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आमंत्रण के बहाने समूचे विश्व को सन्देश..

By   /  May 29, 2014  /  No Comments

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जिस दिन से नरेन्द्र मोदी के नाम की घोषणा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में हुई थी, उसी दिन से उन्हें आलोचनाओं का निशाना बनाया जा रहा है. कुछ लोगों ने देश छोड़ने की बात कही, कुछ लोगों की आँखों को उनका प्रधानमंत्री पद पर बैठना पसंद नहीं आया, कुछ लोगों ने अत्यंत आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग उनके लिए किया. बहरहाल तमाम आशंकाओं को दरकिनार करके नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री मनोनीत किये गए और वे इस पद की शपथ भी ले चुके हैं. विवादों के केंद्र में रहे उनके अनेक कार्यों की तरह ही उनके शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित अतिथियों पर भी विवाद आरम्भ हो गया. इसमें भी मुख्य रूप से विवाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को आमंत्रण भेजे जाने पर उठा. प्रथम दृष्टया इस खबर को सुनकर बुरा सा महसूस होता है. आखिर उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने की क्या आवश्यकता थी जिसने कदम-कदम पर देश के साथ छल किया है; हमारे जवानों को मौत के घात उतारा है; उनके सिरों को काट कर ले जाने के बाद उनका अपमान किया है; हमारे देश के बंदियों के साथ वहशियाना हरकतें की हैं. इस आमंत्रण पर याद आता है अटल बिहारी वाजपेयी जी का पाकिस्तान में बस ले जाना और पाकिस्तान द्वारा पीठ पीछे कारगिल घुसपैठ को अंजाम देना.Nawaz_Sharif_Narendra_Modi_360x270

यहाँ बुरा लगना इस कारण से भी अधिक शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि ऐसा माना जा रहा था कि भाजपा सत्ता में आते ही आतंकवाद पर, पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीयों पर, कश्मीर पर पाकिस्तान से दो टूक बात करेगी, पूर्व केंद्र सरकार की तरह ढीला-ढाला रवैया नहीं अपनाएगी. ऐसा न होने और अपने पहले औपचारिक समारोह में ही भाजपा द्वारा, मोदी द्वारा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर लिया गया. अब यदि इस फैसले की कूटनीतिज्ञ स्थिति को भी देखा-समझा जाये तो संभव है कि बहुत कुछ साफ़ दिखने लगे. यहाँ पहली बात ये जानने की है कि शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को ही आमंत्रित नहीं किया गया है. इसमें सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया है, जिसमें भारत, पाकिस्तान के साथ-साथ नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी शामिल हैं. राजनैतिक दृष्टि से दक्षिण एशियाई क्षेत्र का अपना ही महत्त्व है और इसमें भी भारत की भूमिका अत्यंत जिम्मेवारी वाली है. इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि सार्क देशों में एकमात्र भारत है जो नेतृत्व करने की क्षमता रखता है, नेतृत्व करने की स्थिति में है भी. सामरिक दृष्टि से भी इस क्षेत्र के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है. हिन्द महासागर क्षेत्र में वैश्विक महाशक्तियां लगातार कब्ज़ा करने की कोशिश में लगी रहती हैं. ऐसे में इस क्षेत्र में भारत के द्वारा शक्ति संतुलन की स्थिति बनाये रखने का प्रयास लगातार बना रहता है.

इस आमंत्रण के द्वारा भाजपा ने कई निशाने साधने का प्रयास किया है. एक तरफ उसने अपने पड़ोसी देशों के साथ अपनी तरफ से कटुता समाप्त करने की पहल को दर्शाया है तो नई सरकार के रूप में पाकिस्तान के साथ नई स्थिति बनाने की पहल की है. इस पहल का असर तुरंत होते भी देखा गया है. पाकिस्तान और श्रीलंका ने अपनी जेलों में बंद भारतीय मछुआरों को बिना शर्त रिहा कर दिया है. शपथ ग्रहण के बहाने सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को एकसाथ आमंत्रण से उनकी एकजुटता का परिचय वैश्विक समाज ने देखा है साथ ही उन फिरकापरस्त ताकतों को भी एक सन्देश गया है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि देशों में बैठकर भारत विरोधी कृत्यों को अंजाम देती रहती हैं. इन देशों को भी शपथ ग्रहण समारोह के द्वारा सीधा सा सन्देश देने सम्बन्धी कार्य किया गया है जिससे भविष्य में ये भी भारत विरोधी कृत्यों को रोकने, न करने की मानसिकता बना सकें क्योंकि इधर हाल के वर्षों में तत्कालीन केंद्र सरकार की सुस्ती, चुप्पी, निष्क्रियता से इन देशों के द्वारा भी भारत विरोधी बयानबाजी लगातार की जाती रही है. इस आमंत्रण से जहाँ सार्क देशों को भारतीय संप्रभुता की, भारतीय लोकतंत्र की हनक देखने को मिलेगी वहीं समूचा विश्व इस एकजुटता को देख हिन्द महासागर क्षेत्र में अवांछित घुसपैठ करने की कोशिश पर विराम लगाएगा.

सार्क देशों में शामिल पड़ोसी देशों का विगत लगभग एक दशक से भारत के प्रति रवैया भी सहयोगात्मक नहीं रहा है. पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार आतंकवाद हमेशा परेशानी पैदा करता रहता है वहीं नेपाल की सीमाओं से ऐसी घटनाएँ होने लगी थीं. इसके अलावा श्रीलंका, बांग्लादेश की तरफ से भी घुसपैठ, आतंकी हमले नियमित रूप से होते देखे जा रहे हैं. भूटान और मालदीव जैसे छोटे-छोटे देश भी यदा-कदा भारत को आँख दिखाने की जुर्रत करने लगे हैं. इसके पीछे विगत दस वर्षों से केंद्र सरकार की सुस्त और लचर विदेशनीति को जिम्मेवार माना जा सकता है. इस सुस्ती, चुप्पी और इन सार्क देशों के एक तरह से हमलावर होने के कारण अन्य वैश्विक महाशक्तियाँ, विशेष रूप से चीन और अमेरिका, इस बात को प्रचारित करने में जुट गईं कि हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को सार्क देशों ने स्वीकारना बंद कर दिया है. इस आमंत्रण से समूचे विश्व को ये सन्देश भी गया कि भारत आज भी हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा हेतु तत्पर है और शेष दक्षेस देश भी उसके साथ हैं. महज शपथ ग्रहण समारोह में सभी देशों के प्रतिनिधियों का आना, पाकिस्तान में अत्यंत विरोध के बावजूद नवाज़ शरीफ का आना अपने आपमें सार्थक और ठोस सन्देश समूचे विश्व को देता है.

इस निर्णय को अभी अंतिम नहीं स्वीकारना चाहिए क्योंकि अब सरकार अपने कार्यों को आरम्भ करेगी. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बिरयानी खाते हैं या मात्र दाल-रोटी ये एक अलग विषय है किन्तु यदि उस देश के द्वारा हर बार की तरह पीठ में छुरा भोंकने का काम किया जाता है, सीमापार से आतंकी घटनाओं को जारी रखा जाता है, भारतीय सुरक्षा, आज़ादी, अस्मिता से खिलवाड़ किया जाता है, भारतीय बंदियों की रिहाई हेतु सार्थक कदम नहीं उठाये जाते हैं, हिन्द महासागर क्षेत्र की सुरक्षा को खतरे में डाला जाता है तब पूरा देश वर्तमान निर्वाचित सरकार से किसी ठोस कदम की अपेक्षा रखेगी. यदि तब भी ऐसा नहीं हुआ, तब भी कूटनीति, विदेशनीति जैसे जुमलों का प्रयोग किया गया, तब भी शांतिवार्ता का राग अलापा गया तो ये वर्तमान सरकार की घनघोर नाकामी और जनता के प्रति किया गया विश्वासघात होगा. अभी नरेन्द्र मोदी को, नवगठित सरकार को कार्य करने देने का अवसर दिया जाये, जो कूटनीतिज्ञ पहल की गई है उसके परिणाम का इंतज़ार किया जाए. सरकार की ओर से भी इस बात के प्रयास किये जाएँ कि ये कूटनीति सार्थक सफलता प्राप्त करे न कि क्रिकेट, संगीत, महफ़िलों, वार्ताओं, यात्राओं में ही सिमटकर रह जाए.

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बुन्देलखण्ड के उरई-जालौन में जन्म। बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं बुन्देली भाषा-संस्कृति विकास, कन्या भ्रूण हत्या निवारण, सूचना का अधिकार अधिनियम, बाल अधिकार, पर्यावरण हेतु सतत व्यावहारिक क्रियाशीलता। साहित्यिक एवं मीडिया क्षेत्र में सक्रियता के चलते पत्र-पत्रिकाओं एवं अनेक वेबसाइट के लिए नियमित लेखन। एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन।
सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ और इंटरनैशनल रिसर्च जर्नल ‘मेनीफेस्टो’ का संपादन; सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ तथा ‘पीएचड होल्डर्स एसोसिएशन’ का संचालन; निदेशक-सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान; महाविद्यालय में अध्यापन कार्य।
सम्पर्क – www.kumarendra.com
ई-मेल – [email protected]
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