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हरियाली के दाग अच्छे है..

By   /  June 5, 2014  /  No Comments

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– आशीष सागर दीक्षित||

आज विश्व पर्यावरण दिवस है. चलिए एक बार फिर सरकारी मिशनरी के कागजी आंकड़ों को देख लिया जाय. क्योकि फलसफा ये ही है. इस दिवस के बाद हमें वैसे भी पर्यावरण को भूलकर अपने कंक्रीट के जीवन में रमते जाना है. उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र पानी के संकट , पहाड़ो के खनन से तरबतर है और जंगल में वनविभाग का कब्ज़ा है. यह तीनो ही पारिस्थितिकी तंत्र के मूल घटक है. आमजन की दिनचर्या का बेस आधार इनसे ही होकर गुजरता है. जहाँ पहाड़ ज़मीन के पानी को पम्प करके से ऊपर लाते है तो वही मानसून की हवाओ को बदल में तब्दील करने के भी ये बड़े कारक है. जंगल यानि पेड़ से ही वायु मंडल आक्सीजन से भरता है.4bnd-000

बुंदेलखंड की जब भी चर्चा होती है आँखों में सूखा जनित , बंजर होते खेत का बदरंग नजारा सामने आता है. “ गगरी न फूटे , चाहे खसम मर जाये “ यही सच है इस ठेठ सुखी हिंदी पट्टी का. हर साल लगाये जाने वाले हरे – भरे पोधे कहाँ खोते चले जा रहे है इसकी कहानी भी समझ से परे है.

वित्तीय वर्ष 2014 – 15 में शासन ने चित्रकूट मंडल के चार जिलो में 4466 हेक्टेयर भूमि में 29 लाख , 2 हजार, 900 पौध रोपण का लक्ष्य रखा है. गत वर्ष 3040 हेक्टेयर भूमि में 23 लाख 81 हजार पौधे वन विभाग ने लगाये थे. चार जनपद में जिनमे बाँदा , चित्रकूट , महोबा और हमीरपुर है. इस वित्तीय वर्ष में बाँदा में 256 हेक्टेयर पर 1,66,400 लाख , हमीरपुर में 1548 हेक्टेयर में 10,6,200 पौध , महोबा में 701 हेक्टेयर में 12,074,650 पौध रोपित किये जाने है. वन विभाग का ये भी दावा है कि हमने पिछले वर्ष लक्ष्य से अधिक 3635.85 हेक्टेयर भूमि में 24 लाख 91 हजार 501 पौधे लगाये थे. लेकिन जब भी सूचना अधिकार में समाजसेवी लोगो ने इनके लगाये जाने का स्थान पूछ लिया तो उत्तर नदारद मिला.

4bnd-0उल्लेखनीय है कि पूर्व बसपा सरकार में समस्त उत्तर प्रदेश में 100 दिन के काम का अधिकार अभियान में मनारेगा योजना से अकेले बुंदेलखंड के 7 जनपद में ही 10 करोड़ पोधे अलग से लगाये थे. तत्कालीन प्रदेश के ग्राम्य विकास मंत्री दद्दू प्रसाद के सानिध्य में उनकी चहेती संस्थाओ को इनके ठेके दिए गए और यह पोधे अब कहाँ लगे इसका जवाब वनविभाग के पास नही है. राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार 33 % वन क्षेत्र किसी भी जिले में उपलब्ध भूमि के सापेक्ष वन आवश्यक है. बुंदेलखंड में 1441 वर्ग किलोमीटर भूमि परती है जिस पर कोई कृषि कार्य नही होता है. बुंदेलखंड में वनविभाग के हर वर्ष किये जा रहे पौध रोपण अभियान पे सूचना अधिकार से जुटाए गए आंकड़ो के बाद अध्यनन करने पर पड़ताल का मुलम्मा ये निकलता है कि यहाँ बाँदा में 1.21 %,महोबा में 5.45 %,हमीरपुर में 3.6 %, झाँसी में 6.66 % , चित्रकूट में 21.8 % , जालोन में 5.6 %, ललितपुर में 7.5 % मात्र वन क्षेत्र शेष है. यानि 10 फीसदी भूमि में भी वन नही बचे है. हर साल लगने वाले यह पौधे किस रसातल में समा जाते है यह वनविभाग ही जाने. हाँ इनके नाम पर लाखो का बंदरबाट अवश्य होता है. यदि इनकी सीबीआई से जाँच करवा ली जाये तो कई आला अफसर जेल के अन्दर होंगे.

वित्तीय वर्ष 2005 से 2012 तक लगाये गए पौधों का ब्यौरा –

जनपद                 पौध रोपण लाख में                खर्च किया गया धन लाख में

बाँदा                   37.84                         2533.85 लाख रूपये

चित्रकूट                 43772443                     2533.85

महोबा                  43772443                     2533.85

हमीरपुर                 16733780                     2533.85

जालोन                  9865952                      4394.963

झाँसी                   45009461                     5496.963

योग                    159154117                    20027.326 लाख

इतनी बड़ी धनराशि भ्रष्टाचार में डूब गई मगर बुंदेलखंड को हरियाली नही मिली. ये अहम् सवाल है सरकारी आला अफसरों से जो एक दिन का पर्यावरण दिवस कार्यशाला मनाकर इतिश्री कर लेते है.

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  • Published: 3 years ago on June 5, 2014
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  • Last Modified: June 4, 2014 @ 1:51 pm
  • Filed Under: मीडिया

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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