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प्रो. जीएन साईंबाबा की गिरफ्तारी का जसम ने किया विरोध..

By   /  May 30, 2014  /  No Comments

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दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो.जीएन साईंबाबा की गिरफ्तारी के खिलाफ और उनकी रिहाई की मांग करते हुए जन संस्कृति मंच के आह्वान पर जंतर-मंतर पर एक संयुक्त सांस्कृतिक विरोध सभा आयोजित की गई. इसमें जानेमाने संस्कृतिकर्मी, बुद्धिजीवी, कवि, चित्रकार, संगीतकार, रंगकर्मी, पत्रकार, शिक्षक, छात्र-नौजवान और विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता और नेता शामिल हुए. विरोध सभा की शुरुआत करते हुए वरिष्ठ चित्रकार जसम दिल्ली के संयोजक अशोक भौमिक ने कहा कि प्रो. जीएन साईंबाबा की गिरफ्तारी लोकतंत्र विरोधी  कार्रवाई है. इस तरह के मामलों में मीडिया की चुप्पी  देखते हुए लगता है जैसे लोकतंत्र का चौथा खंभा टूट गया हो.saibaba jsm

डूटा की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने कहा कि पुलिस ने  अपहरण के अंदाज़ में साईंबाबा की गिरफ्तारी की, यह शर्मनाक है . व्यवस्था विरोधी बुद्धिजीवियों के साथ राज्य मशीनरी  का यही रवैया रहा है, जिसका लगातार विरोध करने की जरूरत  है. फिल्मकार संजय काक ने कहा कि साईंबाबा गरीबों और आदिवासियों पर ग्रीन हंट के तहत ढाये जा रहे दमन का विरोध कर रहे थे, इसी कारण उन्हें निशाना बनाया गया है. इस तरह की घटनाओं के विरोध को और बड़े दायरे में ले जाना चाहिए.

जलेस के राष्ट्रीय उपसचिव संजीव कुमार ने कहा कि प्रो. साईंबाबा के मामले में कानून गैरकानूनी तरीके से काम कर रहा है. नंदिनी चंद्रा का कहना था कि भारतीय राज्य पूरी तरह पुलिसिया राज्य में तब्दील होता जा रहा है. डीएसयू के उमर ने कहा कि प्रो. साईंबाबा शिक्षा से लेकर सामाजिक-आर्थिक तमाम सवालों पर व्यवस्था का विरोध कर रहे थे, इसी कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया. सैकड़ों ऐसे लोगों को इसी तरह जेलों में बंद रखा गया है. फिल्मकार झरना जावेरी ने 90 प्रतिशत विकलांग प्रो. साईंबाबा को अंडासेल में रखे जाने की विडंबना पर सवाल उठाया. यह भी बताया कि बुद्धिजीवियों के अलावा किस तरह पुलिस श्रमिकों के साथ भी अत्याचार कर रही है.

कवि मदन कश्यप ने अपनी कविता ‘दंतेवाड़ा’ का पाठ किया. अपने वक्तव्य में उन्होंने  कहा कि मध्यवर्ग की जो सरोकारहीनता, संवेदनहीनता और स्वार्थपरता है, उसे बदलना भी एक सांस्कृतिक कार्यभार है. भोर पत्रिका के संपादक अंजनी ने विस्तार से प्रो. साईंबाबा के राजनीतिक जीवन की चर्चा की तथा कहा कि उनकी गिरफ्तारी पुलिस प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रशासन के गठजोड़ का परिणाम है. पीडीएफआई के अर्जुन प्रसाद सिंह ने पटना में प्रो. साईंबाबा पर किए जा रहे एक कार्यक्रम में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोगों द्वारा हमला किए जाने की जानकारी दी और कहा कि यह फासीवाद की आहट है और ऐसे में प्रतिरोध की शक्तियों की एकता जरूरी है.

2014-05-28 16.08.05आइसा नेता ओम ने कहा कि पिछली सरकार काले कानूनों के जरिए जनता का दमन कर रही थी. नई सरकार आने के बाद दमन और तेज होने की आशंका है.इसलिए प्रतिरोधी ताकतों द्वारा भी अपने संघर्ष को तेज करना जरूरी है. इनौस नेता असलम ने कहा कि अचानक अंधकार का दौर नहीं आ गया है, यह पहले से जारी है. मजदूरों, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों सब पर दमन और अन्याय की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. न्याय किसी को नहीं मिल रहा है. दलित लेखक उमराव सिंह जाटव ने साईंबाबा की गिरफ्तारी को अमानवीय और कानून का मजाक बताया.

विद्याभूषण रावत ने प्रो. साईंबाबा की गिरफ्तारी को असंवैधानिक बताते हुए कहा कि संसद के बजाए स़ड़कों पर एकजुट होने का अब समय आ गया है. रेडिकल नोट्स के पोथिक घोष के अनुसार दमन का यह दौर क्रांतिकारी उछाल की संभावनाओं का दौर है. युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने कहा कि यह विरोध सभा शासक वर्गों के “अच्छे दिनों” का प्रत्याख्यान है. काले कानूनों और दमन के जरिए जो जनता की लड़ाई की रोकना चाहते हैं, धरना-प्रदर्शन भी जिनसे बर्दास्त नहीं होता, उनका हर जगह विरोध हो रहा है और यह विरोध और बढ़ेगा.

विरोध सभा के दौरान आरसीएफ की श्रीरूपा ने वरवर राव की कविता का पाठ किया और उनके साथियों ने एक जनगीत सुनाया. अभिनेता इंदर सलीम ने एक खाली कुर्सी के जरिए दो मिनट की एक नाट्य प्रस्तुति की तथा प्रतिरोध की भाषा बदलने का सुझाव दिया. बृजेश ने परवीन शाकिर की गजल की पंक्तियों के जरिए विरोध और संघर्ष को जारी रखने का संकल्प लिया. कपिल शर्मा के नेतृत्व में ‘संगवारी’ के कलाकारों ने रमाकांत द्विवेदी, हबीब जालिब और आशुतोष कुमार की रचनाओं को गाकर सुनाया. आशुतोष कुमार ने प्रो. साईंबाबा की गिरफ्तारी के संदर्भ में एक जनगीत लिखा है- चांदी की कुर्सी डरती है, सोने की कुर्सी डरती है, इस पहिये वाली कुर्सी से, हर काली कुर्सी डरती है.

इस मौके पर भगाणा कांड के उत्पीडि़त परिवार भी विरोध सभा में शामिल हुए. जलती हुई दोपहरी में प्रतिरोध के लिए इकट्ठे सैकड़ो की जमात को उन्होंने बिना अनुरोध और पूर्व व्यवस्था के अपनी ही पहल पर ठंढा मीठा पानी देकर उत्पीड़ितों और विद्रोहियों के भाईचारे का अद्भुत उदाहरण पेश किया, जो इस सभा का सब से खूबसूरत और मार्मिक क्षण था. विरोध सभा में मौजूद  बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों ने उनके न्याय की लड़ाई के प्रति अपने समर्थन का इजहार किया.

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  • Published: 4 years ago on May 30, 2014
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  • Last Modified: May 30, 2014 @ 1:59 pm
  • Filed Under: मीडिया

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