/सत्ताधारियों के संकट हल करने की कुंजी बन गया है गैरसैण..

सत्ताधारियों के संकट हल करने की कुंजी बन गया है गैरसैण..

-इन्द्रेश मैखुरी||

गैरसैण में 9 जून से विधानसभा का तीन दिवसीय सत्र आयोजित किया जा रहा है. चूँकि उत्तराखंड की जनता की यह बीस बरस पुरानी आकंक्षा है कि गैरसैंण उत्तराखंड की राजधानी बने, इसलिए सत्ता के मुंह से गैरसैण का नाम सुनते ही लोगों में भी उम्मीद जाग उठती है कि शायद अबकी बार तो गैरसैंण को राजधानी बनाने की दिशा में सरकार कदम बढ़ाएगी और गैरसैण के दिन बहुरेंगे. सरकार में बैठे हुए लोग भी इस बात को जानते हैं. इसलिए जब-जब अलोकप्रियता या राजनीतिक संकट उन्हें घेरने लगता है तब-तब वे गैरसैण का जाप करने लग जाते हैं. अपने मुख्यमंत्रित्व काल में दीक्षित आयोग को कई दफे विस्तार देने वाले और फिर उसकी रिपोर्ट दबा कर रखने वाले भुवन चन्द्र खंडूड़ी को गैरसैण की याद तब आई जब भाजपा लोकसभा की पाँचों सीटें हार गयी. आनन-फानन में उन्होंने गैरसैण में ढोल-दमाऊ प्रशिक्षण केंद्र की घोषणा कर डाली. वह प्रशिक्षण केंद्र कहाँ है, उसने किसको प्रशिक्षण दिया, यह तो सिर्फ खंडूड़ी जी ही बता सकते हैं. यह भी विचारणीय है कि खंडूड़ी जी का यह ढोल-दमाऊ प्रशिक्षण केंद्र, प्रशिक्षण देता किसको है? परम्परागत रूप से ढोल बजाने वाले दलित लोगों तो प्रशिक्षण की नहीं सम्मान, बेहतर व्यवहार और आजीविका के साधनों की जरुरत है और नकली श्रेष्ठता बोध से ग्रसित आम सवर्ण लोग ढोल-दमाऊ का प्रशिक्षण लेंगे नहीं !! तो फिर ढोल-दमाऊ प्रशिक्षण केंद्र किसके लिए ? पर इतना सोचने की फुर्सत किसको थी, यह तो जनता को बहलाने के लिए खंडूड़ी साहब ने झुनझुना इजाद किया था.CAM00343

फिर कांग्रेस के राज में खंडूड़ी जी के ममेरे भाई विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री हो गए. वे उत्तराखंड की सरकार चलाने के लिए दिल्ली प्रवास करते थे. उनकी लिए उत्तराखंड की जनता से ज्यादा दस जनपथ वाली माता की गणेश परिक्रमा थी. सो चरम अलोकप्रियता पर पहुँचते ही उन्हें भी गैरसैण याद आया. उन्होंने 3 नवम्बर 2012 को गैरसैण में मंत्रिमंडल की बैठक आयोजित की और वहीँ ऐलान किया कि विधानसभा का एक सत्र गैरसैंण में भी आयोजित किया जाएगा. लोगों को इस घोषणा के पीछे का छल समझ में नहीं आया और उन्होंने फिर उम्मीद लगाई कि शायद गैरसैण राजधानी बने. “एक सत्र गैरसैण में करेंगे” की घोषणा में ही निहित था का बाकी सत्र देहरादून में करेंगे और सरकार देहरादून में ही बसेगी.रायपुर में विधानसभा बनाने की कवायदों ने सिद्ध कर दिया कि सत्ता पहाड़ चढने को तैयार नहीं है.गैरसैण में एक सत्र तो मंत्री-विधायकों-अफसरों की सालाना पिकनिक होगा.

उत्तराखंड में कांग्रेस के (भाजपा के भी) भीतर अनवरत सत्ता संघर्ष चलता रहता है. इसी सत्ता संघर्ष और टांग खिंचाई में हरीश रावत मुख्यमंत्री बने हैं. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पाँचों सीटें हार गयी है. हरीश रावत को फूटी आँख ना देख सकने वाले सतपाल महाराज तो कांग्रेस से भाजपा में जा चुके हैं पर पत्नी समेत उनका गुट अभी भी कांग्रेस में मौजूद है और हरीश रावत की कुर्सी हिलाने पर उतारू है. अपनी डगमगाती कुर्सी को टिकाये रखने के लिए हरीश रावत ने गैरसैण में विधानसभा सत्र का दांव चला है.

गैरसैण में विधानसभा का सत्र हो तो तम्बुओं में रहा है. लेकिन ये आलीशान एयर कंडीशन वाले तम्बू हैं. सो तीन दिन में करोड़ों रुपये स्वाह कर दिए जायेंगे. गैरसैण के खुशगवार, सुहावने मौसम में जहां लोग आम तौर पर पंखे का इस्तेमाल भी नहीं करते हैं वहाँ मंत्री-विधायकों-अफसरों के एयर कंडीशन प्रेम से ही समझ में आ जाता है कि यह जनता से जुड़ने की नहीं, जनता की भावनाओं का दोहन कर जनता के पैसे ठिकाने लगाने की कवायद है.

जिन लोगों को यह मुगालता है कि यह गैरसैंण को राजधानी बनाने की दिशा में उठाया जाने वाला कदम है, वे ग़लतफहमी में हैं और सत्ता की चाल नहीं समझ पा रहे हैं. राजधानी चरणों में स्थानांतरित होने वाली चीज नहीं है. उत्तराखंड की राजधानी लखनऊ से देहरादून आई तो चरणों में नहीं आई, रातों-रात आई. दो जगह विधानसभा सत्र वाला मॉडल भी कोई नया नहीं है. महाराष्ट्र में विधानसभा का एक सत्र नागपुर में होता है और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा का एक सत्र धर्मशाला के पास होता है. विधानसभा का एक सत्र चलने से जैसे नागपुर और धर्मशाला राजधानी नहीं हो गए, वैसे ही गैरसैण भी नहीं होगा.

उत्तराखंड के सन्दर्भ में तो गैरसैण राजधानी का मसला सिर्फ सत्ता के निवास स्थान और कार्य स्थान बदलने का मामला नहीं है. लुटेरी और भ्रष्ट व्यवस्था देहरादून से आकार गैरसैण में बैठ कर संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार को अंजाम देने लगे तो वह जनता के किस काम की? पलायन, बेरोजगारी से निजात मिले, जल, जंगल और जमीन जैसे संसाधनों पर जनता का अधिकार हो, विकास के केंद्र में जनता हो , ठेकेदार और बड़े पूँजीपति नहीं, यह भी राजधानी पहाड़ में हो,इस भावना में निहित है.जाहिर सी बात है कि यह वर्तमान समय में सत्ता की अदला-बदली जिनके बीच हो रही है, उनके रहते होने वाला नहीं है. इस के लिए तो लड़ना ही पडेगा, इसका कोई शॉर्टकट नहीं है. कल ही कांग्रेस सरकार के बडबोले मंत्री हरक सिंह रावत ने कह ही दिया है कि गैरसैण राजधानी नहीं बन सकती है,पार्टियां इस मामले में जनता को गुमराह कर रही हैं. हरक सिंह रावत का यह बयान गैरसैंण में होने वाले विधानसभा सत्र को नौटंकी सिद्ध करने और हरीश रावत के गैरसैण प्रेम की हवा निकालने के लिए पर्याप्त है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.