Loading...
You are here:  Home  >  राजनीति  >  Current Article

ये कीचड़ के कमल…!!

By   /  May 24, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-तारकेश कुमार ओझा||
गांव – देहात की शादियों का अनुभव रखने वाले भलीभांति जानते हैं अमूमन हर बारात में कुछ पंडितजी टाइप बराती शामिल होते हैं. जो वधू पक्ष के दरवाजे पहुंचते ही उद्घघोषणा करवा देते हैं कि वे किसी का छुआ नहीं खाते. अलबत्ता मेजबान के सामने वे यह विकल्प जरूर रखते हैं कि मिल जाए तो वे फल – दूध व मिठाई का फलाहार जरूर कर सकते हैं. एेसे लोग कीचड़ के कमल की तरह होते हैं.newlotus

कीचड़ में कमल वाली कहावत अब काफी पुरानी और अप्रासंगिक या यूं कहें कि आउट डेटेड हो चुकी है. इसकी जगह अब कीचड़ के कमल की बात होनी चाहिए. कीचड़ में कमल की तरह कीचड़ के कमलों की भी खासियत यही है कि ये रहते तो कीचड़ के इर्द – गिर्द ही है, लेकिन उससे काफी ऊपर ये बिल्कुल खिले – खिले से रहते हैं कि हैं कीचड़ में लेकिन उससे सैकड़ों हाथ दूर भी. अब इस मामले की हो लीजिए. बारात में शामिल पंडितजी टाइप बारातियों ने अपेक्षा से कुछ ज्यादा ही तर माल भी उदरस्थ कर लिया, और देखने वालों के सामने भौंकाल भी टाइट कर ली, कि वे खाने – पीने के मामले में काफी परहेजी हैं. जल्द किसी का छुआ नहीं खाते.

एेसे कीचड़ के कमल आपको समाज के हर क्षेत्र में मिल जाएंगे. लेकिन राजनीति में इनकी बहुतायत है. नौकरी सरकारी हो हो या प्राइवेट , एेसे कीचड़ के कई कमल आपने देखे होंगे जो नौकरी में रहते हुए भी उसके प्रति वैराग्य भाव मन में रखते हैं. बात – बात में इस्तीफे की धमकी देते हुए कहते रहते हैं कि नौकरी तो मैं शौक से करता हूं. वर्ना मेरा इस्तीफा तो हमेशा मेरी जेब में पड़ा रहता है. राजनीति के क्षेत्र में एेसे तत्वों की अलग धाक है. एक थे विश्व नाथ प्रताप सिंह. जो थे तो राजा, लेकिन बोफोर्स और स्विस बैंक एकाउंट जैसे अपने कारनामों से देखते ही देखते देश के फकीर बन गए. फिर बन गए देश के प्रधानमंत्री. लेकिन कीचड़ के कमल की तरह बोफोर्स और स्विस बैंक की जगह पद संभालने के बाद उनकी बतकही की चर्चा में अक्सर यह मसला रहता था कि उन्हें टेलीविजन पर ज्यादा क्यों दिखाया जा रहा है.

सरकारी संस्थान है तो क्या , उन्हें इस पर इतना न दिखाया जाए , सप्ताह में दो – एक बार बहुत है. फिर अपने उप प्रधानमंत्री देवीलाल से रार व मंडल की राग . लिहाजा सरकार औंधे मुंह गिर गई. एक हैं अरविंद केजरीवाल . अक्सर खुद को बहुत छोटा आदमी बताने वाले ये जनाब एक दिन बड़ा आदमी यानी देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन छोटा आदमी वाले अपने तकियाकलाम से ऊबर नहीं सके. और एक दिन इस्तीफा देकर चलते बने.

एक और हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव. प्रतिष्टा के अनुरूप ही हैं पक्के समाजवादी. बेटे से लेकर भाईयों यहां तक कि भतीजों तक को समाज के काम में लगा रखा है. कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में हुए इलेक्शन में जनता ने इनकी झोली वोटों से भर दी , तो आम भारतीय पिता की तरह इन्होंने सत्ता की बागडोर अपने बेटे अखिलेश को सौंप दी. लेकिन कमाल देखिए कि अपने बेटे की सरकार के सबसे बड़े अालोचक भी खुद ही हैं. कभी बेटे को डपटते हुए भरी सभा में कहते हैं कि सरकार दलाल चला रहे हैं. सुधर जाओ वर्ना… वगैरह – वगैरह…. लोकसभा चुनाव 2014 में इनके अधिकांश उम्मीदवार जमीन पर औंधे मुंह गिरे , तो एेलान कर दिया मंत्री कमाई करेंगे तो यही होगा. देखिए है ना कमाल. इसी को कहते हैं कीचड़ में कमल की तरह खिले रहना. यानी सरकार की बुराई देख – समझ रहे हैं. लेकिन सरकार फिर भी चल रही है. उपवास की औपचारिकता भी निभ गई, और मौका देख कर फलाहार भी कर लिया.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक क्रांतिकारी सफर का दर्दनाक अंत..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: