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राजनीतिक पार्टियों की दबंगई..

By   /  April 28, 2014  /  No Comments

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-दीपेश नेगी||

विश्व के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है. पूरे विश्व की नजरें इस पर टिकी है. इसी का नतीजा है कि टाईम्स मैगजीन के 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में भारतीय नेता ही छाये रहे. भारतीय जनता पार्टी के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी, आप संयोजक अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस के राहुल  गांधी  ही मुख्य रूप से इसमें छाये रहे. टाईम पोल में सर्वाधिक सकारात्मक मत पाकर अब्बल नम्बर पर रहे आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल. यद्यपिे नरेन्द्र मोदी ने मत तो सर्वाधिक पाये लेकिन लगभग 74 प्रतिशत लोगों ने इन्हें नकारात्मक मत दिये. इसी सर्वे में कांग्रेस के राहुल गांधी 14वें स्थान पर रहे.  1930 में महात्मा गांधी ने इसी टाईम मैगजीन के पोल रिजल्ट में पहला स्थान पाया था. इतने सालों बाद यह दूसरा मौका है जब टाइम मैगजीन में किसी भारतीय ने पहला स्थान प्राप्त किया है.arvind kejriwal

1947 से अब तक हिचकोले खाता हमारा यह लोकतंत्र अभी तक सुरक्षित है तो केवल इसके नागरिकों की समझदारी के कारण नही तो इसके भाग्य विधाताओं ने तो इसको असुरक्षित रखने में कोई कोताही नहीं की. धनबलबाहुबल ही कम थे जो इन्होने धर्मवादजातिवाद और क्षेत्रवाद में भारतवर्ष को बाटने की कोशिश की. ये अपने मंसूबों में कामयाब हो भी जाते लेकिन इस देश की आम जनता की समझदारी और सूझबूझ के कारण ही हम गर्व से कह सकते है कि हाँ हम ही है विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के बाशिंदे.

16वीं लोकसभा के चुनावों में एक ओर जहाँ  कांग्रेस लगभग सरैण्डर ही कर चुकी है इसी कारण उसके कई मंत्री और वरिष्ठ नेता चुनाव ही नहीं लड रहे है भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस की इस दुर्दशा के लिए अपनी पार्टी को श्रेय दे रही है और यह ढिंढौरा पीटा जा रहा है कि कांग्रेस राज के भ्रष्टाचार भाजपा के कारण ही उजागर हो पाये जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है क्योंकि सूचना के अधिकार के तहत जागरूक जनता के द्वारा पूछे गये और मांगे गये जवाबों से भ्रष्टाचार की परत दर परत खुलती चली गयी.  बीजेपी 14वें आम चुनाव- 2004 के इण्डिया शाइनिंग के दुस्वप्न को भुला बैठी है और अबकी बार मोदी सरकार का दिवास्वप्न लेकर तथा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनाव पूर्व ही घोषित करवाकर अति आत्म विश्वास के साथ चुनावी मैदान में है. यह जानते हुए भी कि संसदीय प्रणाली में बहुमत प्राप्त दल अथवा गठबंधन के चुने हुए सांसद ही अपने आप में से ही नेता का चयन करते है. इस प्रक्रिया में भी लोकतांत्रिक विधि ही अपनायी जाती है. यद्यपि भारत में अभी तक व्यक्तिवाद अथवा वंशवाद ही हावी रहे हों. क्योंकि जैसा पहले ही कहा कि हमारे देश में लोकतंत्र के बचे रहने का कारण यहां  की आम जनता ही हैं क्योंकि अधिकतर राजनीतिक पार्टिया स्वंय ही अलोकतांत्रिक ढंग से प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी जैसी चलायी जा रहीं हैं.

विचारणीय प्रश्न यह भी है कि कांग्रेस और बीजेपी चुनावों में किसका पैसा खर्च कर रही है. जनता को यह पूछने का अधिकार भी इन्होंने छीन लिया है क्योंकि जब सीआईसी ने राजनीतिक दलों को आरटीआई के अधीन आने की बात की तो सारे राजनीतिक दल एक स्वर में इसका विरोध करने लगे. जनता क्यों न पूछे कि जिन हेलीकॉप्टर,  चौपरों और जेट विमानों का उपयोग कर रहें हैं उनका बोझ क्या राजनीतिक पार्टिया उठायेंगी !

बीजेपी के अनुसार पूरे देश में मोदी की लहर है और वाराणसी में मोदी की उम्मीदवारी के पर्चे भरने के बाद तो वह सुनामी में तब्दील हो गयी हैं तो कोई यह क्यों न पूछे कि यदि मोदी की लहर चल रही है तो मोदी दो जगहों से चुनाव क्यों लड रहे हैं क्या यह पैसे की बर्बादी नहीं है ! इसका जवाब कौन देगा. मोदी दोनों में से एक सीट छोडेंगे. जहाँ की सीट वह छोड देंगे वहाँ की जनता अपने आप को ठगा महसूस नहीं करेगी.

कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकर्ता जिनको बडे नेताओं का वरदहस्त प्राप्त है अपने इसी अति आत्म विश्वास के कारण और अपनी उदंडता से सारी सीमाये लांघ रहे हैं. अमेठी में कांग्रेस के कार्यकर्ता आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार डा कुमार विश्वास पर हमला कर रहे है. वहीं बीजेपी के कार्यकर्ता वाराणसी में अरविन्द केजरीवाल को सभाये तक नहीं करने दे रहे हैं. कांग्रेस और बीजेपी में यह आपसी सहमति नही ंतो और क्या है. क्या इन कार्यकर्ताओं को यह नहीं पता कि भारत को कोई भी नागरिक कहीं से भी चुनाव लड सकता है अब यह जनता के हाथ में है कि वह अपना मत किसे दे. लेकिन बीजेपी के कार्यकर्ता वाराणसी में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल का जगह जगह विरोध कर रहे हैं. ये लोग जिनको कि मोदी जी अपने से 30 मीटर दूर रखते है मोदी जी को अपने इन तथाकथित भक्तो पर भी विश्वास नहीं हैं तो वे जनता को कैसे विश्वास दिलाऐंगे और जनता मोदी जी पर कैसे विश्वास कर ले. क्या बीजेपी के ये कार्यकर्ता वर्षों से सत्ता सुख भोग रहीं कांग्रेस का इसी स्वर और अग्रेसन से विरोध करती है या कांग्रेस के कार्यकर्ता बीजेपी का विरोध करने के लिए निम्नस्तर तक जाते हैं. यहा सारी परम्परागत पार्टिया एक दूसरे का ध्यान रखती है और इनके बीच खिंची गयी अद्रष्य लक्ष्मण रेखा का ख्याल रखती हैं. चोर आया चोर आया सभी चिल्लाते हैं पर उस रेखा को कभी नहीं लांघते.

अरविन्द केजरीवाल ने इन मोदी भक्तों को बुलाकर इनके प्रश्नों का उत्तर देना चाहा और कोशिश की कि इनकी समस्याओं का समाधान किया जाय. अरविन्द ने इनके प्रश्नों का उत्तर दिया भी लेकिन सभा के बीच में हीं इनका हर-हर मोदी का अलाप जारी रहता है तथा ये लोग तर्क सुन ही नहीं सकते इनको केवल विरोध करना है बस ! अब यह जाच का विषय है कि किसकी सह पर ये उदंडता कर रहे हैं. क्योंकि इनको विरोघ के लिए विरोध करना है बस. इनकी कोई समस्या नहीं हैं पर प्रश्न वही कि जब मोदी की लहर है और कार्यकर्ता सहित मोदी भी जनता का विश्वास जीत चुके हैं तो उनकी जीत तो पक्की होनी चाहिए ! फिर केजरीवाल का ही विरोध क्योंपरम्परागत राजनीतिक पार्टियेां के कार्यकर्ताओं को वही नेता पसंद है जो इनसे एक दूरी बनाकर रखे और इन कार्यकर्ताओं को पहचाने भी न. जबकि इसी परम्परा को तोडने की कोशिश कर रहे है अरविन्द आज तक इन कार्यकर्ताओं ने इतने बडे नेता को अपने से संवाद करते पाया ही नहीं इनकी नजरों में तो वहीं नेता हैं जो  उडनखटोलों से सीधा मंच पर उतरे और ब्लैक कमाण्डों के घेरे में रहकर संबोधित करे और वहीं से सीधे उडनखटोले में चला जाय. उनका मन यह मानने को तैयार ही नहीं कि अरविन्द भी मोदी के बराबर या उनसे बडा नेता हो सकते है. कैसे माने क्योंकि इन तथाकथित भगवानों ने अपने आप को आम  आदमी से बहुत दूर कर लिया है. दिल्ली में भी तो यही हुआ. कल तक आम आदमी के बीच में रहने वाला एक अदना से आदमी विधायक बन बैठा तो इन तथाकथित कार्यकर्ताओं ने उसका उपहास उडाना शुरू कर दिया. क्योंकि इनको वह विधायक राश ही नहीं आया. इन्होंने तो आज तक वही नेता देखे जो जनता से एक निश्चित दूरी बना कर रखे और आम से खास हो जाये.

16वीं लोकसभा के चुनाव कई अर्थो में विस्मरणीय बनने जा रहे है. पहली बार परम्परागत राजनीति को दिशा देने का काम कर रहीं है आम आदमी पार्टी. आम आदमी पार्टी जो कि डेढ साल की बच्चा पार्टी है इसने कांग्रेस और बीजेपी के दांत खटटे कर रखे हैं. जहा एक ओर कांग्रेस पार्टी 2300 करोड से अधिक के फण्ड के साथ और भारतीय जनता पार्टी 1900 करोड से अधिक के पार्टी फण्ड के साथ चुनावी मैदान में हैं साथ हीं बसपा,सपा और अन्य राजनीतिक पार्टिया का बजट भी करोडों से कम नहीं है वहीं आम आदमी पार्टी के साथ है तो केवल ईमानदारीपारदर्शिता चरित्रवान और शिक्षित लोगों का साथ.

किसी का नारा है मुझको वोट दो किसी का हमको वोट दो लेकिन आम आदमी पार्टी का नारा है अपने आपको वोट दो. जनता और नेताओं की इसी परम्परा/लक्ष्मण रेखा को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं अरविन्द और उनकी आम आदमी पार्टी. इसी की बानगी प्रस्तुत करते हैं आप के कार्यकर्ता फिर वे चाहे दिल्ली में पिछले साल हुए विधान सभा चुनाव हों अथवा इसी 10 अप्रैल को हुए लोकसभा चुनाव इनके कार्यकर्ता पोलिंग स्टेशन के बाहर मतदाताओं की मदद के लिए लगाये गये हैल्प डैस्क मे आधुनिक गैजैट्स का प्रयोग करते पाये जाते है जबकि बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता वही पुराने ढर्रे पर चलते है. इस कारण आम आदमी पार्टी के हैल्प डैस्क पर मतदाताओं की भीड लगी रहती है.

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी ने जब इस परम्परागत राजनीति की कमियों को देखा तो उसमें जो मुख्य था वह यह कि यहाँ नेता भाषण तो खूब देते हैलेकिन पब्लिक डिबेट जैसी चीजों को इग्नोर करते है. ये नेता बडे घाघ होते हैं क्योंकि भाषणों के बीच में कोई टोका टोकी नहीं हो सकती बस तालिया बजती है.  इनको पता है कि डिबेट में पब्लिक के प्रश्नो से पार पाना इनके बस में ही नहीं. अरविन्द केजरीवाल ने जैसे दिल्ली में शीला दीक्षित को डिबेट के लिए ललकारा था वैसे ही लोकसभा चुनावों के लिए मोदी और राहुल को ललकार लगायी थी लेकिन जनता के प्रश्नों से बचते हमारे ये रहनुमा जनता से ही बचने की ही जुगत में लगे रहते है. न तो शीला दीक्षित आयी और न ही मोदी. हा कांग्रेस के किसी नेता ने इस डिबेट में शामिल होने की हामी भरी थी क्योंकि इनको पता था कि मोदी तो तैयार होगे नही तो यह डिबेट हो ही नहीं सकती. यद्यपि आधे से अधिक लोकसभा सीटों पर चुनाव हो चुके हैं तथापि एक स्वस्थ परम्परा की शुरूआत तो की जा सकती है देश के प्रबुद्व नागरिक इन तीनों नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए इस पैटिशन के द्वारा दबाव बनायें.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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