रहने वाले और आपदा के समय मुंडन करवाने का नाटक करने वाले सतपाल महाराज को जिस सहजता से भाजपा ने कबूल कर लिया, उसने एक बार फिर से भाजपा के अलग चाल,चरित्र और चेहरे के दावे की कलई खोल दी है. उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा के भीतर जो सत्ता कब्जाने की लड़ाई चल रही है, सतपाल महाराज घटनाक्रम उसकी एक और विकृत और कुरूप अभिव्यक्ति है.

यह पूरा घटनाक्रम सत्ता कब्जाने के लिए हर तरह की जोड़-तोड़ करने की माहिर मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी उन्हीं की शैली में मिला जवाब है. अब तक जो उठापटक रावत मचाये हुए थे,आज वे स्वयं उसी

उठापटक से दो-चार हैं.सतपाल महाराज हों,हरीश रावत या फिर भुवन चन्द्र खंडुड़ी इनका एकमात्र धेय हर हाल में सत्ता पर कब्जा जमाये रखना है.
लेकिन कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की सत्तालोलुपता की कीमत उत्तराखंड की जनता चुका रही है.जिन सपनों-आकांक्षाओं को लेकर अलग उत्तराखंड की लड़ाई लड़ी गयी थी,वे सारे सपने कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया है.

ने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस-भाजपा में कोई फर्क नहीं है,इसीलिए इन पार्टियों के बड़े नेता सुगमता से एक पार्टी से दूसरी पार्टी की यात्रा
करते रहते हैं।शामिल होने वाले और शामिल करवाने वालों को कोई भी हिचक नहीं होती है.यह भी साफ हुआ कि इन पार्टियों में बड़े नेता भी सिर्फ सत्ता का सुख भोगने के लिए हैं और किसी उसूल या सिद्धान्त से उनका कोई सरोकार नहीं है.पूरे पाँच साल अपने संसदीय क्षेत्र से गायब रहने वाले और आपदा के समय मुंडन करवाने का नाटक करने वाले सतपाल महाराज को जिस सहजता से भाजपा ने कबूल कर लिया, उसने एक बार फिर से भाजपा के अलग चाल,चरित्र और चेहरे के दावे की कलई खोल दी है. उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा के भीतर जो सत्ता कब्जाने की लड़ाई चल रही है,सतपाल महाराज घटनाक्रम उसकी एक और विकृत और कुरूप अभिव्यक्ति है.

यह पूरा घटनाक्रम सत्ता कब्जाने के लिए हर तरह की जोड़-तोड़ करने की माहिर मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी उन्हीं की शैली में मिला जवाब है. अब तक जो उठापटक रावत मचाये हुए थे,आज वे स्वयं उसी उठापटक से दो-चार हैं.सतपाल महाराज हों,हरीश रावत या फिर भुवन चन्द्र खंडुड़ी इनका एकमात्र ध्येय हर हाल में सत्ता पर कब्जा जमाये रखना है.
लेकिन कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की सत्तालोलुपता की कीमत उत्तराखंड की जनता चुका रही है. जिन सपनों-आकांक्षाओं को लेकर अलग उत्तराखंड की लड़ाई लड़ी गयी थी, वे सारे सपने कांग्रेस-भाजपा के नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया है. अब देखना यह है कि जनता आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस-भाजपा को उनकी सत्तालोलुपता का कैसा सबक सिखायेगी.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.