/कांग्रेस क्यों नहीं समझ पाई जनता का गुस्सा..

कांग्रेस क्यों नहीं समझ पाई जनता का गुस्सा..

-प्रभाकर चौबे||

कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष चुने जाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी ने पार्टी की हार पर सांसदों से कहा कि हम जनता का गुस्सा समझ नहीं पाए. इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 46 सीटें ही मिली हैं और ये आज तक की सबसे कम सीटें हैं. वैसे कोई भी हार किसी भी पोलिटिकल पार्टी के लिए शर्मनाक नहीं होती. यह लोकतंत्र है, इसलिए संख्या कम-ज्यादा होती है. एक समय लोकसभा में भाजपा केवल दो पर सिमट गई थी. हार या जीत के बाद हर पार्टी चुनाव में अपने प्रदर्शन की समीक्षा करती है. कांग्रेस भी समीक्षा करेगी. श्रीमती सोनिया गांधी ने सही कहा कि कांग्रेस जनता का गुस्सा नहीं पढ़ पाई. पार्टी के अंदर इस पर चर्चा हो भी रही होगी. इतनी पुरानी और जनता के बीच आज़ादी की लड़ाई के समय से ही अपनी जड़ें जमा चुकने वाली पार्टी का ऐसा प्रदर्शन पार्टी के नेतृत्व वर्ग को निश्चित ही विचलित कर रहा होगा. सन् 2004 में भाजपा की हार हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री सदमे में आ गए. सदमे से उबर नहीं पाए- तीन माह तक किसी से नहीं मिले और उसके बाद तो सक्रिय राजनीति से सन्यास-सा ले लिया. 2004 में ‘शायनिंग इंडिया’ के नारे पर भाजपा को बड़ा गुमान था और पूरा भरोसा था कि यह नारा उसे पुन: सत्ता दिलाएगा. लेकिन चुनाव में पार्टी को हार मिली और उसके बाद 2009 में भी पार्टी को हार मिली. लेकिन 2014 में पार्टी ने पूरी रणनीति के तहत चुनाव लड़ा.  इस जीत का सारा श्रेय संघ, कार्पोरेट और कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया को जाता है. इस पर आगे विश्लेषण होता रहेगा.sonia and rahul

सवाल है कि कांग्रेस क्यों जनता का गुस्सा नहीं पढ़ पाई या जनता का गुस्सा क्यों समझ नहीं पाई. हार के बाद श्रीमती सोनिया गांधी को अनुभूति हो रही है कि हम (कांग्रेस) जनता का गुस्सा नहीं पढ़ पाए. हम कहकर श्रीमती सोनिया गांधी ने पूरी पार्टी को इसका जवाबदार ठहराया है. प्रश्न यह भी उठता है कि जनता की राय पार्टी के बारे में क्या है, यह कैसे पढ़ा जाता है या कहें किस तरह पढ़ा-समझा जाता है. यह भी सोचने की बात है कि पार्टी के बारे में जनता क्या सोच रही है, यह जानना भी कितना जरूरी होता है. राजतंत्र के समय के कई ऐसे किस्से लिखे गए हैं कि किसी देश का राजा वेश बदल कर रात को घूमता और प्रजा के हाल-चाल जानता तथा उसके (राजा के) बारे में प्रजा की धारणा क्या है, यह जानने का प्रयत्न करता. मतलब यह हुआ कि राजा केवल अपने मीडिया, सूचना तंत्र और केवल जासूसों या गोपनीय रिपोर्ट पर ही भरोसा नहीं करता था, खुद प्रयास करता था. प्रजा के बीच जाता था. लोकतंत्र में पार्टी के सक्रिय तथा सामान्य सदस्य व पदाधिकारियों का काम होता है कि वे जनता के बीच रहें, जाएं और जनता की पार्टी के बारे में राय से निरंतर अवगत होते रहें. केवल गोपनीय रिपोर्ट पर भरोसा न करें. कांग्रेस में जनता के बीच जाने का रिवाज खत्म हो गया है. इसके कई कारण हैं. एक तो कांग्रेस सत्ता में आते ही जनसम्पर्क से दूर होती है और उसके अपने केडर से ही सम्पर्क खत्म होने लगता है. पार्टी में जो बिखराव आता है उसके प्रति पार्टी के दिग्गज आँखें बंद किए रहते हैं. कांग्रेस में कुछ सालों से ”हाईकमान-निर्भरता” ज्यादा ही बढ़ी है.

जनता में कांग्रेस सरकार को लेकर जबरदस्त गुस्सा था और इसके कई कारण थे. महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर जनता में कांग्रेस सरकार के प्रति गुस्सा था. लेकिन क्या कांग्रेस जनता के इस गुस्से को पढ़ ही नहीं पाई या किसी नेता ने जनता के इस गुस्से को  हाईकमान तक नहीं पहुंचाया या जानबूझ कर हाईकमान को अंधकार में रखा गया. जैसे ‘शायनिंग इंडिया’ को लेकर श्री अटलबिहारी वाजपेयी को धोखे में रखा गया था और उन्हें 300 सीट का सब्ज बाग दिखाया जाता रहा. भाजपा हारी. इसी तरह 2014 में कांग्रेस हाईकमान को क्या धोखे में रखा गया कि गरीबों के लिए इतने कार्यक्रम कांग्रेस ने दिए हैं कि जनता अपने आप बूथ तक आएगी और कांग्रेस को वोट देगी. क्या हाईकमान उन नेताओं के ऐसे दृश्य पेश करने के कारण भ्रमित होते रहा या यह कि हाईकमान तक का जनता के साथ सीधा संवाद टूट गया है. 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान श्री राहुल गांधी छोटी-छोटी मीटिंग लेते रहे- इन मीटिंग्स में क्या कभी जनता का क्रोध झलका तक नहीं. केवल तालियां ही सुनते रहे. कांग्रेस कई-कई नगर निगमों, नगर पालिकाओं, ग्राम पंचायतों में सत्ता में हैं, क्या इन संस्थाओं के पदाधिकारियों ने कभी भी जनता के क्रोध की जानकारी हाईकमान को दी या हाईकमान ने कभी इनसे सीधे पूछा. यह भी पता लगाना चाहिए कि 2014 के चुनाव में ऐसे निगमों, पालिकाओं, पंचायतों के कांग्रेस-पदाधिकारियों ने अपनी पार्टी के केंडीडेट के पक्ष में कितना प्रचार किया.

कांग्रेस का बुरा हाल रहा. क्यों रहा. जनता का गुस्सा तो दिख रहा था. कांग्रेस के बारे में सोचने पर लगता है कि कांग्रेस संगठन ने पस्ती ओढ़ ली थी. संगठन मानकर चल रहा था उसे तो हारना ही है. इस तरह से टालू तरीके से कांग्रेस ने इससे पूर्व कोई चुनाव नहीं लड़ा. कांग्रेस को सामने खड़े प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल की रणनीतिक ताकत ही शायद समझ में नहीं आ रही थी या वह समझना नहीं चाहती रही. कुछ भी कारण हो कांग्रेस के इस रवैया ने उसका नुकसान किया. कांग्रेस पर सोचते हुए बिहारी का दोहा याद आ रहा है-

ग्रह-ग्रहीत, पुनि वात, तेहि पुनि बीछी मार.

ताहि पियाओ वारुड़ी, कहहु कौन उपचार..

मतलब एक तो ग्रह दशा खराब, उस पर वातरोग फिर बिच्छू ने काटा और ऊपर से उसे विष पिला दिया, ऐसे का क्या इलाज. मतलब कांग्रेस का नेतृत्व सुस्त, पदाधिकारी मस्त ऊपर से गुटबाजी और जनता से दूरी, ऐसी पार्टी का क्या उपचार. नीतियों की स्पष्टता नहीं न जनता से संवाद. बी.जे.पी. का पूरा प्रकोष्ठ काम पर लगा था. बी.जे.पी. के पास प्रवासी भारतीय प्रकोष्ठ तक है और सैकड़ों प्रकोष्ठ हैं.

रही-सही कसर मीडिया ने लगातार एंटी कांग्रेस वातावरण बनाकर अपना कार्पाेरेट -धर्म पूरा किया. मीडिया में ही चर्चा में यह कहा जाता रहा कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी उद्योगपतियों से मिलने से कतराती रही. नहीं मिलीं. इसमें कितनी सच्चाई है यह श्रीमती सोनिया गांधी या कांग्रेस जानें. लेकिन कांग्रेस ने इसका खंडन नहीं किया. दरअसल पूंजीवाद को स्थापित करने में लगी सरकार के संगठन की नेता का उद्योग जगत से मिलते रहना था. आखिर इस संश्लिष्ट समाज में किसी वर्ग की उपेक्षा क्यों की जाए और गरीबों का हितचिंतक कहलाने उद्योग जगत की उपेक्षा जरूरी भी नहीं. प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उद्योग जगत से मिलते रहते थे. मिली-जुली अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका तलाशने ऐसी भेंट जरूरी होती है. लेकिन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पूरी तरह निजीकरण के प्रति प्रतिबद्ध रहे और पार्टी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी मिली-जुली आर्थिक नीति पर जोर नहीं डाल पाईं. राष्ट्रीय विकास परिषद में गैरसरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) का दबदबा होने के कारण इसी पूंजीवाद में गरीबों को दाना-पानी देते रहने की नीति पर जोर दिया जाता रहा. पूंजीवादी अर्थनीति में कुछ-कुछ सुधार पर ही बल रहा. नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध हुआ नहीं. महंगाई बढ़ी, भ्रष्टाचार बढ़ा, बेरोजगारी बढ़ी और जनता में गुस्सा बढ़ते गया. कांग्रेस के पास कौन था जो इस गुस्से को पढ़ता. कांग्रेस इस गुस्से का शिकार हुई. अब कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस के कुछ वीर मांग कर रहे हैं कि प्रियंका गांधी को लाया जाए. कुछ कह रहे हैं कि भाई-बहन ही कांग्रेस की नाव पार लगा सकते हैं. मतलब कांग्रेस के ये वीर देवता हैं और कष्ट में पड़े तो त्राहिमाम्-त्राहिमाम् की गुहार लगाने लगे. खुद क्या करेंगे यह नहीं बता रहे, कह रहे कि अवतार लो प्रभु. वैसे कांग्रेस पुरानी पार्टी है. उतार-चढ़ाव देख चुकी है. अपनी नीतियां स्पष्ट कर कांग्रेस सम्भलेगी, ऐसा विश्वास होता है.

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.