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नई जीवन शैली ने बनाया दिल का रोगी..

By   /  May 29, 2014  /  1 Comment

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-राजेंद्र बोरा||

डॉ. जगत नरूला अमेरिका के माउंट सिनाई अस्पताल के हृदय रोग विभाग के प्रमुख तो हैं ही, साथ ही वे इस रोग के आज दुनिया के श्रेष्ठ चिकित्सकों और अनुसंधानकर्ताओं में से एक हैं. उनकी पहचान एक “जीनियस” और “लिविंग लिजेंड” की है. आज उन्होंने जयपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में “क्या दिल के दौरे को रोका जा सकता है” विषय पर व्याख्यान दिया.dr narula

विषय की दिलचस्पी हमें भी वहां खींच ले गयी. मेडिकल के किसी जटिल विषय को कैसे समझाया जाय यह कोई डॉ. नरूला से सीखे. विषय को बिना सामान्य बनाए उसकी चिकित्सकीय बारीकियों को जिस प्रकार उन्होंने समझाया उससे यह भी समझ में आया कि कोई शिक्षक कैसा होना चाहिए.

हमें नहीं मालूम था कि दुनिया में केवल मनुष्य ही ऐसा जीव है जिसमें कलेस्टरॉल का इतना ऊंचा स्तर होता है. पृथ्वी पर कोई ऐसा जीव नहीं है जिसका कलेस्टरॉल का स्तर 25 से ऊपर हो. केवल मनुष्य में करीब 200 का स्तर अभी सामान्य माना जाता है. मगर यह दिल के दौरे के जोखिम वाला है. वास्तव में हमारा कलेस्टरॉल 55 तक होना चाहिए. जब बच्चा पैदा होता है तब उसका कलेस्टरॉल स्तर 25 ही होता है. फिर हमारी जैसी जीवन शैली हो चली है उससे वह बढ़ता ही जाता है.

व्याख्यान से जो बात हमें समझ में आई वह यह थी कि सादा जीवन, सादा भोजन और शारीरिक श्रम छोड़ कर और नई जीवन शैली अपना कर हमने अपने आप को विकसित तो मान लिया मगर बदले में दिल का रोग लगा बैठे.

यह तो हुई दिल के रोग की बात. मगर एक दिल कि बात और हुई. वहां जाकर जाना कि डॉ. नरूला जयपुर के हैं. यहीं उनका जन्म हुआ और मेडिकल तक की सारी पढ़ाई भी यहीं हुई. वे सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज के छात्र रहे. यह जान कर किसी भी जयपुरवासी का सीना फूलना लाजिमी ही है.

यह भी जाना कि जाने माने स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. एम एल स्वर्णकार जिनके प्रयत्नों से पहले मेडिकल कॉलेज बना और फिर विश्वविद्यालय डॉ. नरूला के कॉलेज के जमाने के मित्र हैं. विश्वविद्यालय के प्रो-वाइस चांसलर डॉ. सुधीर सचदेवा तो कक्षा दो से 11 वीं तक डॉ. नरूला के सहपाठी रहे. व्याख्यान में नहीं जाते तो कैसे पता चलता.

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. पर अब इस जीवनशैली से बचना बड़ा कठिन हो गया है , बीमार होने के बाद ही इस को अपनाना मज़बूरी होता है ऐसा न करने की वजह से भारत में हर वर्ष ह्रदय रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी होती जा रही है प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति इस से दूररखती थी

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