Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

क्या बेहतर टीवी पत्रकार नहीं होते अखबारों के लिखाड़ पत्रकार ?

By   /  April 21, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-राय तपन भारती||

एक दशक से अधिक समय पहले जब देश में निजी न्यूज टीवी चैनल अपने पांव पसारने लगे थे तो कई अखबारी पत्रकार टीवी से जुड़ते चले गए…वैसे भारत में सबसे पहले न्यूज टीवी की शुरुआत करने का श्रेय ZEE Group को जाता है. हरियाणा के मूल निवासी सुभाष चंद्र जी ने चावल के व्यापार से सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए न्यूज टीवी के कारोबार में बड़ी संभावना का आकलन कर लिया था. फिर स्टार न्यूज, जैन टीवी…इस तरह से मीडिया की इस नई विधा में कई न्यूज टीवी चैनलों को लाइसेंस मिल गए. मगर भारत में टीवी समाचार के कारोबार में तेजी 2001 में तब आई, जब इंडिया टुडे ग्रुप के पहले चैनल ‘आजतक’ को दिल्ली से लांच किया गया. उसके पहले ईटीवी कई क्षेत्रीय भाषाओं में खबरें देने लगा था.Reporter

तब धड़ाधड़ खुल रहे नए न्यूज टीवी चैनलों को अखबारी पत्रकारों की जरुरत थी, वे भाग्यशाली निकले जो दूरदर्शन या जी टीवी पर कुछ खबरी प्रोग्राम पेश करने वाले डॉ. प्रणब राय, विनोद दुआ, सुरेंद्र प्रताप सिंह, अनुराधा प्रसाद, रजत शर्मा और नलिनी सिंह की शुरुआती संपादकीय टीमों से जुड़ हुए थे. इनमें से कई लगभग मेरी उम्र और अनुभव के समकक्ष थे… अब तो इनमें से कई टीवी चैनलों के मैनेजिंग एडिटर या चैनल हेड तक बन गए हैं…मगर इन्हीं पत्रकारों ने बाद में अखबारों से टीवी में आने को इच्छुक बहुतेरे पत्रकारों को मीडिया की इस नई विधा में आने में खूब रोड़े अटकाए…

अब तक अखबारों में अटके पत्रकार न्यूज टीवी चैनल में बाइट, रन डाउन, पैकेजिंग,कॉपी राइटिंग, फोनो, वाक थ्रू से लेकर टीवी की हर विधा सीखने को वे तैयार थे मगर कइयों को आखिर तक अवसर नहीं मिला. उन्हें टका सा-जवाब मिला…40 या 45 साल के बाद अब आप टीवी की तकनीक क्या सीख पाएंगे…मगर मैंने उम्मीदें नहीं छोड़ी थीं…मुझे टीवी में पर्दे के पीछे यानी इनपुट को खबरें बताने का अनुभव चैनल-7 (अब आईबीएन-7) में रहा मगर टीवी का असली काम टोटल टीवी में सीखा और वहां मुझे तीन महीने में ही आउटपुट एडिटर बना दिया गया. टीवी में कहां क्या सीखा, कौन-सी खट्ठी-मीठी यादें अब तक याद हैं इस पर बाद में लिखूंगा..

पहले दिल्ली आने पर मैंने क्या देखा? महाराष्ट्र के मशहूर अखबार लोकमत समाचार में करीब 7 साल तक नौकरी करने के बाद हालात ने मुझे सनू 1996 में दिल्ली पहुंचा दिया तब संपादक नीशीथ जोशी जी (अभी अमर उजाला में संपादक) की रहनुमाई में सहारा ग्रुप के अखबार से जुड़ गया. उस वक्त देश में टीवी पत्रकारिता शुरू हो चुकी थी. तब दिल्ली में दो पुराने सहयोगी साथी न्यूज टीवी से जुड़ने जा रहे थे. इनमें उदयचंद्र सिंह (रांची में पाटलिपुत्र टाइम्स में सहयोगी) और पुण्य प्रसून वाजपेयी (नागपुर में लोकमत समाचार में मेरे सहयोगी थे) क्रमश: NDTv production house और आज तक की संपादकीय टीम में थे.

तब दूरदर्शन पर रात में आधे घंटे के लिए आज तक की बुलेटिन आती थी जिसे सुरेंद्र प्रताप सिंह पेश करते थे. उदय से मेरी अधिक और पुण्य से कम मुलाकातें होती थीं. पुण्य को मैं बधाई देना चाहूंगा कि मैंने उन्हें टेलीप्रिंटर पर एजेंसी की खबरें फाड़कर आज तक पर टिकर चलवाते देखा था. अब पुण्य को पूरा देश जानता है. मगर उदय अधिक मिलनसार थे, उन्होंने मुझे विजय त्रिवेदी, वर्तिका नंदा समेत कई टीवी पत्रकारों से मिलवाया. बरखा दत्त से भी मिलवाया. बरखा भूल गईं मगर शेष अब भी पहचान लेते हैं.

दैनिक राष्ट्रीय सहारा में मेरे साथ जनरल डेस्क पर प्रबल प्रताप सिंह मेरे सहयोगी थे, तब एक संपादक ने उन्हें रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क पर मेरे पास भेज दिया. बाद में वे पॉयनियर, ईटीवी, आज तक के रास्ते आईबीएन-7 में इनपुट संपादक बन गए…प्रबल ने अफगानिस्तान की टीवी रिपोर्टिंग से खूब नाम कमाया और बड़ा संपादक होने का गरुर आ जाने के कारण उनके पास हम जैसे लिखंदर अखबारी पत्रकारों के लिए समय नहीं था. मगर विजय त्रिवेदी, वर्तिका, मनोरंजन भारती, एनके सिंह (ईटीवी के वक्त) अच्छे से मिलते थे. एक बड़े ग्रुप में टीवी चैनल के एक सुलझे संपादक ने मुझे आउटपुट टीम में रखने का फैसला कर लिया था मगर दुर्भाग्यवश उनका सड़क हादसे में निधन हो गया. इस तरह से 12 साल पहले टीवी में आने की तमन्ना अधूरी रह गई.

उस वक्त राष्ट्रीय सहारा में मेरे साथी रहे पत्रकार ओंकारेश्वर पांडेय को सहारा समय टीवी में अच्छा ब्रेक मिला मगर वे न्यूज टीवी में आगे नहीं बढ़ सके. बहरहाल, उनकी पत्नी विजया भारती जी ने लोक गीत में अच्छा नाम कमाया. कभी रांची के प्रभात अखबार में साथी रहे दिनेश जुयाल अच्छी पत्रकारिता कर रहे हैं मगर उन्होंने टीवी के लिए कभी प्रयास नहीं किया. जुयाल टीवी में आते तो वे भी नामचीन टीवी पत्रकार होते. बहरहाल, वे अमर उजाला के मौजूदा बेहतरीन संपादकों में से एक हैं. एसएन विनोद जी प्रभात खबर और लोकमत समाचार में दो बार मेरे मुख्य संपादक रहे. उन्होंने मेरी रिपोर्टिंग पर भरोसा किया. लगनशील व मेहनती विनोद जी 65 साल के बाद कई टीवी चैनलों के हेड रहे मगर उनके साथ किसी टीवी में नहीं रहा इसलिए मुझे नहीं पता कि वे टीवी में तकनीकी ज्ञान कितना हासिल कर पाए?

सात-आठ साल पहले मुझे तीन अलग-अलग टीवी चैनलों में करीब तीन साल तक काम करने का मौका मिला. आउटपुट संपादकीय हेड पद तक पहुंचकर छह साल बाद मैं 2008 में वापस अखबार में लौट आया. उन टीवी चैनलों में मेरा अनुभव कैसा रहा इस पर आगे कभी विस्तार से लिखूंगा. टीवी की पत्रकारिता से दूर रहने पर भी राज्यसभा टीवी, न्यूज एक्सप्रेस, महुआ, आजाद, फोकस, हमार टीवी, लाइव इंडिया टीवी, सुदर्शन न्यूज टीवी जैसे तमाम चैनलों के अलावा आकाशवाणी पर लाइव डिबेट में भाग लेता रहा. दो साल पहले तक लोकसभा टीवी भी बुलाता था, मगर अब वहां मुझे शायद कांग्रेस का आलोचक पत्रकार समझकर नहीं बुलाया जाता है. फिलहाल तेजी से उभर रहे सुदर्शन न्यूज टीवी की नौकरी में होने के कारण आकाशवाणी छोड़कर किसी अन्य टीवी चैनल के डिबेट में भाग नहीं ले सकता. मुझे लगता है कि मैं चुनाव के ठीक पहले न्यूज टीवी चैनल में आ गया और किसी भी पत्रकार के लिए अपनी प्रतिभा साबित करने का यह सही वक्त माना जाता है.

(32 साल से प्रिंट-टीवी पत्रकारिता में पूर्णकालिक पत्रकार राय तपन भारती सुदर्शन न्यूज के बिजनेस एडिटर हैं और अगली किश्त में मीडिया की कुछ और बातें कहेंगे)

(लेखक का यह लेख उनके फेसबुक वॉल पर है)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 4 years ago on April 21, 2014
  • By:
  • Last Modified: April 21, 2014 @ 8:30 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: