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सॉरी फ्रैंड्स… मैंने “नोटा” दबाया..

By   /  April 30, 2014  /  2 Comments

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-अभिरंजन कुमार||

सस्ती, फूहड़, सतही, घटिया, घिनौनी, वंशवादी, जातिवादी, सांप्रदायिक, ध्रुवीकरण वाली, समाज को बांटने वाली, गुमराह करने वाली, मुद्दों से भटकाने वाली, धनबल और बाहुबल के असर वाली, दोगली, भ्रष्ट, प्रतिगामी राजनीति के विरोध में मैंने “नोटा” दबाया।

इस चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल और उम्मीदवार ने मुझे प्रभावित नहीं किया। मुझे बेहद दुख और अफ़सोस के साथ दर्ज कराना पड़ रहा है कि इस चुनाव में राजनीति मुझे बीमार, कुंठित, अवसादग्रस्त और अब तक के निम्नतम स्तर पर दिखी। ज़्यादातर नेताओं के बारे में मेरी राय यह बनी कि उन्हें संसद में नहीं, बल्कि जनता के ख़र्च पर किसी अच्छे सर्वसुविधा-संपन्न उच्च टेक्नोलॉजी-युक्त अस्पताल में भेजा जाना चाहिए।

मैंने “नोटा” दबाया… देश के तमाम राजनीतिक दलों, नेताओं और उम्मीदवारों की उपरोक्त किस्म की राजनीति के ख़िलाफ़ अपना विरोध जताने के लिए।

मैंने “नोटा” दबाया… भारत के सुप्रीम कोर्ट के प्रति अपना सम्मान जताने के लिए, जिसने पिछले कुछ समय में अपनी छोटी-छोटी कोशिशों के ज़रिए ही सही, राजनीति को साफ़ करने की देश की जनता की बेचैनी को प्रतीकात्मक शक्ल देने की कोशिश की है।

मैंने “नोटा” दबाया… उन छोटे-छोटे आंदोलनों को अपनी “श्रद्धांजलि” देने के लिए, जो चंद महत्वाकांक्षी, स्वार्थलोलुप, धोखेबाज़, नौटंकीबाज़ लोगों की वजह से रास्ता भटककर अकाल-मृत्यु को शिकार हो गए।

और सबसे बड़ी बात यह कि मैंने “नोटा” दबाया… यह दर्ज कराने के लिए कि मुझे अपने बेगूसराय में, अपने बिहार में, अपने देश में… बेहतर राजनीति, बेहतर उम्मीदवार और बेहतर माहौल चाहिए। किसी ग़लत को चुनने और ग़लत किस्म की राजनीति को आगे बढ़ाने में कम से कम मैं भागीदार नहीं बन सकता, इसलिए मैंने “नोटा” दबाया।

जय बेगूसराय। जय बिहार। जय भारत।
जय हिन्दू। जय मुसलमान। जय सिख। जय ईसाई।
जय बहन। जय भाई।
जय बच्चे। जय बूढ़े। जय नौजवान।
जब सभी की जय होगी
तभी विजयी होगा हमारा हिन्दुस्तान।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. अच्छा किया हर एक को अपनी इच्छा से चलने का हक़ है , पर इतना गाने की क्या जरुरत है ?

  2. The old parliamentarian contest in present election have taken his pay, allowance & other facilities as parliamentarian did not opened his mouth intersessions , whenever p resent deserves NOTA

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