/चुनावी उफान में ‘पुरबिया तान’

चुनावी उफान में ‘पुरबिया तान’

कल से शुरू हो रहा है लोकगीतों को संरक्षित-विकसित करने का ऑनलाइन अभियान…गायिका चंदन की आवाज में महेंदर मिसिर के गीतों का पहला अलबम ‘पुरबिया तान’ होगा ऑनलाइन.. गलियों में बिखरे हुए लोकगीतों का ऑनलाइन जंक्शन ‘लोकराग’ गुमनाम गायकों का बनेगा मंच.. लोकसंगीत में अश्लीलता विद्रुपता को दूर करने के लिए देश दुनिया के कोने में रह रहे लोकसंगीत के रसियों के सहयोग से शुरू हुआ है अभियान..

चुनाव के तनाव की बेला में मन-मिजाज और माहौल को थोड़ा खुशनुमा बनाने और बदलने के लिए कल 30 मार्च, रविवार से लोकसंगीत का एक नायाब अभियान शुरू हो रहा है. यह अभियान www.lokraag.com के माध्यम से शुरू हो रहा है, जो लोकगीत-लोकसंगीत के जारी होने के पारंपरिक तरीके यानि सीडी/डीवीडी आदि माध्यम से जारी करने के इतर ऑनलाइन माध्यम को बढ़ावा देगा. लोकसंगीत के क्षेत्र में इस अभियान की शुरुआत कुछ युवकों के सामूहिक प्रयास से हुई है, जो देश और दुनिया के अलग-अलग कोने में रहते हैं लेकिन उनका अपनी मातृभाषा और लोकसंगीत से विशेष जुड़ाव-लगाव है. इस वेबसाइट पर लोकगीत-लोकसंगीत के डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन और उनसे जुड़ी तमाम जानकारियों को एक साथ तो उपलब्ध होगा ही, उसके समानांतर ही इसका एक बड़ा मकसद प्रतिभावान होने और संभावनाओं से भरे होने के बावजूद अवसर व उचित मंच न मिल पाने या अश्लीलता-विदु्रपता से कदमताल न कर पाने की वजह से गायकी की दुनिया को अलविदा करनेवाले युवा गायक-गायिकाओं को मंच उपलब्ध कराना होगा.purbia-tan

संभावनाशील प्रतिभाओं को मंच देने के अभियान के तौर पर लोकराग की पहली ऑनलाइन प्रस्तुति के तौर पर रविवार को ‘पुरबिया तान’ नाम से पहला म्यूजिकल अलबम जारी होगा, जो पुरबी के सम्राट स्व. महेंदर मिसिर के गीतों का संग्रह होगा. इस अलबम के सारे गीतों को गायिका चंदन तिवारी की आवाज में संयोजित व संकलित किया गया है. युवा गायिका चंदन बिहार के भोजपुर जिले के बड़कागांव की रहनेवाली है और झारखंड के बोकारो में रहती हैं. महुआ के सुरसंग्राम, जिला टॉप आदि कार्यक्रमों में चंदन अपनी गायकी का जलवा बिखेर चुकी हैं लेकिन पुरबिया तान के जरिये वे कम उम्र में ही बेहद गंभीर व श्रमसाध्य गायन के साथ लोगों के सामने आ रही हैं. इस अलबम में पुरबी, निर्गुण, कृष्ण-गोपी प्रसंग वाले मनमोहक भजन समेत पॉपुलर लोकगीत भी हैं. चंदन कहती हैं कि उनके लिए सबसे आसान था कि वे सीडी या डीवीडी के जरिये अपने अलबम को लेकर सामने आ सकती थी लेकिन लोकराग वेबसाइट के जरिये ऑनाइन माध्यम से इसे जारी करने का मूल मकसद यही है कि यह लोगों को निःशुल्क मिले और एक साथ दुनिया के कोने-कोने में रह रहे भोजपुरी भाषी और लोकसंगीत के रसियों को महेंदर मिसिर जैसे महान गीतकारों के गीतों को सुनने का मौका मिले. बकौल चंदन, महेंदर मिसिर के बाद वह भिखारी ठाकुर के गीतों पर काम कर रही हैं और शीघ्र ही बेटी विदाई के कुछ सदाबहार व करूण गीतों का अलबम लोकराग के जरिये उपलब्ध कराएंगी.

लोकराग के जरिये लोकसंगीत के इस अभियान के संरक्षक बीएन तिवारी उर्फ भाईजी भोजपुरिया का कहना है कि हम यही मानकर इस अभियान को शुरू कर रहे हैं कि अगर वाकई लोकगीतों को बचाना है तो नयी प्रतिभाओं को अच्छे गीत गाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें एक सशक्त मंच उपलब्ध कराना होगा. साथ ही सिर्फ पेशेवर गायक-गायिकाओं के आवाज में ही नहीं बल्कि गांव की गलियों में रहनेवाले तमाम दादा-दादी, नाना-नानी, आमजनों में जो जन्मजात गायकी की विरासत है, उसे भी उन्हीं की आवाज और अंदाज में सामने लाना होगा.

लोकसंगीत के इस अनूठे अभियान को आगे बढ़ाने के लिए लोकराग समूह के साथी सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों के जरिये सभी लोगों से मदद ले रहे हैं और अपील कर रहे हैं कि कि अपने-अपने गांवों से, अपने अपने घरों से गीतों को गवाकर भेजें, जिसे लोकराग के जरिये पेशेवर अंदाज में जारी किया जाएगा और गायक-गायिका का पूरा परिचय भी दिया जाएगा. वह गीत किसी प्रकार के हो सकते हैं. पुरबी, बिरहा, सोहर, विवाह गीत, रोपनी-सोहनी गीत से लेकर हरिकीर्तन व झलकूटन गीत तक. और यह किसी भी भाषा-बोली में होगा. लोकराग की परिकल्पना को साकारा करनेवाले व इस वेबसाइट के मॉडरेटर व दिल्ली में रहनेवाले पत्रकार विकास कुमार कहते हैं कि हमारा मकसद लोकगीतों की दुनिया और डिजिटल दुनिया के बीच सामंजस्य के रिश्ते को और मजबूत करना है. बकौल विकास, वैसे युवा गायक-गायिका, जो साफ-सुथरे व पारंपरिक गीतों को गाकर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, अधिक से अधिक लोगों तक जाना चाहते हैं, उनके गीतों को लोकराग निःशुल्क जारी करेगा और गीत-संगीत उपलब्ध कराने में रचनात्मक सहयोग भी करेगा. पुरबिया तान अलबम के परिकल्पनाकार व निर्माता अरूण सिन्हा कहते हैं कि चंदन की आवाज में पुरबिया तान अलबम जारी करने के पहले हमने ऑनलाइन माध्यम से इस अलबम के एक गीत को जारी किया था और कई लोगों को मेल से भेजा था, जिसका रिस्पांस कल्पना से परे मिला. दस दिनों में तमाम मित्रों के सहयोग से करीब 50 हजार लोगों तक इस एक गीत को हम पहुंचाने में सफल रहे, तब जाकर अब पूरा अलबम रिलीज कर रहे हैं. पुरबिया तान के साथ ही लोकराग द्वारा मौसम के मिजाज के हिसाब से चैता-चैती का भी एक सीरिज जारी हो रहा है, जिसे गंवई और ठेठ अंदाज में शशिभूषण काजू व उनकी मंडली ने गाया है. शीघ्र ही गंवई भजनों की एक श्रृंखला, बेटी विदाई गीतों की एक श्रृंखला और गांव की गलियों से बिखरे हुए गीतों की नयी श्रृंखला सामने आएगी.

लोकराग के इस अभियान को एक मूर्त रूप देने और आगे बढ़ाने में देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्से में रह रहे लोग अपना समर्थन व सहयोग दे रहे हैं. खाड़ी देश में कार्यरत नवीन भोजपुरिया, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधरत पत्रकार अनुपमा, बेगुसराय के रहनेवाले पत्रकार शशिसागर, मुजफ्फरपुर के गांव चंद्रहट्टी के रहनेवाले व पेशे से पत्रकार लोकेश कुमार, जहानाबाद के सचई गांव के रहनेवाले सनातन कुमार, चतरा के रहनेवाले रामेश्वर राम, फारबिसगंज के रहनेवाले शिव कुमार, सासाराम के रहनेवाले और पेशे से भेल में इंजीनियर मृगांक शेखर जुगनू, राजस्थान के कोटा में रहनेवाली श्रद्धा चौबे जैसे लोग लगातार इस अभियान को आगे बढ़ाने में पूरे मनोयोग से लगे हुए हैं और सहयोग कर रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.