Loading...
You are here:  Home  >  मीडिया  >  Current Article

एडस पर एक साफ सुथरी फिल्म: द इंटरनेशनल प्रॉब्लम..

By   /  June 2, 2014  /  1 Comment

    Print       Email
इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के गौरवाशाली इतिहास में पहली बार  एक नई सोच, एक नई दिशा, एक नया क्रांतिकारी कदम है द इंटरनेशनल प्रॉब्लेम . यूं तो फिल्मकारों ने एडस और गे व लेस्बियन जैसे विषयों को कई बार उठाया, लेकिन अब इस विषय पर किसी ने पहली बार सटिक और सार्थक फिल्म बनाई है. पेशे से डॉ. जगदीश को जब एडस के कुछेक मरीजों के जीवन में झांकने का मौका मिला तो वह द इंटरनेशनल प्रॉब्लेम फिल्म बनाने को मजबूर हो गए.Copy of m_MYSCAN_20140424_0006

इस फिल्म में एक ज्वलंत सवाल भी उठाया गया है कि दुनिया का कोई भी जानवर अप्राकृतिक मैथुन नहीं करता. ये केवल कुछ इंसान ही करते हैं, इसके लिए वे भारत सरकार से कानून में छुट चाहते हैं. जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जा रहा है. आय.पी. सी. की धारा 377 के तहत पश्चिमीदेशों में अप्राक्रतिक मैथून को छुट दी गई है. जबकि अरब देशों में ऐसा करनेवालों को सजाए मौत का प्रावधान है. अब ये मांग कहां तक जायज है. आइए इसी विषय में फिल्म के लेखक , निर्माता , निर्देशक डॉ. जगदीश वाघेला ने बताया दरअसल, मेरे पास एच. आय.वी. पॉजीटिव का एक ऐसा मरीज आ गया, जिसने मेरे जीवन मे तूफान ला दिया. वो मेरे पास आया तो वो बेहद निराश और हताश था. मैंने एक डॉक्टर होने के नाते स्पष्ट कहा कि फिलहाल इसका इलाज तो मेरे पास नहीं है जब तक जीओ, खुशी से जीओ बस यही बोल सकता हॅूं. मैं सिर्फ पैसा बनाने के लिए तुम्हें यूं ही सादी सी दवा देकर युं ही तसल्ली नहीं देना चाहता. बस फिर क्या था, उस मरीज ने अगले ही दिन आत्महत्या करने की कोशिश की. और पुलिस मुझे पकड कर ले गई. वो तो अच्छा हुआ कि वो मरीज बच गया. उसने बयान दिया कि मैंने उसे कोई गलत दवा नहीं दी. तब जाकर मुझे पुलिस ने छोडा. बस, तभी मेरे मन में इस विषय पर फिल्म बनाने का ख्याल आया. अब फिल्म बनकर तैयार है.

m_MYSCAN_20140424_0007आपने क्या संदेश देने की कोशिश की है इस फिल्म में? पूछने पर डा.वाधेला ने बताया कि हर युवा का मार्गदर्शन करनेवाली सेक्स एज्युकेशन एवंम एडस व धारा 377 के पीछे छिपी सच्चाई पर आधारित ये एक संदेशात्मक फिल्म है, इसमें हमनें दो तीन बातों पर जोर दिया है. पहला यह कि एच.आय.वी. पॉजीटिव मरीज को निराश या हताश बिल्कुल नहीं होना चाहिए. ये छुआछुत की बिमारी नहीं है. इस बीमारी से लडा जा सकता है. एच.आय.वी. पॉजीटिव है तो बिल्कुल शरमाए नहीं, किसी अच्छे डॉक्टर को खुद बताएं. झोलाछाप नीम-हकीम से सावधान रहें. वो इस बीमारी के इलाज के नाम पर सिर्फ आपको लूटेंगे. एच.आय.वी. पॉजीटिव रोगी जल्दी मर जाते हैं ऐसा भी नहीं है. वह दवाओं और खुश रहकर भी अपना जीवन जी सकते है.

हमने ये फिल्म समाज को समर्पित कर दी है. इसलिए इससे जो भी कमाई होगी वह हम ट्रस्ट को देंगे. ये फिल्म अब तक 40 फिल्म फेस्टिवल्स में नॉमिनेट हो चुकी है. इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार के मुख्य स्वास्थ्य सेवा संचालक की देखरेख में इस फिल्म को 10 बडे सरकारी अस्पतालों के संचालकों ने भी देखा. और उन्होंने इस फिल्म को टैक्स फ्री करने की महाराष्ट्र सरकार से सिफारिश की है. इस फिल्म को भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री श्री नरेंन्द्र मोदी ने भी सराहा है. राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कार्यालय ने भी इस फिल्म की सराहना करते हुए महाराष्ट्र राज्य के चीफ सेक्रेटरी से इस फिल्म को दर्शकों को दिखाने की सिफारिश की है.

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
    Print       Email

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. जिस कदर आज एड्स फ़ैल रहा है ,उसके मध्य नजर सन्देश देती अच्छी फिल्म , जिसे आज के व्यवसायिक सिनेमा के युग में हर कोई निर्माता निर्देशक बनाने का साहस नहीं करता निर्माता बधाई के पत्र है जो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

You might also like...

राजस्थान के पत्रकार सरकार के समक्ष घुटने टेकने पर विवश हैं..

Read More →
Page Reader Press Enter to Read Page Content Out Loud Press Enter to Pause or Restart Reading Page Content Out Loud Press Enter to Stop Reading Page Content Out Loud Screen Reader Support
%d bloggers like this: