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कैसे देश को गुड गवर्नेंस दे पायेगी मोदी सरकार..

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान गुड गवर्नेंस का वादा किया था, लेकिन उनके मंत्रिमंडल को देखकर लगता है कि मोदी के लिए गुड गवर्नेंस दे पाना आसान नहीं होगा.. मोदी के मंत्रिमंडल में क्या कमियां हैं तथा इसे कैसे और बेहतर बनाया जा सकता है इसकी समीक्षा कर रहे हैं जाने-माने पत्रकार चैतन्य कालबाग..

तकरीबन 15 साल पहले 21 फरवरी 1999 को शरीफ और बीजेपी के एक और पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें शांति और परमाणु हथियारों पर लगाम लगाने की बात थी. 10 हफ्तों के बाद भारतीय सैनिक कारगिल में पाकिस्तान घुसपैठियों से लड़ाई लड़ रहे थे. वाजपेयी के मंत्रियों का दावा था कि पाकिस्तान की सेना ने शरीफ को इस मामले में अंधेरे में रखा. 5 महीने बाद शरीफ सत्ता से बाहर हो चुके थे और उनकी जगह परवेज मुशर्रफ थे. वाजपेयी सरकार को कारगिल के अलावा कंधार विमान अपहरण कांड और संसद पर हमले जैसे झटके झेलने पड़े. इन सभी वजहों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को मजबूत डिफेंस स्ट्रैटिजी बनाने की जरूरत है.

मोदी ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व चीफ अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाकर इस गोल की दिशा में कुछ काम किया है. हालांकि, अरुण जेटली को फाइनैंस और डिफेंस दोनों मिनिस्ट्री दिए जाने से संदेश ठीक नहीं गया है. दोनों मंत्रालयों पर फोकस करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.

बदलाव की जरूरत वाले बाकी मंत्रालयों को पुराने ताश के पत्तों की तरफ अदल-बदल दिया गया. कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री को जूनियर मिनिस्टर के दायरे में ला दिया गया.

रोजगार पैदा करने से जुड़े सभी मंत्रालयों को एक मैन्युफैक्चरिंग सुप्रीम के तहत लाया जाना चाहिए था, जिसके पास कॉर्पोरेट अफेयर्स और आंत्रप्रेन्योरशिप और इन्वेस्टमेंट से जुड़ा मंत्रालय भी होता. हमारे लेबर लॉ में तत्काल बदलाव की जरूरत है, लिहाजा लॉ और लेबर को भी एक ग्रुप में रखा जा सकता था. मोदी भारी-भरकम एचआर डिवेलपमेंट मिनिस्ट्री को खत्म कर एजुकेशन मिनिस्ट्री भी बना सकते थे.pm-namo

मोदी को ऐसी पावरफुल एनर्जी मिनिस्ट्री बनानी चाहिए थी, जिसमें पेट्रोलियम, नैचरल गैस, कोल, पावर और रिन्युएबल एनर्जी शामिल होते. साथ ही, ट्रांसपोर्टेशन के तहत शिपिंग, सिविल एविएशन, रेलवे, रोड ट्रांसपोर्ट और हाइवे मिनिस्ट्री को इकट्ठा किया जा सकता था. इसी तरह, फूड, पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन और फर्टिलाइजर्स को एक साथ लाया जा सकता था. यह सच है कि मोदी के पास 45 मेंबर्स की टीम है, जबकि मनमोहन सिंह सरकार में मंत्रियों की संख्या 70 थी.

हालांकि, अगर इरादा सरकार को छोटा करना और फैसले की प्रक्रिया तेज करना है, तो मुझे मौजूदा नई टीम बहुत भरोसेमंद नहीं जान पड़ती. हालांकि मोदी कई शक्तियां अपने इर्द-गिर्द रखकर कुछ बेहतर कर सकते हैं.

हमारे लिए शर्म की बात
राष्ट्रपति भवन में राज्याभिषेक समारोह काफी शानदार रहा. बेशक हममें से कई नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित 4,000 लोगों में शामिल नहीं थे, लेकिन हम भी इससे अभीभूत होने से अछूते नहीं रहे. हालांकि, बराक ओबामा के 2009 के शपथ ग्रहण समारोह के मुकाबले इसे छोटा आयोजन ही माना जाएगा. ओबामा के शपथ ग्रहण में 18 लाख लोग शामिल हुए थे.

जहां तक राष्ट्रपति भवन के प्रांगण की बात है, तो यह हमारे लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि आजादी के 67 साल के बाद भी हम इतने बड़े मुल्क में एक ऐसी बिल्डिंग नहीं बना पाए हैं, जो साम्राज्य के समय की बनी लुटियंस की इमारत या फिर मुगलकाल के हुमायूं के मकबरे की तरह भी हो सके.

(नभाटा)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.