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बिजली दिल्ली दी..

By   /  June 11, 2014  /  No Comments

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-शीतल पी. सिंह||

दिल्ली की निम्न मध्यम वर्ग की और झुग्गी झोपड़ी वाली आबादियों के इलाक़ों में “बिजली संकट” आ गया है. कुछ घने बसे मध्यवर्गीय इलाक़े भी इसकी चपेट में हैं. क़रीब आधी आबादी ४७ डिग्री की गर्मी में भगवान भरोसे पहुँच गई है. मौसम विभाग ने मानसून हल्का और कुछ लेट होने की संभावना बताई है. सत्तारूढ़ दल ने भी क़रीब उतना ही वक़्त (दो हफ़्ते) माँगा है बिजली ठीक करने के लिये.electric cut

गर्मी से बिलबिलाते लोग सड़कों पर,टी वी वालों के सामने और सोशल मीडिया पर भड़ास निकाल रहे हैं. हालाँकि जवाबदेही बीजेपी की मोदी सरकार की है पर नौनिहाल होने के कारण लोग अभी सीधे उनका नाम नहीं ले रहे. कांग्रेस ने “आप” पर और बीजेपी ने पिछले १५ साल की कांग्रेस पर ठीकरा फोड़ दिया है.

देखना होगा कि हुआ क्या ?

बीते विधान सभा चुनाव में “आप” ने बिजली के बिल ५०% कम करने के दावे पर चुनाव लड़ा था. बीजेपी ने थोड़ा ज़िम्मेदार दिखते हुए ३०% कम करने का दावा ठोंका था. “ईमानदार” कांग्रेस पार्टी ने दोनों को शेखचिल्ली कहा था.

२८ सीटें पाकर कांग्रेस के classic बिना शर्त समर्थन से बनी केजरीवाल सरकार ने पहले ही हफ़्ते में एक बड़े समुदाय के बिजली के बिल सचमुच में आधे करने का ऐलान कर अर्थशास्त्र वालों को माथा पीटने पर मजबूर कर दिया था. डिस्कॉमके कैग द्वारा अंकेषणकराने के उनके फ़ैसले से तो वामपंथी भी चकरा गये थे. अंबानी की BSES जो कांग्रेसियों की मिलीभगत से सरकार का ४००० करोड़ से ज़्यादा बिजली का भुगतान हड़पे बैठी थी वो तो पूरी तरह बौखला गई थी, तुरंत हाई कोर्ट भागी और बिजली संकट खड़ा करने की मीडिया जनित campaign पर आ गई थी. केजरीवाल ने बहुत बड़ी हिम्मत से उसे बैकफ़ुट किया, वो हाई कोर्ट में भी हारी और सुप्रीम कोर्ट में भी. Audit का आदेश क़ायम है पर कंपनी के असहयोग की ख़बरें हैं. पर केजरीवाल ४९ दिनों में ही कुर्सी छोड़कर पी एम के मोर्चे पर निकल गये और पराजित हुए, आ गये मोदी.

सब कुछ स्क्रिप्ट के अनुसार चल रहा था. TV और प्रिंट मीडिया चरण चुंबन में प्रतियोगिता में था/है. नवाज़ शरीफ़ बिऱयानी खाकर और बर्रा कवाब बँधवा कर लौट चुके थे.अमेरिका का निमंत्रण आ चुका था,चीनी विदेश मंत्री फ़ोटो अप करा रहे थे कि मरी आँधी आ गई और दिल्ली के बिजली के बड़के वाले खम्भे उखाड़ गई. और खुलने लगा ढोल का पोल.

जब दिल्ली वालों का तेल निकल कर चड्ढी तक जा पहुँचा तो वे मोदी हैंगओवर से जागे. जब दस दिन तक कोई सुध लेने नहीं आया तो सड़कों पर बिलबिलाने लगे. मीडिया को रास रंग छोड़ आना पड़ा. TV पर शाम के अखाड़ों का एजेंडा बदला. ऐंकर दहाड़े. सरकार जागी. नई सरकार के युवा मंत्री ने एल जी, चीफ़ सेक्रेटरी और दूसरे अफ़सरों से पढ़ समझ के बयान दिया ” दस पंद्रह दिन तो झेलना पड़ेगा क्योंकि संदीप की मम्मी १५ साल में कुछ कर के नहीं गईं “।

कांग्रेस ने फट केजरीवाल की गर्दन पर सारा रद्दा लादा. “४९दिन की केजरीवाल सरकार ने समर प्लानिंग नहीं की” हारुन यूसुफ़ बोले.

दोनों में से किसी ने भूलकर भी बिजली कंपनियों का नाम तक नहीं लिया. बीजेपी के मंत्री और दिल्ली की पूरी पार्टी ने ३०% बिजली बिल कम करने पर मुँह खोलने पर ही लगाम लगा ली है. इन्हीं लोगों ने भांट मीडिया के साथ पहले दिन से ही केजरीवाल की आंत निकाल ली थी, अब कह रहे हैं सरकार को दस ही दिन तो हुए हैं ! संपत महापात्रा तो २०१९ में हिसाब देने को कह रहे हैं.

चलिये नारा लगाइये “अच्छे दिन”……..

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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