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गर्व करो, हम भारतीय रेपिस्ट जो हैं..

By   /  May 31, 2014  /  No Comments

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-ज्योत्स्नेहा श्रीवास्तव||

महिलाओं पर अत्याचार एक वैश्विक सत्य है, भारत कोई अपवाद नहीं है! भारत में महिलाओं पर अत्याचार के मामले बहुत अधिक हैं!कन्या भ्रूण हत्या,कन्या शिशु हत्या, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, बाल देहव्यापार, शोषण, छेड़खानी, दहेज़ हत्या, सती प्रथा ऐसे कई महिलाओं के खिलाफ अपराध हैं जो हमारे सभ्य माने जाने वाले समाज में प्रचलित हैं!rape-victim

एक सर्वे के मुताबिक हर 54 मिनट पर करीब 15,468 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं! भारत में बलात्कार कोई नया जुर्म नहीं है लेकिन 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार काण्ड के बाद मानो जनता को झकझोर कर रख दिया! हर तबके हर वर्ग के लोगो ने इसके खिलाफ जम कर विरोध किया! ये न सिर्फ एक बलात्कार काण्ड था बल्कि मानवता की हत्या थी! मीडिया सिर्फ लोगों में फैले जनाक्रोश को कवर कर रही थी पर अपराधी अभी भी अपने जुर्म में व्यस्त थे! इन दिनों जब जनता बलात्कार जैसे नपुन्सकीय जुर्म का पुरज़ोर विरोध कर रही थी बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई! कुछ महीनों बाद दिल्ली को फिर एक खौफ़नाक शर्मसार कर देने वाली घटना का सामना करना पड़ा जब एक 4 साल की बच्ची बलात्कार का शिकार हुई! एक बार फिर जनता घरों से बहार निकली! विरोध प्रदर्शन भी हुए पर इस केस को पिछले केस जितनी तवज्जो नहीं मिली! अभी हाल हइ में उत्तर प्रदेश के बदायु में दो सगी चचेरी बहनों की सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा पेड़ पर लटका कर हत्या कर दी गयी! दोनों बहनें 28 मई को रात में शौच के लिए निकली पर वापस नहीं लौटी! माता-पिता के पुलिस से शिकायत करने पर भी पुलिस का रवैया बेहद अजीब था! अगले दिन दोनों बहनों की लाश पेड़ से लटकी मिली! परिवार वालों के मुताबिक दोनों बहनों को बचाया जा सकता था अगर पुलिस सही समय पर कोशिश करती! आज भारत में बलात्कार की घटनाएं अकल्पनीय तरीके से बढ़ रही हैं! महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहुत से कानून हैं! इसके बावजूद 1651 बलात्कार के मामले दिल्ली की कोर्ट में ट्राएल के लिए लटके पड़े हैं! इन्हीं वजहों से दिल्ली मुंबई और कोलकत्ता में से महिलाओं के लिए सबसे ज़्यादा असुरक्षित शहर बन चूका है!दहेज़ हत्या भी हर समाचार पत्र का मुख्य अंग बन चुकी है!

औरत औरत की सबसे बड़ी शत्रु है! यहाँ तक कि जन्म से पहले ही एक कन्या शिशु की हत्या उसकी मां के गर्भ में कर दी जाती है!विधवाओं की स्थिति भी बहुत शोचनीय है!वे किसी भी प्रकार की आज़ादी का आनंद नहीं ले सकती हैं! इनका दूसरा विवाह भी समाज में मान्य नहीं है!बिना किसी वजह के ये समाज के द्वारा दण्डित की जाती हैं!लड़किओं और महिलाओं की तस्करी भी हमारे समाज में बहुत बुरी तरह से पनप रही है! देवदासी प्रथा भारतीय समाज पर कलंक है! समाचार पत्र और पत्रिकाएं ढेरों चौकाने वाली खबरों जैसे पिता के द्वारा अपनी ही बेटी का बलात्कार या नजदीकी रिश्तेदार द्वारा बलात्कार से भरे पड़े हैं! ऐसे बहुत से कानून हैं जो भारतीय संविधान के द्वारा महिलाओं को दिए गए हैं किन्तु ये महिलाओं के लिए लाभप्रद नहीं हैं क्योंकि हमारा समाज सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ हैं! महिलाओं की स्थिति में सुधर लेन के लिए पुरुषों के रवैये में सुधर लाने की सबसे अधिक आवश्यकता है! बिना पुरुषों की सोच को बदले हजारों कानून भी महिलाओं की अपमानजनक स्थिति को नहीं सुधार सकते!

8 मार्च को महिला दिवस मनाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है! एक समाज को तब तक ख़ुद को सभ्य कहने का अधिकार नहीं है जब तक वो महिलाओं से सही व्यवहार करना न सीख जाए!

ऐसे बहुत से सरकारी व ग़ैर सरकारी संगठन हैं जो महिला सशक्तिकरण के लिए कार्यरत हैं लेकिन ये काफ़ी नहीं हैं!आर्थिक पहलु न्याय के मार्ग में एक बड़ी बाधा है! बहुत से अभिभावक इस स्थिति में ही नहीं है कि वो इन अपराधों के खिलाफ़ क़दम उठा सकें! उनके पास अपनी बहन, बेटियों की ऐसे दुर्दशा झेलने के सिवा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है!

भारत एक विपरीत स्थिति का सामना कर रहा है! भारत का 28% कार्यबल महिलाए हैं! 1987 में यह प्रतिशत महज़ 13% था! 1993 से अब तक एक लाख महिलाएं पंचायत चुनाव में चुनी जा चुकी हैं! महिलाएं मुख्यमंत्री हैं, प्रधानमंत्री MP हैं मंत्री हैं इसके बावजूद महिलाओं के खिलाफ हिंसा बढती जा रही है! ये बेहद अजीब है कि हमारे नेता महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं किन्तु राजनीती में महिला आरक्षण के लिए तैयार नहीं हैं!

इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री वर्ग आज भी एक कमज़ोर वर्ग मन जाता है! भारत की राजधानी में सबसे ज़्यादा शोषण के मामले सामने आये हैं!एक सर्वे के अनुसार 23.6% शोषण के मामले दिल्ली खुद मानती है!

आज बढती संख्या में महिलाएं बाहर काम और शिक्षा के लिए जा रही हैं ऐसे में वो हर तरह की हिंसा और अत्याचार को जवाब देने के लिए भी तैयार हैं! यह सही वक़्त है कि भारतीय समाज महिलाओ की सरकारी और कॉर्पोरेट क्षेत्र में पुरुषों की जगह लेने घटना को स्वीकार करे! महिलाओं की पूजा करने की कोई ज़रूरत नहीं है अगर आप उनका किसी निजी फायदे के लिए शोषण करते हैं! इस मामले में अब महिलाओं को ख़ुद आगे आ कर क़दम से क़दम मिला कर अपनी समस्याओं का हल निकालना होगा !

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  • Published: 4 years ago on May 31, 2014
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  • Last Modified: May 31, 2014 @ 11:00 pm
  • Filed Under: अपराध

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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