/ऊर्जा विकेंद्रीकरण एक बेहतर विकल्प..

ऊर्जा विकेंद्रीकरण एक बेहतर विकल्प..

-गोपालकृष्ण||

ऊर्जा बाजार में हो रहे बदलाव और शोध से लगता है कि सौर ऊर्जा की घटती कीमत के कारण परंपरागत प्रदूषणकारी ऊर्जा स्रोत कोयला और प्राकृतिक गैस आनेवाले समय में डायनासोर युगीन से प्रतीत होंगे. परमाणु ऊर्जा को दुनियाभर में चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है. कम से कम लागत वाले ऊर्जा प्रौद्योगिकि से परहेज करने वालो और बिजली उत्पादकों का पर्दाफाश हो रहा है. भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक देश है मगर 55 प्रतिशत ग्रामीण और 12 प्रतिशत शहरी परिवारों तक अभी भी बिजली नहीं पहुंची है.energy

इस महीने की शुरुआत में हिमगिरी एनर्जी वेंचर्स की सौर ऊर्जा द्वारा 6.5 रुपये प्रति यूनिट की बोली को मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य ग्रिड में आपूर्ति करने के लिए स्वीकार कर लिया. यह कदम गौर कंरने लायक है क्योंकि भारतीय ऊर्जा उद्दोग की आपूर्ति  दर से 61 प्रतिशत कम है. इस तरह सौर ऊर्जा का दर भारत के सबसे बड़ा स्रोत-कोयला या गैस से उत्पादित थर्मल बिजली के करीब पहुँच गया है. मगर अक्षय ऊर्जा को ग्रिड में पहुंचाकर फिर बिजली के वितरण में होनेवाले नुकसान की वर्तमान स्थिति से भी निजात पाना अभी बाकी है.

भारत  की सौर क्षमता 1,759 मेगावाट है. अनुमान है कि 2022 तक भारत कि सौर क्षमता 22,000 मेगावाट तक पहुँच जायेगी. जर्मनी जैसे देश में 36,000 मेगावाट की सौर क्षमता है. भारत को 5 000 से 6000 ट्रिलियन किलोवाट आवर सौर ऊर्जा मिलती  है. वर्तमान में भारत का सम्पूर्ण ऊर्जा खपत 3 ट्रिलियन  किलोवाट आवर प्रति वर्ष है. एक ट्रिलियन में दस खरब होता है और किलोवाट आवर ऊर्जा का यूनिट है जो 1,000 वाट -आवर के बराबर है. 1,000 वाट का हीटर यदि एक घंटे तक चलता है तो वह 1 किलोवाट आवर के ऊर्जाका इस्तेमाल करता है.
ऐसे में सियासी दलो को अपने घोषणा पत्रो में ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा के सम्बन्ध में अपने नजरिये का खुलासा करना चाहिए.

गौर तलब है कि 2012-13 के लिए दिल्ली की बिजली कंपनियों ने एक यूनिट की औसत कीमत 5.71 रुपये पर पारंपरिक बिजली खरीदने का दावा पेश किया था. अब सौर और परंपरागत प्रदूषणकारी बिजली ऊर्जा स्रोत में सिर्फ 14 फीसदी का अंतर रह गया है. सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए मुफ्त और पर्याप्त धूप और सौर उपकरणों की गिरती कीमत ऊर्जा क्षेत्र को एक नए दिशा ले जा रहा है. ऐसा अनुमान है कि 2017 तक पवन ऊर्जा कि तरह आने वाले दिनों में सौर ऊर्जा
में भी कीमतो का अंतर नहीं रहेगा.

उपभोक्ता के स्तर पर स्वतंत्र रूप से 20 घरो के लिए 150  वाट और 40 घरो के लिए 5  किलो वाट के छोटे माइक्रो ग्रिड बनाकर ग्रामीण क्षेत्र की ऊर्जा जरुरतो को पूरा किया जा रहै है. ऐसा लग रहा है कि जैसे अक्षय ऊर्जा टेलिकॉम के रास्ते चल पड़ी है जो बिना बड़े केंद्रित ग्रिड के ज्यादा कारगर है. एक छोटे माइक्रो ग्रिड में सौर पैनलो को गावं  के बीचबीच के स्थापित करते है. ये पैनल दिन में सौर ऊर्जा पैदा कर के बैटरी में इकठा कर लेते है. इस ऊर्जा को ग्रिड से जुड़े घरो को 7  घण्टे के लिए बिजली मिलती है और हरेक घर 2  बल्ब, 1 पंखा और एक मोबाइल चार्जकरने के पॉइंट के लिए 120रुपये प्रति माह भुगतान करते है.

ऐसे में गौर तलब बात यह कि अक्षय ऊर्जा के तरफ बढ़ते कदम विकेन्द्रीत ऊर्जा संग्रहण और विकेंद्रीत वितरण की राह के बजाये कही पुराने और अदूरदर्शी केन्द्रीत ऊर्जा संग्रहण और केंद्रीत वितरण कि राह न अख्तियार कर ले. विकेन्द्रीत ऊर्जा संग्रहण और विकेंद्रीत वितरण से अरबों के पूंजी निवेश से बचा सकता है और 40 प्रतिशत तक बिजली की लागत कम हो सकती है. इससे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती कि जा सकती है और बिजली से वंचित लोगो तक बिजली पहुंचाई जा सकती है. केंद्रीत बिजली संयंत्रों और स्टेशनों के कारण जो विस्थापित हुए है उन लोगों के अभिशाप से बिजली उपभोक्ताओं को आजाद कराने के लिए विकेन्द्रीत मार्ग का कोई विकल्प नहीं है.

16 वीं लोकसभा का चुनाव ऐतिहासिक बन सकता है अगर सियासी जमात ऊर्जा नये मुहैया कराने और विकेन्द्रीत बिजली उत्पादन और विकेन्द्रीत बिजली वितरण पथ को अपनाने की  शपथ ले ले. सियासी दलो को जुलाई 2012 में उत्तरी, पूर्वी और उत्तर पूर्वी ग्रिड कि असफलता और अंधकार से सबक लेना होगा. इस अंधकार से सीधे तौर पर 8 राज्य और परोक्ष तौर पर 20 राज्य प्रभावित हुए थे. भूमिगत खान और खदानो में सैकड़ों श्रमिक अंधकार से  फंस गए थे और देश रुक सा गया था. ऐसे में भारत को भूटान से 8,200 मेगावाट ऊर्जा की मांग करनी पड़ी थी.

रोजमर्रा के कामकाज में पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया और उसकी सहायक कंपनिया बिजली कंपनियों से बिजली खरीद कर और वितरण कंपनियों को बेचती है और वे अपने नेटवर्क के माध्यम से इसे उपभोक्ताओं को बेचते हैं. उन्हें बड़े पैमाने पर जारी ऊर्जा अन्याय की कोई परवाह नहीं होती. यह तथ्य भी सामने आया कि कुछ अलोकतांत्रिक संस्थाए अपनी पात्रता से अधिक बिजली ग्रिड से ले रहे हैं और उन्हें मौसमी ऊर्जा मांग में वृद्धि से कोई मतलब नहीं होता. योजना आयोग के मुताबिक 35-55 प्रतिशत ऊर्जा का नुकसान लंबी दूरी पर उपयोगकर्ताओं के लिए बिजली वितरण में हो जाता है.ऐसे में बड़े बिजली संयंत्रों के निर्माण और केन्द्रीत वितरण की पुरानी आदत और प्रलोभन को त्यागना होगा.

ऐसी स्थिति से निजात के लिए विकेन्द्रीत अक्षय ऊर्जा उत्पादन और वितरण ही एक प्रणाली है जो ऊर्जा न्याय को बहाल कर दूर-दराज तक पहुँचा पायेगा. एक दस्तावेज ‘ ऊर्जा के बारे में गंभीर सोच : बिजली की विकेंद्रीत उत्पादन के लिए प्रकरण ‘ पिछले 30 वर्षों में नई विद्युत उत्पादन तंत्र के निर्माण करने के लिए आर्थिक रूप से बेहतर रास्ते के बारे में व्यापक शोध पर आधारित है, जिसका निष्कर्ष है कि ऊर्जा के क्षेत्र में “केंद्रीय उत्पादन प्रतिमान” की सतत और लगभग सार्वभौमिक स्वीकृति गलत है. ऊर्जा कंपनियां  केंद्रीय उत्पादन को तरजीह देती रही है. पारंपरिक केंद्रीय उत्पादन प्रतिमान पिछली सदी की तकनीक पर आधारित है जो बेहतर ऊर्जा निर्णयों से बचता है. एक समग्र प्रणाली के संदर्भ में विकेन्द्रीकृत उत्पादन के बेहतर पर्यावरणीय प्रभाव का तर्क भी काफी मजबूत है. विकेंद्रीत उत्पादन का इस्तेमाल थॉमस एडीसन ने अपनी पहली व्यावसायिक बिजली संयंत्र के निर्माण में किया था.

विकेन्द्रीत अक्षय ऊर्जा उत्पादकों और वितरकों को प्रोत्साहन देकर उपभोक्ताओं को और ग्रिड से जुड़े खिलाड़ियों को बराबर किया जा सकता है. विकेन्द्रीत ग्रिड से अपने हिस्से से ज्यादा बिजली ले लेने की समस्या जिसके कारण जुलाई २०१२ में देश अंधकारमय हो गया था उसकी गुंजाईश ही नहीं रहेगी. सियासी दलो को विशाल केन्द्रीत ग्रिड कनेक्शन के जुनून पर दोबारा गौर करना होगा और 60 के दशक के बिजली उत्पादन और वितरण सबंधी धारणाओ से मुक्त होना होगा.

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