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“गुजरात माडल” आख़िर क्या बला है..

By   /  April 27, 2014  /  2 Comments

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-अशोक कुमार पाण्डेय||

नरेंद्र मोदी और उनकी पिछलग्गू मीडिया ही नहीं बल्कि इनके प्रभाव में सवर्ण मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अक्सर यह कहता नज़र आता है कि जो माडल गुजरात में विकास के लिए अपनाया गया वह पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए. हालांकि न खुद मोदी, न मीडिया और न ही उनके समर्थक कभी यह बताते हैं कि आख़िर यह माडल है क्या और किस तरह से बाक़ी देश में अपनाई जा रही नीतियों से जुदा है. मोटे तौर पर उनका दावा होता है कि इससे विकास की गति बढ़ गयी है, विदेशी निवेश में तेज़ी आई है, मूलभूत सुविधाएं सर्वसुलभ हो गयी हैं और ग़रीबी में कमी आई है. यही नहीं उनका यह भी कहना है कि इसकी सहायता से भ्रष्टाचार में भी कमी आई है. ये बातें अंतिम और अप्रश्नेय सत्य की तरह कही जाती हैं और इन पर कोई सवाल कुफ्र से कम नहीं समझा जाता. लेकिन सवाल तो पूछे जायेंगे.narendra modi cartoon

2013 में प्रकाशित अतुल सूद द्वारा संपादित “पावर्टी एमिड्स्ट प्रास्पेरिटी : एसेज़ आन द ट्राजेक्ट्री आफ डेवलपमेंट इन गुजरात” में इस मिथक की बेहतर पड़ताल की गयी है. “गुजरात माडल” की विशेषताएँ चिन्हित करते हुए यह इसकी विकास रणनीति के दो प्रमुख अवयव रेखांकित करती है, “पहला, बंदरगाहों, रेल, रोड तथा ऊर्जा क्षेत्र में संवृद्धि के लिए निजी क्षेत्र का एकीकृत निवेश और दूसरा, औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र की संवृद्धि के लिए “ग्रीनफील्ड साइट्स” की तरह विशाल अन्तः क्षेत्रों का निर्माण जिनमें विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाएँ हों. साथ ही इन क्षेत्रों में निवेश करने वालों को भरपूर सब्सीडीज, रियायतें, करों में राहत, सस्ते ऋण तथा ऐसी अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई गयी हैं” देखा जाय तो इसमें नया कुछ नहीं है. विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़), विशेष निवेश क्षेत्र जैसी चीजें नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद पूरे देश में ही कमोबेश लागू हुई हैं. फिर “गुजरात माडल” देश के बाक़ी हिस्सों से अलग कहाँ है?

मूल रूप से देखा जाए तो न ही तरीकों में कोई मूलभूत फर्क है न ही परिणामों में. गुजरात में भी मूलभूत संरचनाएं गाँवों और कस्बों में विकसित करने की जगह ऐसे “विशेष क्षेत्रों” में की गयीं, जिनका उद्देश्य गुजरात के निवासियों को नहीं, बल्कि वहाँ निवेश करने आ रहे पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाना था. इसका स्वाभाविक असर ग़ैरबराबरी और विषमताओं में वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और ऐसी ज़रूरी मदों में खर्च की कमी और इसके चलते बदहाली में ही होना था. हम आगे देखेंगे कि वह हुआ भी. सूद उदाहरण देते हैं कि दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कारीडोर (DMIC) परियोजना की योजना इंगित करती है कि गुजरात को औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल सिंचाई और घरेलू उपयोग से हटाकर देना पड़ेगा. साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि 2039 तक यहाँ विस्थापित होकर आने वाले मज़दूरों और कामगारों की संख्या नौ लाख चालीस करोड़ होगी. लेकिन इस बात का कहीं ज़िक्र नहीं है कि इस बढ़ी हुई आबादी की पेयजल सहित दूसरी आधारभूत ज़रूरतें कैसे पूरी होंगी?

हाँ, गुजरात माडल दो स्तरों पर बाक़ी जगहों से अलग है. पहला तो यह कि यहाँ शक्ति और निर्णय का केंद्र पूरी तरह से एक व्यक्ति में सिमट गया है. मंत्रिमंडल तथा अन्य व्यवस्थाएं काग़ज़ में हैं लेकिन कैबिनेट की बैठकें शायद ही कभी होती हैं. सारी लोकतांत्रिक प्रणालियाँ पूरी तरह से एक व्यक्ति में केन्द्रित हो गयी हैं, असहमति की सभी संभावनाएँ समाप्त कर दी गयी हैं और मीडिया पर पूरी तरह से एकाधिकार जमा लिया गया है. मालिकान को उनके दूसरे व्यापारों के लिए अकूत सुविधाएँ (आगे विस्तार में) दे देने के बाद उनके अखबारों या चैनलों से वैसे भी सिर्फ सहमति का माहौल बनाने की ही उम्मीद की जा सकती है. दूसरी विशेषता जो इसी से जुड़ी हुई है, वह यह कि निजीकरण की इस मुहिम को सबसे अधिक आक्रामक तरीके से लागू करते हुए सभी परम्पराओं और जनहित के ख्यालात को ताक पर रख दिया गया है. कूंजीभूत कहे जाने वाले क्षेत्र, जैसे बंदरगाह, रेलवे, सड़कें और ऊर्जा, पारंपरिक रूप से सरकारों के ही नियंत्रण में रहे हैं क्योंकि इनसे जनता का व्यापक हित और सुरक्षा दोनों ही सीधे सीधे जुड़े हैं. लेकिन “गुजरात माडल” इस परम्परा और चिंता को तिरोहित कर इनका नियंत्रण सीधे सीधे निजी पूंजीपतियों को सौंप देता है. देश के और राज्यों में भी निजीकरण हुआ है लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ है कि इन चीजों के सम्बन्ध में सारे अधिकार और निर्णय लेने की सारी ताक़त कार्पोरेट्स के हाथों में सौंप दी गयी. उदाहरण के लिए बिल्ड ओन आपरेट ट्रांसफर (BOOT) के तहत बंदरगाहों को निजी हाथों में सौंपने के साथ आय सरकार के साथ साझा करने की जगह उन्हें “रायल्टी हालीडे” दे दिया गया यानि जितना शुल्क उगाहा जाएगा सब उनका, यह भी कारपोरेट ही तय करेंगे कि कितना शुल्क होगा और कैसे उगाहा जाएगा, निजी निवेशकों के लिए भूमि अधिग्रहीत करके बाज़ार दर से कम पर उपलब्ध कराई गयी. लाभ कमाने के लिए तीस बरस तक छूट ज़ारी रखने का प्रावधान किया गया और भी जाने क्या क्या! एक दूसरा उदाहरण नैनो तथा दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए टाटा को दी गयी सब्सीडी है. टाटा ने 29000 करोड़ के निवेश के बदले 0.1% ब्याज पर 9570 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया जिसका बीस साल तक कोई भुगतान नहीं करना है और बीस साल बाद भी मासिक क़िस्तों में ही भुगतान करना है. बाज़ार से काफी कम क़ीमत पर ज़मीन तो उपलब्ध कराई ही गयी साथ में इसके लिए स्टैम्प ड्यूटी, रजिस्ट्री के खर्चे और बिजली का भुगतान भी राज्य सरकार द्वारा ही किया गया. साथ में टैक्स ब्रेक जो दिया गया है उससे यह तय कर दिया गया कि टाटा की आमदनी का कोई हिस्सा गुजरात की जनता को आने वाले समय में नहीं मिलने वाला. और ऐसी सुविधाएँ पाने वाले टाटा अकेले नहीं हैं. रिलायंस, अदानी और तमाम लोगों को ये रेवड़ियाँ खुले हाथ बांटी गयी हैं. तब अगर ये सारे कारपोरेट नमो नमो का गान कर रहे हैं और इनके पैसों से चलने वाले टीवी चैनल अपनी बनाई हवा को लहर से सूनामी में तब्दील किये दे रहे हैं तो किमाश्चर्यम?

इस तरह इस कथित “नए” माडल में असल में कुछ नया है ही नहीं. यह विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं द्वारा सुझाया गया वही बाज़ार आधारित संवृद्धि का आक्रामक नव उदारवादी माडल ही है जिसे अपना कर लैटिन अमेरिका सहित तमाम देश बर्बाद हो गए. यह वही माडल है जिसे नब्बे के दशक से सारे देश में अपनाया जा रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि जहां बाकी जगहों पर इसे इतनी आक्रामकता से लागू न करके ग़रीब-गुरबे के लिए कुछ राहत योजनाएँ भी बनाई जाती हैं, किसानों के बारे में भी थोड़ा सोचा जाता है, लोकतांत्रिक प्रणाली के चलते असहमतियों और विरोधों के कारण आक्रामकता के नाखून कभी क़तर दिए जाते हैं वहीँ गुजरात में लोकतंत्र के बाने में चल रही तानाशाही ऐसी सभी असहमतियों और विरोधों के प्रति पूरी तरह से असहिष्णु है, हम आगे देखेंगे कि कैसे जनकल्याणकारी योजनाओं को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर देती है और दोनों हाथों से कार्पोरेट्स को सरकारी सुविधाओं की रेवड़ियाँ मुक्तहस्त लुटाते हुए नियम-क़ानून ताक पर रख देती है. देखा जाय तो “गुजरात माडल” एक तानाशाह की सरपरस्ती में कारोपोरेट्स को चरने के लिए मुक्त चारागाह उपलब्ध कराने का माडल है.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. mahendra gupta says:

    यह मॉडल नाम की बला इस चुनाव में ही देकने को मिली है आजकल राजनीती में इसके साथ कुछ और मॉडल भी दबी जुबान से हुंकार रहे हैं बिहार मॉडल,मध्यप्रदेश मॉडल,यू पी मॉडल और भी कुछ की चर्चा इन दिनों में सुने को मिली.पहली बार ऐसा हो रहा है क्योंकि एक राज्य के मुख्या मंत्री ने अपने किये कार्यों के आधार पर वोट मांग कर पी . एम बनने की इच्छा की.कोई भी एक पद्धति हर जगह कामयाब हो जरुरी नहीं पर उसका उद्धरण करना भी गलती नहीं.इसलिए इस पर ज्यादा जोर न दे कर किये कार्यों का मूलयांकन करना ही उप६युक्त होगा.

  2. यह मॉडल नाम की बला इस चुनाव में ही देकने को मिली है आजकल राजनीती में इसके साथ कुछ और मॉडल भी दबी जुबान से हुंकार रहे हैं बिहार मॉडल,मध्यप्रदेश मॉडल,यू पी मॉडल और भी कुछ की चर्चा इन दिनों में सुने को मिली.पहली बार ऐसा हो रहा है क्योंकि एक राज्य के मुख्या मंत्री ने अपने किये कार्यों के आधार पर वोट मांग कर पी . एम बनने की इच्छा की.कोई भी एक पद्धति हर जगह कामयाब हो जरुरी नहीं पर उसका उद्धरण करना भी गलती नहीं.इसलिए इस पर ज्यादा जोर न दे कर किये कार्यों का मूलयांकन करना ही उप६युक्त होगा.

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