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गोपीनाथ मुंडे थे वंचितों और बेजुबानों के नेता..

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-अरविन्द कुमार सिंह||
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री गोपीनाथ मुंडे के निधन के बाद उनकी राजनीतिक प्रतिभा के बारे में तमाम बातें कही जा रही हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वो देश में सबसे बदतर हालात में जी रही घुमंतू  समुदाय बंजारा जनजाति से रहे हैं.gopinath munde

और उन्होंने आज भी बदहाली में जी रही घुमंतू जनजातियों की बेहतरी के लिए बहुत कुछ काम किया. उनके ही विशेष प्रयासों से बीजेपी ने इन जनजातियों के लिए केंद्रीय आयोग के गठन की बात को अपने घोषणापत्र में शामिल किया और एनडीए राज में यह आयोग बना भी…मेरी उनसे मित्रता नहीं रही, बस कामचलाऊ जान पहचान भर रही थी लेकिन इन बेजुबानों के वो प्रवक्ता रहे और इस नाते मेरे मन में उनके प्रति खास लगाव रहा. हालांकि मराठी नेताओं में जैसी क्षेत्रीयता और तड़क भड़क दिखती है सत्ता का जैसा नशा दिखता है,उससे वो बचे रहने के बाद भी अपवाद नहीं रहे.

देश में बंजारे आज भी दरबदर हैं. 1857 की क्रांति में इनको क्रांतिवीरों का सदेशवाहक मानते हुए अंग्रेजों ने आपराधिक जाति की सूची में शामिल कर दिया लेकिन उसके पहले वो घुमंतू होने के बावजूद सफल कारोबारी थे. बंजारा समाज के लोग विमुक्त. घुमंतू, अर्धघुमंतू पिछड़े और आदिवासियों की श्रेणी में आते हैं. उनको आंध्र प्रदेश,ओडिशा और पश्चिम बंगाल में जनजाति, कर्णाटक और दिल्ली में अनुसूचित जाति औऱ महाराष्ट्र और उ.प्र में ओबीसी का दर्जा मिला है, लेकिन इसके बाद भी इनकी दशा बदतर है.
बंजारा हिंदू और मुसलमान दोनों हैं.

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक ने इस समुदाय को मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा के साथ नौकरी और पदोन्नति में चार फीसदी आरक्षण दिया जिससे काफी बदलाव आया था. यहां बड़ी संख्या में विमुक्त घुमंतू समाज के लोगों को नौकरी मिली और उनके जीवन स्तर बदला. लेकिन बाकी राज्यों में ऐसा नही हुआ.गोपीनाथ मुंडे ने बंजारों ही नहीं आजादी के इतने सालों बाद भटकते हुए जीवन बिता रहे पांच करोड़ लोगों की दशा को बदलना अपने एजेंडे में रखा था और लगातार उनके कल्याण के लिए सक्रिय रहे.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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