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बीजेपी का सत्ता संघर्ष…

By   /  March 23, 2014  /  2 Comments

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-कृष्ण मोहन||

पिछले दो दिनों के घटनाक्रम से ये ज़ाहिर होता है कि बीजेपी के अन्दर सत्ता संघर्ष अडवानी और मोदी के बीच नहीं आरएसएस और मोदी के बीच चल रहा है. अडवानी सिर्फ आरएसएस के औजार के रूप में बीजेपी के अन्दर मोदी को चेक और बैलेंस करने की भूमिका निभा रहे हैं. ये सिलसिला मोदी को प्रचार अभियान की कमान सौंपने के लिए बुलाई गई गोवा बैठक से शुरू हुआ था और उम्मीद है कि आगे भी चलता रहेगा. उस समय भी बीजेपी के अन्दर अलग थलग पड़ चुके अडवानी को हिन्दू ह्रदय सम्राट के मुकाबले आरएसएस का समर्थन मिलने के कारण ही बहुत अधिक महत्व मिला था.adwani-modi-rajnath

इस बार की ही तरह तब भी समूची बीजेपी को दंडवत करा लेने के बाद ही अडवानी ने “बड़प्पन” दिखाया था. कुछ लोग समझते थे कि ये सब अडवानी की वरिष्ठता के कारण हुआ था लेकिन जोशी और कल्याण के हश्र से वे समझ गए होंगे कि किसी कुसंस्कृत संयुक्त परिवार के बड़े बूढ़ों की तरह ही बीजेपी में भी बुजुर्गों को अपने हाल पर बडबडाते हुए छोड़ देने कीप्रथा है वरना जोशी को बनारस में ये नहीं कहना पड़ता कि उन्होंने पूर्वजन्म में न जाने कौन से पाप किये थे जो राजनीति में गए और बाबा विश्वनाथ ज़रूर उनके साथ हुए बर्ताव का ध्यान रखेंगे.

इस सिलसिले में पहली बात तो ये है कि विचारधारा आधारित पार्टियों और संगठनों में वैचारिक विचलन का ठप्पा लग जाने के बाद किसी नेता की हैसियत तभी बची रह सकती है जब पार्टी का सत्तातंत्र उसकी हिफाज़त करे. जिन्ना प्रकरण में बाद हुई लानत मलामत से ये साफ़ ज़ाहिर होता है कि अडवानी इस मामले में कोई अपवाद नहीं हैं. अगर आरएसएस उनका समर्थन न करे तो बीजेपी में उनका ऐसा कोई आधार या प्रतिष्ठा नहीं बची है की वो बार बार उनके सामने नतमस्तक हो. दस दिन पहले तक गांधीनगर से टिकट मांगने की बेचारगी भरी मुद्रा में बात करते अडवानी को पलटवार का मौक़ा तब मिला जब मोदी राजनाथ की जोड़ी की टिकट बंटवारे के माध्यम से पार्टी पर एकछत्र कब्ज़े की योजना कुछ ज्यादा ही खुल गई. इस विषय में हम पहले लिख चुके है. आरएसएस की प्रेरणा के बिना अडवानी को भोपाल आने की दावत देकर मोदी को छेड़ने की हिम्मत न शिवराज सिंह चौहान में थी न कैलाश जोशी में. जिस तरह बिलकुल आखिरी क्षणों में भोपाल प्रस्ताव आया और अचानक अडवानी का भोपाल प्रेम जाग उठा उससे इस बात की पुष्टि होती है अन्यथा इस प्रस्ताव का उल्लेख भी पिछले छह महीनों में शायद ही किसी ने किया हो.

जिस तरह मोदी को सुलह समझौते के लिए मोहन भागवत और अडवानी के दरबार में हाजिरी देनी पड़ी उससे ज़ाहिर होता है की आरएसएस अडवानी को आगे करके मोदी पर कम से कम नैतिक बढ़त लेने में कामयाब रहा है. इस तरह अडवानी की नए सिरे से प्राणप्रतिष्ठा हुई है ताकि चुनाव के बाद मोदी के सामने तनकर खड़ा होने वाला कम से कम एक नेता हो और कार्यकर्ताओ को भी उसे इस भूमिका में देखने का अभ्यास रहे. तभी आरएसएस को दो लड़ती हुई बिल्लिओं के बीच बन्दर की भूमिका निभाने का मौक़ा मिल सकता है.

मेलमिलाप के नाट्य के बाद के घटनाक्रम की दो छवियाँ इस लिहाज से दिलचस्प हैं. एक तरफ राजनाथ सिंह चेहरे पर खिन्नता के भाव लिए “जहाँ से चाहें वहां से लड़ें” की भाषा में बोल रहे थे. पता नहीं उन्होंने ऐसी कोई बात कही या नहीं पर एक चैनल का रिपोर्टर बार बार इसके साथ ये भी दुहरा रहा था कि न चाहें तो न लड़ें. दूसरी तरफ अडवानी ने अपना फैसला ज़ाहिर करते हुए जो पत्र लिखा उसमे खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि “जिस तरह पार्टी ने उनके अनुरोध को स्वीकार किया और गुजरात के मुख्यमंत्री ने उनके घर आकर इसकी सूचना दी” उससे वे भावविह्वल हो उठे हैं. ध्यान दें कि अडवानी के लिए मोदी महज़ गुजरात के मुख्यमंत्री भर हो गए हैं. अभी कल तक वे उनके चुनाव प्रचार को अपने द्वारा देखा गया सबसे सशक्त अभियान बता रहे थे. संभवतः मोदी को चोट पहुँचाने के लिए इससे अधिक तीखी भाषा का प्रयोग वे नहीं कर सकते थे. इसके बाद किसी को ये भ्रम नहीं होना चाहिए कि ये अडवानी बनाम मोदी का मामला है. मोदी को इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की हिमाकत आरएसएस की जोरदार शह के बिना अडवानी के बस की बात नहीं थी. अब अगर मोदी इस कड़वे घूँट को पी जाते हैं तो बीजेपी के अन्दर उनकी अपराजेयता का मिथक टूटेगा और राजनाथ सिंह और अमित शाह जैसे उनके उत्साही समर्थक दुविधा में पड़ जायेंगे. मोदी ये रिस्क नहीं ले सकते. उनकी तरफ से बदले की कार्रवाई जल्द ही होनी चाहिए. यानी बीजेपी के अन्दर एक दूसरे को निपटाने का रंगारंग क्कार्यक्रम जारी रहने की पूरी संभावना है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    भा ज पा की ये अंतर्कलह इसे ले डूबेगी.२००९ में राजस्थान में भी यही हुआ था.सब टिकट ले कर अपनी वफ़ा की कीमत मांग रहे हैं.अगर किसी परिवार के दस सदस्य rajniti में हैं तो उन सब को टिकट मिलना चाहिए.बाकी कार्यकर्ता तो बेचारे दरियां ही बिछाते रहेंगे.भारत्या लोकतंत्र कुछ पार्टियों की प्राइवेट कंपनी बन गया है.अब इसने सामंतवादी व्यवस्था को भी पीछे छोड़ दिया है.कांग्रेस व अन्य पार्टी को दोष देने वाली पार्टी में खुद के क्या हाल हैं यह जानने की कोशिश नहीं हो रही. बुजुर्ग नेता अड़ रहे हैं तो पार्टी कमान भी बहरी नेताओं को बुला गले लगा रही है ऐसी हालत में कीमत तो चुकानी ही होगी.कहीं ज्यादा के चक्कर में जो मिल ने की सम्भवावनों पर भी पानी न फिर जाये

  2. भा ज पा की ये अंतर्कलह इसे ले डूबेगी.२००९ में राजस्थान में भी यही हुआ था.सब टिकट ले कर अपनी वफ़ा की कीमत मांग रहे हैं.अगर किसी परिवार के दस सदस्य rajniti में हैं तो उन सब को टिकट मिलना चाहिए.बाकी कार्यकर्ता तो बेचारे दरियां ही बिछाते रहेंगे.भारत्या लोकतंत्र कुछ पार्टियों की प्राइवेट कंपनी बन गया है.अब इसने सामंतवादी व्यवस्था को भी पीछे छोड़ दिया है.कांग्रेस व अन्य पार्टी को दोष देने वाली पार्टी में खुद के क्या हाल हैं यह जानने की कोशिश नहीं हो रही. बुजुर्ग नेता अड़ रहे हैं तो पार्टी कमान भी बहरी नेताओं को बुला गले लगा रही है ऐसी हालत में कीमत तो चुकानी ही होगी.कहीं ज्यादा के चक्कर में जो मिल ने की सम्भवावनों पर भी पानी न फिर जाये

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