/अन्ना हजारे कहाँ से और कैसे गाँधी? देश पूछ रहा है सवाल

अन्ना हजारे कहाँ से और कैसे गाँधी? देश पूछ रहा है सवाल

-आर के चौधरी।।
अन्ना हजारे जब मेदान्ता सिटी जैसे पाँच सितारा अस्पताल से अपने गाँव रालेगण सिद्धि पहुंचे और उन्होंने वहां जब पहली बार ग्राम सभा को संबोधित किया तो जैसे उनके मुखारबिंद से गर्वोक्ति पूर्ण आवाज़ में  निकला, ” अब भारत की जनता मेरी एक आवाज़ पर उठ खड़ी होगी” तो जैसे उनके भीतर का गुरुर उनकी जुबान पर आ गया। इसी के साथ उनकी गाँधी जी से तुलना करना इस देश के लाखों को बुद्धिजीवियों को अखर गया और यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि यदि गाँधी इस तरह के आन्दोलन के बाद साबरमती जाते तो क्या उन्हें भी ऐसा ही कोई घमंड होता?

गाँधी जी ने नमक सत्याग्रह से जो विजय हासिल की उसे गाँधी जी ने गरीब जनता की विजय बताया था, जबकि अन्ना हजारे अपने आन्दोलन से अब तक ऐसी कोई उल्लेखनीय जीत हासिल नहीं कर पाए और खुद अपनी इस जीत को आधी-अधूरी बताया था। फिर किस बात का घमंड?
अन्ना समर्थकों ने दिल्ली में यह नारा दिया कि “अन्ना नहीं, गाँधी है” लेकिन अन्ना हजारे और गाँधी की तुलना मेरे ख्याल से गाँधी के साथ ज्यादती होगी। सिर्फ सफ़ेद कुरता, पायजामा और गाँधी टोपी पहन लेने से गाँधी नहीं बना जा सकता। गाँधी बनने के लिए उनकी विचारधारा और उनकी सोच को अपनाना भी जरूरी है।

गाँधी जी ने अन्ना हजारे की तरह कभी भी कलफ लगा कुरता-पायजामा नहीं पहना बल्कि वे लंगोटी पहन कर ही काम चलाते रहे। गाँधी जी ने हमेशा मन जीत कर मानस परिवर्तन में विश्वास रखा। गाँधी जी ने दुनिया को सत्याग्रह जैसा हथियार दिया तो अन्ना ने अनशन के जरिये दबाव बनाने का रास्ता अख्तियार किया।

अन्ना हजारे ना तो गरीब, ना दलित और ना ही श्रमिक की बात करते हैं, जबकि गाँधी जी इन सभी वर्गों की बात करते थे। शायद यही सबसे बड़ा कारण रहा कि गाँधी जी के साथ सभी वर्ग जुड़ गए जबकि अन्ना हजारे के साथ दलित वर्ग नहीं आया।
गाँधी जी हमेशा सर्वजन हिताय की बात करते थे और गाँधी जी का कोई सलाहकार नहीं था जबकि अन्ना हजारे के सलाहकार मंडल में देश के प्रभावशाली और चतुर लोग है  और वे भोले-भाले तथा अल्पशिक्षित अन्ना हजारे को अपने हिसाब से सलाह दे रहे हैं। गाँधी जी विधि स्नातक थे जबकि अन्ना हजारे सातवी पास, सेना के सेवानिवृत ड्राईवर हैं। वर्तमान में गाँधी जी की तुलना किसी भी व्यक्ति विशेष से नहीं की जा सकती. अन्ना हजारे की तुलना गाँधी जी से करना गाँधी जी का और उनके कार्यों का अपमान होगा।

आर के चौधरी

गाँधी जी जब भी बीमार पड़े तो उन्होंने आम जनता की तरह ही अपना इलाज करवाया, जबकि उन्हें विदेशों तक इलाज करवाने के प्रस्ताव आसानी से मिल सकते थे. वहीँ अन्ना हजारे का दिल मेदान्ता सिटी जैसे पाँच सितारा अस्पताल पर आ गया और देश के जाने माने चिकित्सक नरेश त्राहेन उनकी सेवा में दिन रात जुटे रहे। मेरी समझ के अनुसार गाँधी जी और अन्ना हजारे के तौर तरीकों में दिन रात का अंतर है. गाँधी जी अतुलनीय थे, अतुलनीय हैं और अतुलनीय रहेंगे, मेरा सबसे निवेदन है की गाँधी जी की तुलना किसी से ना करें और उनका सम्मान बना रहने दें।

(आर के चौधरी पिछले 30 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं तथा उनकी गिनती जयपुर के जाने-माने पत्रकारों में होती है)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.