/मण्डल विश्वविद्यालय के कुलपति ने पत्रकार को अपमानित कर कैमरा छीना..

मण्डल विश्वविद्यालय के कुलपति ने पत्रकार को अपमानित कर कैमरा छीना..

-सपना बोस||

बिहार के मधेपुरा स्थित बीएन मण्डल विश्वविद्यालय के कुलपति आरएन मिश्रा ने एक पत्रकार को अपमानित कर उसका कैमरा छिन लिया है. इस सिलसिले में मधेपुरा सदर थाना में उभय पक्षों की ओर से प्राथमिकी दर्ज करायी गयी है. कुलपति के आदेश से हिन्दुस्तान संवाददाता संजय परमार पर परीक्षा की गोपनीयता भंग करने तथा अवैध प्रवेष करने का आरोप लगाया गया है. जबकि पत्रकार के द्वारा सांस्थित प्राथमिकी में पीड़ित पत्रकार ने कुलपति पर उसे गाली गलौच, मार पीट कर धमकी देने और कैमरा छिन लेने का आरोप चस्पा किया है.B.N.mandal_univ

विगत दिनों विश्वविद्यालय के पीजी विभाग के बरामदा पर चल रहे मेडिकल की परीक्षा को कवर करने पहुंचे पत्रकार संजय परमार के साथ कुलपति ने न सिर्फ दुव्यवहार किया बल्कि उनका कैमरा भी छिन लिया. इस दिन परीक्षा निर्धारित समय डेढ़ घंटा बिलम्ब से प्रारंभ हुई. आश्चर्य तो यह है कि मेडिकल परीक्षा का प्रश्नपत्र कुलपति का अंगरक्षक बांट रहा था. इसकी तस्वीरें लेते देख कुलपति ने अपना आपा खो दिया और अपशब्दों का इस्तेमाल कर उक्त पत्रकार का कैमरा छीन लिया. बाद में पत्रकार के खिलाफ थाना में शिकायत भी दर्ज करवा दिया गया.

पत्रकार को अबतक कैमरा वापस नहीं किया गया है. जिससे मधेपुरा के पत्रकारों में कुलपति के खिलाफ काफी आक्रोष है. भ्रष्टाचार और संस्कार हिनता के लिए बिहार का सर्वाधिक बदनाम बीएन मण्डल विश्वविद्यालय अपने स्थापना काल से ही बदनाम रहा है. अवांछित तत्वों को रेवड़ी की तरह पद बांट कर कार्य संस्कृति को जहां अपसंस्कृति में बदल दिया गया वहीं परीक्षा तथा अन्य कार्यों में पैसों का खुल कर खेल हुआ.

कई कुलपति और अन्य अधिकारियों को जेल जाना पड़ा तथा न्यायालय से जमानत लेनी पड़ी. ऐसे लोगों का थू थू हुई. लेकिन अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण ऐसे लोग थेथर बनकर अब भी सक्रिय हैं. इस बदनाम विश्वविद्यालय में लंबी अवधि तक निगरानी जांच चलती रही और छात्रों को प्रमाणपत्र देना निगरानी विभाग के बहाने बंद रहा. इस विश्वविद्यालय में अब भी माफिया राज कायम है.

कई परीक्षा नियंत्रक, निरीक्षक तथा अधिकारियों ने अपने पुत्र-पुत्रियों को मेडिकल में नाम लिखवाने तथा उन्हें उत्तीर्ण करवाने में सफल रहे हैं. सवाल उठता है कि जब परीक्षा कदाचारमुक्त हो रही थी तो तस्वीर खिंचने पर कुलपति इतना आग बबूला क्यों हो गये. मण्डल विश्वविद्यालय की कोई परीक्षा बिना विवादों के आज तक नहीं हुई है. यों मेडिकल की परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने का मामला सरगर्मी के साथ चल रहा है. आर्थिक अपराध इकाई इसकी छानबीन भी कर रही है. घटना के दिन इकाई की ओर से परीक्षा केन्द्र और परीक्षा विभाग में छापामारी भी की गयी थी और प्रश्न पत्र लीक होने से संबंधित कई मामले और तथ्य पुलिस को मिले हैं. इसमें कुलपति और परीक्षा नियंत्रक की गिरफ्तारी हो सकती है. इससे घबड़ाये कुलपति का पत्रकार पर बौराना कदापि उचित नहीं हुआ है. इस विश्वविद्यालय की कारगुजारियों की लम्बी फेहरिस्त है. अपना प्रेस रहते हुए भी जहां प्रश्न पत्र, अंक पत्र अन्यत्र मुद्रित कराये जाते हैं, वहीं बगैर पुस्तकाध्यक्ष के भी पुस्तकालय चल है और उसमें हुए हैं. अंकपत्र और परीक्षा परिणाम के नाम पर छात्रों का शोषण होना पुरानी प्रथा है. यह सब कुलपति के जानकारी के बावजूद होता रहा है. लेकिन कुलपति अपना शेखी बधारते रहे हैं और विश्वविद्यालय की कारगूजारियों को प्रकाशित करने पर पत्रकारों पर अपनी खीज निकालते नजर आते हैं. विधि विधान को ताक पर रख कर मुगलिया फरमान निकाल कर शासन करने वाले इस कुलपति की उच्च न्यायालय में फजीहत हो चुकी है.

मधेपुरा विश्वविद्यालय का दुर्भाग्य है कि यहां कुलपति के तौर पर एक-दो लोगों को छोड़कर कोई विद्वान और काबिल कुलपति पदस्थापित नहीं हो सके. अधिकांश छंटूआ लोग राजनीतिक आकाओं के बल पर कुलपति बनते रहे हैं. फिलहाल (अपने पाठ्य विषय को छोड़कर) अल्पज्ञानी आरएन मिश्र कुलपति बने हुए हैं. सहरसा से आने वाले इस सज्जन को मधेपुरा में विश्वविद्यालय स्थापित होना अच्छा नहीं लग रहा है. इनकी मान्यता है कि मधेपुरा के बजाय सहरसा में विश्वविद्यालय होना चाहिए था. इनका तर्क है कि मधेपुरा चूंकि सहरसा जिला से कट कर बना है. इसलिए विश्वविद्यालय वहीं होना युक्ति संगत है तथा ऐसा सहरसा का हक मारी भी है. ऐसा उन्होंने डा. जगन्नाथ मिश्र के पिता आरएन मिश्र के स्मरण में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था. जबकि इस अल्प ज्ञानी को यह मालूम ही नहीं है कि सहरसा एक अप्रैल 1954 से पूर्व मधेपुरा अनुमण्डल का हिस्सा था. मधेपुरा सैकड़ों वर्षों तक सहरसा का अनुमण्डल मुख्यालय रहा है और यादवी आक्रामकता के कारण ही ब्राह्मण राजनेताओं के द्वारा सहरसा को मधेपुरा का जिला बना दिया गया था. जनांदोलन के बाद 9 मई 1981 को मधेपुरा जिला बन पाया. लेकिन तब तक सहरसा को प्रमण्डल बना दिया गया. इसकी भरपाई मधेपुरा में विश्वविद्यालय देकर की गयी. फिलहाल मधेपुरा के पत्रकार तुगलकी कुलपति के खिलाफ एकत्रित हुए हैं और चुनाव के बाद इनकेखिलाफ आन्दोलन चलाकर विश्वविद्यालय के शुद्धिकरण का मन बना चुके हैं.

वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन ऑफ बिहार के प्रदेश महासचिव डा. देवाषीष बोस, अध्यक्ष तथा हिन्दुस्थान समाचार अभिकरण के राज्य प्रभारी शशि भूषण प्रसाद सिंह, उपाध्यक्ष आरएन सिंह ‘रौशन’, सचिव तथा रफ्तार टाईम्स न्यूज के बिहार-झारखण्ड के प्रभारी मोहन कुमार, सचिव अभिजीत पाण्डेय तथा संगठन सचिव सुधीर मधुकर ने बीएन मण्डल विश्वविद्यालय के कुलपति आरएन मिश्र के हिन्दुस्तान पत्रकार संजय परमार के खिलाफ अशोभनीय हरकत की मुखालफत करते हुए घटना की निन्दा की है और पत्रकार के खिलाफ हुए मुकदमा को समाप्त कर कुलपति की गिरफ्तारी की मांग की है.

Facebook Comments

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.