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क्या सचमुच विदेशों से जुड़ें हैं धमाके के तार या फिर ये किसी राजनीतिक साजिश का है नतीज़ा?

By   /  September 7, 2011  /  6 Comments

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दिल्ली हाई कोर्ट के बाहर हुए धमाके ने जहां एक तरफ देश की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल ज्यादा उलझा रहा है कि आखिर इन धमाकों के पीछे आतंकियों की मंशा क्या है? सवाल यह भी है कि क्या धमाके करने वाले वास्तव में वे ही हैं जो अपने सिर पर जिम्मेवारी ओढ़ रहे हैं? यह भी पूछा जा सकता है कि क्या विदेशी आतंकी कोई वारदात करते वक्त भारत के राजनीतिक समीकरणों और चर्चित मामलों का भी खयाल रखते हैं? क्या उनके विदेशी आका अपने संगठन के लोगों को मौके से ज्यादा टाइमिंग पर ध्यान देने को कहते हैं? मेरा मानना है कि अगर सुरक्षा एजेंसियां धमाके की प्रकृति और परिस्थिति के साथ-साथ मक़सद को भी ध्यान में रखें तो असली गुनहगारों तक पहुंचना आसान हो जाएगा।

अभी कुछ ही दिनों पहले की बात है जब देश के लगभग सभी शहरों में तूफान आया हुआ था। रामदेव और अन्ना के आंदोलनों के दौरान लोग घरों में कम चौक-चौराहों पर ज्यादा दिखाई पड़ रहे थे। लगभग सभी जगह, यहां तक कि सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों, रेलवे और मेट्रो स्टेशनों तक की सुरक्षा में ढील साफ दिखाई पड़ रही थी। सुरक्षा विशेषज्ञ और पुलिस के अधिकारी तक इस बात से बेहद खौफ़जदा थे कि इस ढील का फायदा उठा कर असामाजिक तत्व और आतंकवादी कहीं कोई वारदात न कर बैठें। राजधानी दिल्ली के रामलीला मैदान में तो स्थिति यहां तक पहुंची हुई थी कि कुछ शराबी निहत्थे पुलिसकर्मियों को भी पीट कर भाग गए। उस वक्त देश के किसी भी शहर में इससे ज्यादा बड़ी और नुकसान पहुंचाने वाली वारदात कर देना आतंकियों के बाएं हाथ का खेल था, लेकिन अगर कुछ नहीं हुआ तो या तो ‘भगवान भरोसे’ या फिर किसी को कुछ करने की ‘इच्छा’ नहीं थी।

इसके फौरन बाद जन्माष्टमी का त्यौहार पूरे उत्तर भारत में खूब जोश-ओ-खरोश के साथ मनाया गया। पुलिस के आला अधिकारी तब भी बुरी तरह चिंतामग्न थे कि उन्हें सुरक्षा इंतजामों पर भी ध्यान देने का मौका नहीं मिल पाया और उस दौरान भी मुरलीवाले ने ही किसी तरह उनकी लाज बचा ली। इसके बाद गणपति का भीड़-भरा उत्सव आया जिसने देश भर का ध्यान मुंबई पर केंद्रित कर दिया। पूरा त्यौहार राजी-खुशी गुजर गया, लेकिन ऐन विसर्जन के दिन एक ऐसा हादसा हुआ जिसने अमन के सीने पर आतंक का परचम फहरा दिया।

हालांकि हूज़ी के जिम्मेदारी अपने सिर लेने के ई-मेल से शक़ की सुई कट्टर इस्लामी आतंकवादी संगठनों की तरफ घूमती जरूर है। इन संगठनों की कार्यप्रणाली का बारीकी से विश्लेषण करने वाले मयंक जैन कहते हैं कि भारत पिछले कुछ दशकों में इन संगठनों के लिए एक सॉफ्ट टार्गेट बन कर उभरा है। उनके मुताबिक पारंपरिक तौर पर इन आतंकवादियों के तीन प्रमुख दुश्मन देश माने जाते हैं- अमेरिका, इस्रायल और भारत। जैन बताते हैं कि अमेरिका ने सिर्फ एक बड़े हमले (9/11) के बाद से ही तीन देशों- अफगानिस्तान, इराक़ और पाकिस्तान को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है। इस्रायल भी अपने उपर हुए किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मशहूर हो चुका है। ऐसे में भारत एक ऐसे लक्ष्य के तौर पर बचता है जहां वे आसानी से जान-माल का नुकसान कर अपने आकाओं से भारी फंडिंग करवाने का मकसद पूरा कर सकते हैं।

लेकिन मयंक जैन भी इस बात पर सहमत थे कि अगर आतंकी चाहते तो पिछले कुछ महीनों में वे किसी गंभीर और ज्यादा नुक़सानदेह वारदात को अंजाम दे सकते थे। सवाल फिर वहीं खड़ा होता है कि क्या इस हमले का मक़सद कुछ और था? अगर ध्यान से देखें तो इस हमले के कारण न सिर्फ मीडिया का बल्कि आम जनता का भी ध्यान सिर्फ इनपर ही पहुंच गया। मीडिया विशेषज्ञ अंजू ग्रोवर का भी कहना है कि आने वाले कुछ दिनों तक अखबार आतंकवाद और बम धमाकों के शिकार लोगों की तस्वीरों से ही भरे रहेंगे।

उधर भारत-पाक संबंधों पर ध्यान दिया जाए तो उसमें भी हिना रब्बानी के बहुचर्चित दौरेके बाद काफी हद तक मिठास आई है। पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान के किसी भी आतंकी या गैर आतंकी संगठन ने भारत के खिलाफ कोई जंग छेड़ने का भी ऐलान नहीं किया है। ऐसे में अचानक एक बड़ी वारदात का होना, वह भी बिना किसी चेतावनी के, यह किसी के भी गले से नीचे नहीं उतर रहा।

सवाल यह उठता है कि इस धमाके का सीधा फायदा किसे पहुंच रहा है? अगर पिछले कुछ दिनों के अखबारों पर ध्यान दिया जाए तो हम पाते हैं कि एक तरफ जहां राजा कई चेहरों को बेनकाब करने की धमकी दे रहे थे वहीं अमर सिंह और उनके गिरफ्तार साथी भी कुछ बड़े राज खोलने की चेतावनी देकर कई लोगों की धड़कनें बढ़ा रहे थे। तो क्या यह धमाका किसी खास समस्या से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए तो नहीं किया गया है? क्या इस धमाके के तार देश के भीतर ही किसी से जुड़े हैं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो अनायास ही दिमाग में उठ खड़े हुए हैं। अगर आपके पास इनका कोई उत्तर हो तो अवश्य सुझाएं।

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

6 Comments

  1. Pravin says:

    मै आपकी बात से पूर्ण रूप से सहमत हु, पर हमारे देश की जनता सब भूल जाती है ! और जनता की इस भुलाने की बीमारी पर हमारे नेताओ को खुद से भी ज्यादा भरोसा है.

  2. nitin kamble says:

    आपका धनेवाद करना चाहता हु की आपने बहुत सटीक उधाहरण दे के समजाय है . मुजे लगता है के जब महारास्त्र में आदर्श का घोटाला चल रहा ता तभी 13 को बम dhamaka हुवा और लोगोका मन विचलित की गया ऐसा लगता है तो मई आपके बातोसे सहमत हु. और यहाँ अपने ही लोकग मरते है इसका उने कोए लेना देना नहीं लगता है तो गणत को जानना होगा और समगाना होगा दुश्मन कोण और दोस्त कोण. गाब जनता समगेगी के दुश्मन और दोस्त कोण है तो ऐसे हादसे कम होनेके संभावना है.

  3. Shivnath Jha says:

    चाणक्य ने कहा था “अगर राजा अपने देश की प्रजा को भूखे रख कर भी जन-मल से सुरक्षा की गारंटी देता है तो उस राजा पर राष्ट्र का संपूर्ण जन-मानस मर मिटने को तैयार होता है. लेकिन यदि वही राजा अपनी प्रजा को भोजन व्यवस्था की पर्याप्त इंतजाम करने के बाद, जन-मल की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है तो वह राजा राजा नहीं वरण ‘राष्ट्र और प्रजा के प्रति उसके यह व्यवहार राष्ट्र द्रोह के तरह होता है साथ ही उस राजा को ‘शारीरिक और मानशिक रूप से अस्वस्थ समझा जाता है’.”

    परन्तु यहाँ ना तो राजा है ना प्रजा, बस है तो “का पे करब श्रृंगार पिया (जनता) मोर आन्हर”

  4. Prashant Mishra says:

    ध्यान भटकाने की साज़िश लगती है जब भी सरकार फंसती नजर आती है तब ही ऐसी घटना होती है, ऐसा दो -तीन बार हो चुका है !

  5. Ranjan Shukla says:

    बेहद सटीक विश्लेषण.. एक बार फिर बधाई स्वीकार करें धीरज जी.. ये नेता लोग किसी के सगे नहीं होते… इनके माँ बाप भी वहाँ होते तो इन्हें कोई गम नहीं होता.. मुझे तो लगता है ये ब्लास्ट अमर सिंह के डर से किसी ऐसे व्यक्ति ने करवाया है जिसे फंसने का खतरा होगा.. मेरी सलाह है कि आप भी सावधान रहिएगा.. कहीं ये शक कि सुई उनकी तरफ घुमाने से आप भी उनके निशाने पे ना आ जाएं.

  6. praveen arya says:

    यह बिलकुल ठीक आशंका है नेता की जात सूवर से भी गन्दी होती है | ये आतंकवादी से भी खतरनाक दिग्गी पिग्गी होते है !

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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