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शिक्षामंत्री से नैतिकता की उम्मीद..

By   /  May 28, 2014  /  2 Comments

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मैंने कल भी लिखा था कि औपचारिक शिक्षा का महत्त्व नहीं, अगर कोई गुणी हो। फिर भी लोग अब्राहम लिंकन से लेकर बिल गेट्स और रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, राबड़ी देवी, धीरूबाई अंबानी आदि के उदाहरण दे रहे हैं। इस सूची को बहुत लंबा किया जा सकता है। और वाजिब ढंग से। इसमें किसे शक है कि नगण्य या कम औपचारिक योग्यता रखने वाले श्रेष्ठ राजनेता और शासक हुए हैं; बगैर व्यापार की डिग्री लिए मारवाड़ी समुदाय ने देश के अधिकांश व्यापार को संभाला है, वहीं एमबीए किए लोग हमने व्यवसाय में विफल होते भी देखे हैं। पर्याप्त योग्यता वाले मनमोहन सिंह का उदाहरण ताजा दम है।smriti-irani2

लेकिन निरर्थक आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच जो सवाल बचा रहता वह यह है कि क्या स्मृति ईरानी शिक्षा जैसे बड़े और संवेदनशील महकमे को देखने के योग्य हैं? वे खुद भले अधिक शिक्षित नहीं, पर शिक्षा की उन्हें कितनी समझ है? क्या वे प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, अनौपचारिक शिक्षा, पेशेगत शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और भाषा शिक्षण जैसे विभागों की पेचीदिगयों और चुनौतियों को समझती हैं, जिनसे उनका वास्ता पड़ने वाला है। कहा जा सकता है कि इंतजार करना चाहिए। मगर यहीं यह भी पूछा जा सकता है कि आखिर कोई मंत्रालय योग्यता (औपचारिक शिक्षा नहीं, काबिलियत) का विचार कर तो दिया ही जाता होगा। श्रीमती ईरानी को शिक्षा मंत्रालय ही क्यों? यह सवाल इसलिए अहम हो जाता है क्योंकि मोदी सरकार के संबंध में जो उम्मीदें पैदा की गईं, उनमें एक यह भी थी कि वे कुछ मंत्रालयों में टैक्नोक्रेट्स या विषय के विशेषज्ञ भी लाने वाले हैं।

वास्तविक योग्यता की इस बहस में चुनाव के दौरान प्रस्तुत स्मृति ईरानी के दो नामांकन पत्र यह संदेह भी पैदा कर रहे हैं कि उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा को लेकर गलतबयानी की। 2004 में उन्होंने कहा कि वे बीए यानी स्नातक हैं। 2014 में उन्होंने महज बीकॉम, पार्ट-1 का दावा किया। तो क्या वे स्नातक नहीं हैं? यह सवाल मंत्री पद के लिए उनकी योग्यता से भले संबंध न रखता हो, लेकिन शिक्षा मंत्री जैसे पद के नैतिक तकाजे से संबंध जरूर रखता है। शिक्षा का नैतिकता से बड़ा गहरा नाता है, दोस्तो!

(जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. जहाँ तक बात नैतिकता की है , वह होनी ही चाहिए , पर भारतीय राजनीति में इस सम्बन्ध में बात करना कुछ अजीब, व कुछ हास्यास्पद लगता है। राजनीति में नैतिकता का युग शास्त्रीजी के बाद समाप्त ही हो गया अब कोई भी नेता,पार्टी , व राजनीतिक परिवार इसकी बात करता है तो वह जनता को मूर्ख बनाने के अलावा और कुछ नहीं है

  2. जहाँ तक बात नैतिकता की है , वह होनी ही चाहिए , पर भारतीय राजनीति में इस सम्बन्ध में बात करना कुछ अजीब, व कुछ हास्यास्पद लगता है। राजनीति में नैतिकता का युग शास्त्रीजी के बाद समाप्त ही हो गया अब कोई भी नेता,पार्टी , व राजनीतिक परिवार इसकी बात करता है तो वह जनता को मूर्ख बनाने के अलावा और कुछ नहीं है

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