Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

राजेन्द्र माथुर मूलत एक चाटुकारिता पसंन्द इंसान थे..

By   /  May 28, 2014  /  No Comments

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

-राजीव नयन बहुगुणा||

मेरे सम्पादक – मेरे संतापक

इसी लिए कोई भी उनको ठग लेता था. अपनी ज़रा सी श्लाघा पर खुश हो जाते और विपरीत वाक्य पर क्रोधित. अंग्रेजी के पत्रकार उनसे अतिशय भयभीत रहते थे, क्योकि जब क्रोधित होते तो माथुर बाबा उनकी हज़ार गलतियाँ निकाल लेते थे.Rajendra-Mathur

राजेन्द्र माथुर अजब ढंग के अकडू आदमी थे . उस दौर में हिंदी पत्रकारिता का दबदबा था और नव भारत टाइम्स उसका सिरमौर . सुनते हैं कि एक बारतत्कालीन पी एम राजीव गांधी ने उन्हें डिनर का न्योता भेजा . माथुर ने कहलाया कि भोजन के लायक अनुकूल वेतन मुझे मिलता है . यद्यपि वह राजीव गांधी के हित में निरंतर लेखन करते थे.

राजेन्द्र माथुर स्वयम को अंग्रेज़ी दां सिद्ध करने का अभिक्रम करते थे , लेकिन मूलतः इस उपक्रम में खुद को ही छलते थे . अंग्रेज़ी के पारंगत अवश्य थे पर मन से ठेठ देहाती . एक शाम मुझे दफ्तर के बाहर ढाबे पर मिले . बोले – कहीं छोड़ दूँ क्या ? और फिर मेरे प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किये बगैर कार का पट खोल मुझे साथ ले चले . मैं पहले ही अन्यत्र उल्लेख कर चुका हूँ कि कार खुद हांकते थे . अम्बेसेडर कार खुद चलाने वाले मैंने सिर्फ दो बड़े लोग देखे . एक मन मोहन सिंह और दूजे माथुर बाबा.

पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें..

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email
  • Published: 4 years ago on May 28, 2014
  • By:
  • Last Modified: May 28, 2014 @ 9:05 am
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

एक जज की मौत : The Caravan की सिहरा देने वाली वह स्‍टोरी जिस पर मीडिया चुप है..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: