Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

मीडिया और मुसलमान..

By   /  March 22, 2014  /  2 Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-रवीश कुमार||
मुसलमान बदल गए मगर मीडिया के कैमरों का मुसलमान आज तक नहीं बदला । उसके लिए मुसलमान वही है जो दाढ़ी, टोपी और बुढ़ापे की झुर्रियाँ के साथ दिखता है । इस चुनाव के कवरेज में मीडिया ने एक और काम किया है ।मोदी के ख़िलाफ़ विपक्ष बना दिया है । जैसे बाक़ी समुदायों में मोदी को लेकर शत् प्रतिशत सहमति है सिर्फ मुसलमान विरोध कर रहे हैं । पूरे मुस्लिम समुदाय का एक ख़ास तरह से चरित्र चित्रण किया जा रहा है ताकि वह मोदी विरोधी दिखते हुए सांप्रदायिक दिखे । जिसके नाम पर मोदी के पक्ष में ध्रुवीकरण की बचकानी कोशिश हो ।Muslim and media

जिन सर्वे में बीजेपी विजयी बताई जा रही है उन्हीं में कई राज्य ऐसे भी हैं जहाँ बीजेपी को शून्य से लेकर दो सीटें मिल रही हैं । तो क्या मीडिया का कैमरा उड़ीसा के ब्राह्मणों या दलितों से पूछ रहा है कि आप मोदी को वोट क्यों नहीं दे रहे हैं । क्या मीडिया का कैमरा तमिलनाड के पिछड़ों से पूछ रहा है कि आप मोदी को वोट क्यों नहीं दे रहे हैं । क्या मीडिया लालू या मुलायम समर्थक यादवों से पूछ रहा है कि आप मोदी को वोट क्यों नहीं दे रहे हैं । मीडिया का कैमरा सिर्फ मुसलमानों से क्यों पूछ रहा है ।

ऐसे सवालों से यह भ्रम फैलाने का प्रयास होता है कि मोदी के साथ सब आ गए हैं बस मुसलमान ख़िलाफ़ हैं । जबकि हक़ीक़त में ऐसा नहीं है । ग़ैर मुस्लिम समाज में भी अलग अलग दलों को वोट देने का चलन है उसी तरह मुस्लिम समाज भी अलग अलग दलों को वोट देता है । अलग अलग दलों को एक एक मुस्लिम वोट के लिए संघर्ष करना पड़ता है । जबकि यह भी एक तथ्य है कि मुसलमान बीजेपी को वोट देते हैं । हो सकता है प्रतिशत में बाक़ी समुदायों की तुलना में कम ज़्यादा हो ।

लेकिन ऐसे सवालों के ज़रिये मुसलमानों की विशेष रूप से पहचान की की जा रही है कि अकेले वही हैं जो मोदी का विरोध कर रहे हैं । सब जानते हैं कि मुसलमान वोट बैंक नहीं रहा । उसने यूपी में बसपा को हराने के लिए समाजवादी पार्टी को इसलिए चुना क्योंकि अन्य समुदायों की तरह उसे लगा कि सपा ही स्थिर सरकार बना सकती है । बिहार में उसने शहाबुद्दीन जैसे नेताओं को हराकर नीतीश का साथ इसलिए दिया क्योंकि वह एक समुदाय के तौर पर विकास विरोधी नहीं है । वह भी विकास चाहता है। मुसलमान सांप्रदायिकता का विरोधी ज़रूर है जैसे अन्य समुदायों में बड़ी संख्या में लोग सांप्रदायिकता का विरोध करते हैं । जहाँ बीजेपी सरकार बनाती है वहाँ मुसलमान उसके काम को देखकर वोट करते हैं । मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के बारे में तो कोई नहीं कहता कि मुसलमान उन्हें वोट नहीं करता । राजस्थान में मुसलमानों ने कांग्रेस की नरम सांप्रदायिकता को सबक़ सीखाने के लिए बीजेपी को वोट किया । वहाँ बीजेपी ने चार उम्मीदवारों को टिकट दिया था और दो जीते ।

इस पूरे क्रम में बीजेपी और संघ परिवार की नीतियों के संदर्भ में उसे नहीं देखा जाता है । किसी नेता या विचारधारा से उसका एतराज़ क्यों नहीं हो सकता । क्या मुसलमान सिर्फ एक राज्य के दंगों की वजह से संदेह करता है । राजनीति का इतना भी सरलीकरण नहीं करना चाहिए । क्या मीडिया को मुसलमानों से ऐसे सवाल करने से पहले उसके एतराज़ के इन सवालों को नहीं उठाना चाहिए । टीवी की चर्चाओं में युवा मतदाता है पर उनमें युवा मुस्लिम मतदाता क्यों नहीं है । दलित युवा आदिवासी युवा क्यों नहीं है । इसलिए मीडिया को किसी समुदाय को रंग विशेष से रंगने का प्रयास नहीं करना चाहिए ।

बीजेपी ने यूपी के जिन चौवन उम्मीदवारों को टिकट दिये उनमें एक भी मुसलमान नहीं है । बिना भागीदारी मिले सिर्फ मुसलमानों से यह सवाल क्यों किया जाता है कि आप अमुक पार्टी को वोट क्यों नहीं करते । राजनीतिक गोलबंदी बिना भागीदारी के कैसे हो सकती है । देवरिया से कलराज मिश्र को टिकट मिले पर शाही समर्थकोँ को नाराज़ होने की छूट है तो एक भी टिकट न मिलने पर मुसलमानों को नाराज़ होने की छूट क्यों नहीं है ।
मीडिया को मुसलमानों को चिन्हित नहीं करना चाहिए । उसके हाथ से यह काम जाने अनजाने में हो रहा है । नतीजा यह हो रहा है कि चुनाव मुद्दों से भटक रहा है । ध्रुवीकरण के सवालों में उलझ रहा है जिससे हिन्दू को लाभ है न मुस्लिम को । अब मीडिया को बनारस बनाम आज़मगढ़ के रूप में ऐसे रूपक गढ़ने के और बहाने मिल गए हैं । पाठक दर्शक और मतदाता को इससे सचेत रहना चाहिए । मतदान के साथ साथ सामाजिक सद्भावना कम महत्वपूर्ण नहीं है । बल्कि ज़्यादा महत्वपूर्ण है ।

(यह लेख आज के प्रभात ख़बर में प्रकाशित हो चुका है)
क़स्बा ब्लॉग से साभार

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 6 years ago on March 22, 2014
  • By:
  • Last Modified: March 22, 2014 @ 12:13 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    दरअसल यह विडंबना ही है कि मुस्लिम समुदाय के सम्बन्ध में ऐसी धारणा बना दी गयी है.१९४७ के बाद से कांग्रेस का खुद को सेक्युलर होने व अन्य का विशेषकर भा जा पा को सांप्रदायिक व मुस्लिमविरोधी बताने का सोचा समझी नीति है पर अब मुस्लमान समाज में जागर्ति भी आयी है और वह अपने विवेक से निर्णय लेने लगा है.अब यह धारणा भी नहीं होनी चाहिए कि जमा मस्ज़िद के इमाम का लोग कहना मानेंगे वह समय भी अब बीत गया है.पर मीडिया के सोच में अभी बदलाव नहीं आ पाया है जिसकी जरुरत है ताकि दोनों संप्रदाय में दूरियां न बढे.

  2. दरअसल यह विडंबना ही है कि मुस्लिम समुदाय के सम्बन्ध में ऐसी धारणा बना दी गयी है.१९४७ के बाद से कांग्रेस का खुद को सेक्युलर होने व अन्य का विशेषकर भा जा पा को सांप्रदायिक व मुस्लिमविरोधी बताने का सोचा समझी नीति है पर अब मुस्लमान समाज में जागर्ति भी आयी है और वह अपने विवेक से निर्णय लेने लगा है.अब यह धारणा भी नहीं होनी चाहिए कि जमा मस्ज़िद के इमाम का लोग कहना मानेंगे वह समय भी अब बीत गया है.पर मीडिया के सोच में अभी बदलाव नहीं आ पाया है जिसकी जरुरत है ताकि दोनों संप्रदाय में दूरियां न बढे.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

Manisa escort Tekirdağ escort Isparta escort Afyon escort Çanakkale escort Trabzon escort Van escort Yalova escort Kastamonu escort Kırklareli escort Burdur escort Aksaray escort Kars escort Manavgat escort Adıyaman escort Şanlıurfa escort Adana escort Adapazarı escort Afşin escort Adana mutlu son

You might also like...

आखिर होगा क्या मज़दूरों का.?

Read More →
Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
WhatsApp chat
%d bloggers like this: