/मायावती ने दलितों के किसी नेता को न आगे बढ़ने दिया और न पनपने..

मायावती ने दलितों के किसी नेता को न आगे बढ़ने दिया और न पनपने..

-अवधेश कुमार जाटव||

आश्चर्य होता है कि सतीश मिश्रा आज बसपा सुप्रीमों के सबसे करीब हैं। माया सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान वह अहम फैसलों के भागीदार रहे तो चुनाव के समय वह बसपा सुप्रीमों मायावती के साथ स्टार प्रचारक के रूप में देखे जा रहे हैं। कांशीराम के समय की बसपा और आज की बसपा की तुलना की जाए तो जमीन आसमान का फर्क नजर आता है। बसपा के लिए कांशीराम का महत्व उनके विचारों को आगे बढ़ाने की बजाए उनकी मूर्तिंयों की यहां-वहां स्थापना और दलितों के लुभाने भर के लिए रह गया है। बसपा को कुछ खास मौकों पर ही कांशीराम याद आते हैं।mayawati_kanshiram

अब बसपा में न वो तेवर रह गए हैं और न जुझारूपन जो मान्यवर कांशीराम के समय देखने को मिलता था। मान्यवर कांशीराम को करीब से जानने वाले आज भी उनका गुणगान करते नहीं थकते। वो कहते हैं- वो एक दौर था। कांशीराम के साथ साइकिलों पर प्रचार टीम चलती थी। मान्यवर का आदेश मिलते ही उनके संगी-साथी दीवारों पर लिख देते थे, ‘बाबा तेरा मिशन अछूरा, कांशीराम करेंगे पूरा।’ इन लोगों के साथ कांशीराम भी साइकिल से चलते थे। काडर बेस पार्टी हुआ करती थी। कांशीराम की सभा कराने के लिए लोग पहले चंदा एकत्र करते, फिर सभा होती। मिशन बस एक था। दलितों को संगठित करके उनमें स्वाभिमान पैदा किया जाए।

दलितों में स्वाभिमान जगाने के लिए जनजागरण अभियान और चेतना यात्राएं कभी न रूकने वाला सिलसिला हुआ करता था। इसके लिए कांशीराम द्वारा बाकायदा डीएस-4 नाम से संगठन बनाया गया था। डीएस-4 जनजागरण अभियान चलाता तो बामसेफ नामक संस्था सरकारी क्षेत्र के दलितों को संगठित करने का काम करता। बामसेफ ब्राहमणवादी व्यवस्था में बदलाव चाहता था। बामसेफ का गठन मान्यवर कांशीराम ने अपने कुछ मराठा मित्रों के साथ मिलकर 6 दिसंबर 1978 को किया था। बामसेफ ने ही 1984 में बसपा को जन्म दिया।

कांशीराम जी के समय में ऐसे लोग उनके साथ जुड़ते थे जिनके लिए दलित उत्थान का सपना एक मिशन जैसा था, लेकिन आज कमीशन वाले लोग संगठन में आ गए हैं। अब वो लोग कम से कम बसपा में तो दिखते ही नहीं हैं जिनका सरोकार दलित उत्थान से हो।’

आज जो लोग बसपा सुप्रीमों के बगलगीर हैं, उसमें सतीश मिश्र, रामवीर उपाध्याय, नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता हैं जिनका दलितों के उत्थान में कोई प्रमाणिक योगदान नहीं है। यह लोग बसपा को सत्ता तो दिला सकते हैं लेकिन दलितों के बारे में उनकी सोच सीमित है।

भले ही मायावती को आगे बढ़ाने मे कांशीराम का विशेष योगदान रहा हो लेकिन मायावती ने दलितों के किसी नेता को न आगे बढ़ने दिया और न पनपने। मायावती के कारण ही दलित हितों के लिए काम करने वाले कई आर.के चौधरी जैसे दलित नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया। माया ने कभी यह प्रयास नहीं किया कि प्रदेश और देश में बिखरे हुए दलितों के नेताओं को एक साथ, एक मंच पर लाया जाए। ताकि दलितों के स्वाभिमान की लड़ाई को मजबूती से लड़ा जा सके। मायावती अपने को दलितों का सबसे बड़ा हितैषी समझने का सपना पाले बैठी हैं। इसी चक्कर में दलित समाज का उतना भला नहीं हो पा रहा है जितना एकजुट होकर किया जा सकता है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.