/चुनाव परिणाम और अस्मिता तथा सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने चुनौतियां..

चुनाव परिणाम और अस्मिता तथा सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने चुनौतियां..

-संजीव चन्दन||

गुजरात की घांची जाति से आने वाले नरेंद्र मोदी की होने वाली ताजपोशी के साथ एच डी देवगौडा के बाद पिछडी जाति से प्रधानमंत्री बनने की यह दूसरी घटना होगी. गुजरात सरकार के अनुसार 1994 में घांची जाति को ओबीसी के रूप में सूचिबद्ध कर दिया गया था , इसके पूर्व यह जाति सामान्य वर्ग में थी , ठीक वैसे ही जैसे मार्च 2014 के पहले तक जाट सामान्य वर्ग की जाति थी. इस हिसाब से  जाटों को भी जोडकर ओबीसी से प्रधानमंत्री बनने की यह तीसरी घटना है, और चौधरी चरण सिंह पहले ओबीसी नेता कहे जा सकते हैं, जो इस देश के प्रधानमंत्री हुए.   सरकारी तौर पर यदि ओ बी सी की सूचिबद्धता के दायरे से मुक्त होकर देखा जाय तो सामाजिक श्रेणीबद्धता के आधार  पर आजादी के बाद ये तीनों ही प्रधानमंत्री मध्य जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं.modi-narendra

मध्य जाति से इस ताजा ताजपोशी के साथ कुछ अंतर्विरोधात्मक राजनीतिक स्थितियां भी उभरीं, जिसे 90 के बाद की भारतीय राजनीति के परिपेक्ष में समझा जाना चाहिए. इन्हें समझते हुए ह्म अस्मिता की राजनीति, जिसे इसके विरोधी जातिवादी राजानीति मानते हैं,  की भारतीय राजनीति में दखल को समझ पायेंगे और साथ ही उसके सामने की चुनौतियों को भी. इन्हें समझते हुए संघ परिवार के हिन्दुत्व की राजनीति की नई शैली को भी समझा जा सकता है, जिसने इन चुनावों में अनपेक्षित परिणाम दिये. खुद संघ भी परिणाम आने के पूर्व अपने सर्वेक्षणों में भाजपा और एन डी ए को 272 से कम सीटों पर सिमटता हुआ देख रहा था .
जातिवादी राजनीति  ( अस्मिता की राजनीति ) की सबसे बडी विरोधी भाजपा और उसके नेता नरेंद्र  मोदी ने खुद को पिछडा, चायवाला गरीब बताने में कोई कोर कसर नहीं छोडी.

चुनाव के अंतिम चरणों में कांग्रेसी खेमे से आये ‘ नीच राजनीति’ जुमले को मोदी ने पिछ्डी और दलित जातियों से जोड कर इस समूह का समर्थन लेने के लिए अंतिम कारगर तीर छोडा. नरेंद्र मोदी ने चुनावी अभियान के दौरान ही 14 अप्रैल को डा.अंबेडकर की जयंती का भरपूर फायदा उठाया और अपने भाषण को डा.अंबेडकर पर केन्द्रित करके दलित मन को  सहलाया . ऐसा भी नहीं है कि अस्मिता की राजनीति को साधने का ये कोई मौसमी प्रयास थे . बिहार में नरेंद्र मोदी और राज्य के भाजपा नेता सुशील मोदी को पिछडा नेता बताते हुए भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग बहुत पहले से प्रारंभ हो चुकी थी. दलित अस्मिता के प्रतीक पुरुषों , मिथकों के साथ भाजपा  खुद को सहज प्रदर्शित करते हुए उनका विश्वास जीतने में लगी थी. बिहार में ब्राह्मणवाद विरोधी जाति की अस्मिता के प्रतीक रहे हैं चुहड़मल, जिन्होंने ऊंची जाति की लड़की से प्यार किया था .बिहार के मोकामा के क्षेत्र में जन्में इस महान प्रेमी से ऊंची जातियां (खासकर भूमिहार जाति) नफरत करती हैं. दुसाध जाति के लोग इन्हें अपने प्रतीक के रूप में स्थापित करते हैं, उनकी जयंती बडे पैमाने पर मनाते हैं.

भाजपा के द्वारा बाबा चुहडमल की जयंती मनाना भूमिहारों को अपना ठोस वोट बैंक मानते हुए भी  दलितों के वोट बैंक में सेध लगाने की रणनीति का ही हिस्सा था. चुहडमल एक ऐसी जाति के प्रतीक पुरुष हैं, जो ब्राह्मणवाद और हिन्दुत्व  के खिलाफ बिहार में सबसे बडी चुनौती रहे है . इतिहासकार हेतुकर झा ने  इन्हें बौद्ध घोषित करते हुए लिखा है कि ब्राह्मणों ने इन्हें ‘ दुःसाध्य’  कहा था . ये बज्रयानी बौद्ध थे, जिन्हें जीतना  ब्राह्मणों के लिए कठिन था . हेतुकर झा ने मिथिला पेंटिंग का जनक भी इसी जाति को माना है. हालांकि धीरे –धीरे  दुःसाध्य ‘ दुसाध’ के रूप में अपभ्रंश हुए और हिन्दुत्व के दायरे में आते गये.

बिहार, उत्तरप्रदेश को लक्ष्य में रखते हुए ही भाजपा और संघ परिवार ने न सिर्फ दलित अस्मिता के ऐसे प्रतीकों को मान देना शुरु किया था, या मोदी को अतिपिछडा बताना शुरु किया था , बल्कि दलित और पिछडे नेताओं को गठबंधन का हिस्सा बनाने के लिए सवर्ण नेताओं की नाराजगी मोल लेने से भी परहेज नहीं किया . महाराष्ट्र, जहां दलित आंदोलन का लम्बा इतिहास है, उसको भी इस प्रक्रिया से ही साधा गया , जहां रामदास अठावले को हर कीमत पर भाजपा ने अपने साथ जोडा और राज्य में अपेक्षित परिणाम हासिल किये. आलम सबके सामने है अस्मिता की राजनीति करने वाली पार्टियों को भारी नुकसान हुआ .

बहुजन समाज पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई, जबकि उसे पिछ्ले लोकसभा से 9 लाख अधिक वोट मिले. समाजवादी पार्टी अपने परिवार के सद्स्यों के साथ बमुश्किल 5 सीटें ही हासिल कर सकी और बिहार में अस्मिता और सामाजिक न्याय की अगुआ पार्टियां , राजद और जदयू भी कुलमिला कर आधा दर्जन सीटों पर सिमट गईं. हालत तो यह भी हो गई कि बहुजन समाज पार्टी, महाराष्ट्र की रिप्बलिकन पार्टियों की तरह दलित मतों तक सिमट कर रह गई , यानी महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश में ये पार्टियां क्रमशः 18.5 % और 21 % प्रतिशत दलित मतदाताओं की पर्टियां भर रह गई हैं, जिसके दावेदार और भी हैं.

संघ परिवार को दलित–पिछडी अस्मिता को साधने की एक पृष्ठभूमि भी उप्लब्ध थी. भाजपा में कांग्रेस या दूसरी अन्य पार्टियों की तुलना में पिछडा प्रतिनिधित्व बेहतर रहा है. दलित राजनीति ही उनके लिए दुःसाध्य रही है, जिसे इस बार उन्होंने दलित नेताओं को अपने साथ लेकर साधने की कोशिश की और आंशिक रूप से सफल भी हुए. दलित नेताओं और दलित जनता को भाजपा के प्रति सहज होने के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी उपलब्ध है. . देश भर का दलित मन डा बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से गहरे जुडा है , उन्हें भारत रत्न की  उपाधि  गैरकांग्रेसी सरकार में मिली, तब वीपी सिंह प्रधानमंत्री हुआ करते थे. 26 अलीपुर रोड , जहां डा अंबेडकर का परिनिर्वाण ( निधन ) हुआ था , को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का काम  अटलबिहारी वाजपयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने किया था.

डा अंबेडकर का रिश्ता कांग्रेस के साथ कभी मधुर नहीं रहा था, दलितों की स्मृति में आज भी पुणे पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध गांधी -अंबेडकर समझौता शूल की तरह गडा है. बाबा साहब के कहे और लिखे को अक्षरशः मानने वाली शिक्षित दलित चेतना में डा अंबेडकर की पुकार कि ‘दलित कांग्रेस के चबनिया मेम्बर भी नहीं बनें’, पूरी तरह पैठा हुआ है. उन्होंने अपनी किताब ‘गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के लिए क्या किया’ में यह आह्वान दलितों से किया था. हालांकि इतिहास इसके विपरीत भी है, जब दलितों–पिछडों के हित में मंडल आयोग लागू किया जा रहा था, तो भाजपा की कमंडल राजनीति के सारथी बने थे नरेंद्र मोदी और  भाजपा की छात्र -साखायें ही मंडल के विरोध में सडकों पर आक्रामक थीं. भाजपा के इस चरित्र को उसके विरोधी प्रचारित करने में असफल हुए.

सवाल यह है कि तो क्या 16वीं लोकसभा के परिणाम को भारत में अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति के अवसान के रूप में देखा जाय, जैसे वामपंथ की राजनीति भी धीरे- धीरे सिमटती जा रही है, या इससे उबरना संभव हो पायेगा. आज जो हालात हैं, उसके जिम्मेवार अस्मिता की राजनीति का नेतृत्व भी है, यह सिर्फ संघ की इंजीनियरिंग का परिणाम नहीं है. हिन्दी पट्टी के सामाजिक न्याय के पुरोधा  लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती और नीतिश कुमार ने अपनी–अपनी ऐतिहासिक भूमिकायें निभा दी हैं. जब इनकी राजनीति शुरु हुई थी, तब इनके समर्थन के लिए इनके आधार दलित–पिछ्डी जातियों में मध्यमवर्ग का आकार भी नहीं बना था . आज इनके समर्थन के लिए इस समूह से पर्याप्त मध्यमवर्ग है, जो इन्हें तार्किक और बौद्धिक समर्थन भी दे रहा है, लेकिन इस समूह की बडी आबादी की बुनियादी मुद्दों से न जुड पाने के कारण ये राजनेता अस्मिता और सामाजिक न्याय की राजनीति में जरूरी शिफ्ट पैदा नहीं कर पा रहे हैं.

बिहार में नीतिश कुमार ने तो पिछले आठ सालों में भाजपा और संघ परिवार के लिए जमीन भी मुहैय्या करा रखी थी. आज जब दलित पिछडी आबादी स्कूलों में पहुंच रही है, तो स्कूलों के बुनियादी ढांचे हिल गये हैं. इस समूह की बडी आबादी के पास न तो आज शौचालय है और न ही पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था. नौकरियों में आरक्षण तो है, लेकिन सरकारी नौकरियां सिमट रही हैं. ऐसी स्थिति में इन बुनियादी जरूरतों को संबोधित करते हुए सामाजिक न्याय के इन पुरोधाओं को जमीनी राजनीति खडी करने की जरूरत थी, जिसमें ये असफल हुए. ऐसा भी नहीं है कि 16वीं लोकसभा का परिणाम इस राजनीति के लिए ताबूत की अंतिम कील साबित होने जा रही है.

बिहार में लालू यादव की पार्टी ने चार सीटें जीती हैं, 10 सीटों पर दूसरे नम्बर पर रहते हुए लोकसभा के हिसाब से कम मार्जिन से हारी है और प्रायः सभी 25 सीटों पर दूसरे नम्बर की पार्टी रही है. नीतिश कुमार भले ही लगभग हर जगह तीसरे नम्बर पर पिछड गये है , लेकिन विधान सभा में उनके बेह्तर प्रदर्शन का आधार बना हुआ है. उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के वोटों में इजाफा हुआ है और 30 से अधिक सीटों पर वह नम्बर दो की पार्टी रही है. परेशान होने की स्थिति है लेकिन निराश होने की इसलिए नहीं कि अस्मिता की राजनीति अब और अधिक परिपक्व हुई है, यहां नेतृत्व की विविधता भी बनी है, जिसका परिणाम है राज्यों में इस राजनीति के अलग–अलग धडों के बीच आपसी प्रतिद्वन्द्विता. संघ परिवार इसी जमीन पर अपने लिए स्पेस बनाने में सफल हुआ है.

सोशल इंजीनियरिंग के अलावा मुजफ्फरनगर जैसे प्रयोगों के इस्तेमाल से भी इसने पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा की मध्यजातियों के बीच  अपने लिए सूखी भूमि पर भी हरियाली पैदा कर ली. इस खतरे को न सिर्फ अस्मिता और सामाजिक न्याय के राजनेताओं को ही समझना है , बल्कि वामपंथ को भी अस्मिता की राजनीति को जातिवादी राजनीति समझते हुए इससे परहेज की अपनी पुरानी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा अन्यथा , पिछडी जातियों और दलितों का नेतृत्व लालू-मुलायम-मायावती से खिसक कर उमा भारती  , कटियार और संगीत सोम और मोदी के पास चला जायेगा , जिसके लिए संघ परिवार की तैयारियां चरम पर है. और ऐसी स्थिति में एन डी ए के साथ गये रामदास आठवले, उदित राज और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को भी समझना होगा कि यह वह जमीन होगी , जिसपर चातुर्वर्ण की आधारशिला पुनः खडी की जा सकेगी और सामाजिक श्रेणीबद्धता का आदर्श स्वरूप समाज में कायम हो जायेगा.

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