/खुद को नीची जाति का बता कर कैसी राजनीति की मोदी ने..

खुद को नीची जाति का बता कर कैसी राजनीति की मोदी ने..

मोदी लहर के सूत्रधार को ही पड़ गई खुद को नीच बता कर वोट मांगने की जरूरत..

-तेजवानी गिरधर||

योजनाबद्ध रूप से देशभर में अपनी लहर चला कर तीन सौ से ज्यादा सीटें हासिल करने का दावा करने वाले भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में खुद को नीच जाति का बता कर वोट मांगने की जरूरत पड़ गई. उन्होंने कांग्रेस की स्टार प्रचारक प्रियंका वाड्रा की ओर से किए गए पलटवार को ही हथियार बना कर जिस प्रकार नीची जाति की हमदर्दी हासिल करने कोशिश की, उससे साफ झलक रहा था कि वे भले ही ऊंची राजनीति के प्रणेता कहलाने लगे हैं, मगर वोट की खातिर नीची हरकत कर बैठे.narendra-modi-012

ज्ञातव्य है कि मोदी ने अमेठी में अपने एक भाषण में गांधी परिवार पर हमला करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर कटाक्ष किया था कि उन्होंने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री टी अंजैया को एयरपोर्ट पर सबके सामने अपमानित किया था. इस पर प्रियंका तिलमिला उठीं. उन्होंने पलटवार करते हुए कहा था कि मोदी ने अमेठी की धरती पर मेरे शहीद पिता का अपमान किया है, अमेठी की जनता इस हरकत को कभी माफ नहीं करेगी. इनकी नीच राजनीति का जवाब मेरे बूथ के कार्यकर्ता देंगे. अमेठी के एक-एक बूथ से जवाब आएगा. मोदी को जैसे ही लगा कि प्रियंका ने उनके एक बयान के प्रतिफल में लोगों की संवेदना हासिल करने की कोशिश की है, उन्होंने उससे भी बड़े पैमाने की संवेदना जुटाने का घटिया वार चल दिया. प्रियंका को बेटी जैसी होने का बता कर सदाशयता का परिचय देने वाले मोदी ने यह स्वीकार भी किया कि एक पुत्री को पिता के बारे में सुन का बुरा लगा होगा, तो सवाल ये उठता है कि अमेठी की धरती पर क्या ऐसा बयान देना जरूरी था?

नीची जाति का यह मुद्दा इलैक्ट्रॉनिक मीडिया पर पूरे दिन छाया रहा और सारे भाषाविद, चुनाव विश्लेषक और पत्रकारों ने साफ तौर पर कहा कि प्रियंका ने तो केवल नीची अर्थात घटिया राजनीति का आरोप लगाया था, मगर मोदी ने जानबूझ कर इसे अपनी नीची जाति से जोड़ कर हमदर्दी हासिल करने की कोशिश की है. यह सर्वविदित तथ्य है कि उन्हें आज तक किसी ने नीची जाति का कह कर संबोधित नहीं किया, बावजूद इसके उन्होंने खुद को नीची जाति का बता कर उसे भुनाने की कोशिश की है. पूर्वांचल के सिद्धार्थनगर, महराजगंज, बांसगांव और सलेमपुर में कथित नीची जातियों के वोट बटोरने के लिए उन्होंने यहां तक कहा कि मेरा चाहे जितना चाहे अपमान करो, लेकिन मेरे नीची जाति के भाइयों का अपमान मत करो. खुद को ही पत्थर मार के घायल करने के बाद लोगों की संवेदना हासिल करने की तर्ज पर उन्होंने यह तक कहा कि क्या नीची जाति में पैदा होना गुनाह है. ये जो महलों में रहते हैं, वे नीची जाति का मखौल उड़ाते हैं. उन्हें सुख-शांति इसीलिए मिल रही है क्योंकि सदियों से हम नीच जाति के लोगों ने, हमारे बाप-दादाओं ने अपना पसीना बहाया है ताकि उनकी चमक बरकरार रहे.

मोदी की इस हरकत पर सभी भौंचक्क थे कि चुनाव के आखिरी चरण में मोदी को ये क्या हो गया है? क्या उन्हें अपनी लहर, जिसे कि वे खुद सुनामी कहने लगे हैं, उस पर भरोसा नहीं रहा, जो इतने निचले स्तर पर उतर आए हैं? कहीं जरूरत से ज्यादा जाहिर किए गए आत्मविश्वास पर उन्हें संदेह तो नहीं हो रहा? जीत जाने के दंभ से भरे इस शख्स को यकायक अपनी नीची जाति कैसे याद आ गई? कहीं उन्हें खुद के नीची जाति में पैदा होने का मलाल तो नहीं साल रहा? कहीं वे इस बात से आत्मविमुग्ध तो नहीं कि वे नीची जाति का होने के बावजूद देश के सर्वाधिक ताकतवर पद पर पहुंचने जा रहे हैं? सवाल ये भी कि नीची जाति के प्रति उनकी इतनी ही हमदर्दी है तो जब बाबा रामदेव ने यह कह कर दलित महिलाओं का अपमान किया था कि राहुल गांधी उनके घरों में जा कर रातें बिताते हैं, तब वे चुप क्यों रह गए थे? अव्वल तो प्रियंका ने मोदी को नीची जाति का बताया ही नहीं, मगर यदि मोदी ने यह अर्थ निकाल भी लिया तो भी बाबा रामदेव का कृत्य तो उससे भी कई गुना अधिक घटिया था, तब क्यों नहीं उन्हें फटकारा कि इस प्रकार मेरी नीची जाति की महिलाओं को जलील न करें?

आश्चर्य तो तब हुआ, जब अरुण जेटली जैसे जाने-माने बुद्धिजीवी नेता ने खुदबखुद व्यथित हुए मोदी के सुर में सुर मिला कर कांग्रेस से माफी मांगने तक को कह डाला.
आपको याद होगा कि एक बार कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की ओर से उन्हें बचपन में चाय बेचने वाला बताने को पकड़ कर जो रट चालू की है, वह अब तक जारी है. चाय बेचने वाले, ठेले व रेहड़ी लगाने वालों की संवेदना हासिल करने के लिए पूरी भाजपा ने देशभर में नमो चाय की नौटंकी की थी. अमेठी में भी इसी रट को जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि हमें बार-बार चाय वाला कह कर गालियां दी गईं, जबकि सच्चाई ये है कि अय्यर के बाद कभी किसी ने इसका जिक्र नहीं किया, मगर मोदी सहित सभी भाजपा नेता बार-बार यह कह कर कि एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बनने जा रहा है तो यह कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं है, चाय बेचने को भी महिमा मंडित कर रहे हैं.

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर राजनीतिक विश्लेषक के रूप में जाने जाते हैं. दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं. राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं. वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.