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दो, दो सौ, दो हज़ार: लुटती आबरू बस आंकड़े ही हैं..

By   /  June 11, 2014  /  No Comments

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-कनुप्रिया गुप्ता||

लड़कियां, मांस के कुछ लोथड़े, उठती गिरती सांसों वाला जेसे एक मशीनी जीव , जीव क्यों परजीवी  हमेशा निर्भर टाइप, पहले माँ बाप पर फिर, फिर पति पर और फिर बेटे पर.जो इस सब से ऊपर उठ गई वो भी जीने की अधिकारी है  या नहीं, हसने की अधिकारी है नहीं अपने मन से उठने बैठने जीने, फैसले लेने की अधिकारी है या नहीं ये सब दूसरे सोचेंगे, और अगर वो इसे नकार देगी तो उन्हें देख लिया जाएगा, देख लिया जाएगा की उन्हें आखिर स्वतंत्रता का हक दिया किसने, बोलने का जीने का उनने सोचा भी कैसे ? पढ़ने में बुरा लगता है न? पर बस पढ़ने में ही बुरा लगता है करने में बुरा नहीं लगता.rape

वेसे  तो बुरा सोचने में भी लगना चाहिए पर सोच पर रोक नहीं लगाईं जा सकती उसे तो खुद बदलना पड़ता है पर लोग बदलना नहीं चाहते.

समाज दोगला तो हमेशा से था पर ये दोगलापन बढ़ता जा रहा है दिन-ब-दिन. जिसे पूजते हैं उसे ही नोच डालने में शर्म नहीं करते और शर्म नहीं करते भरे चौराहे उनकी लाशों को लटका देने में.

दो, दो सौ, दो हज़ार!!! बस ये आंकड़े ही तो है जो हर दिन बढते जाते हैं  अमरबेल की तरह और अपने अंदर समां लेते है एक लड़की, कभी रेप करके पेड़ से टांग दी गई, कभी मासूमियत की उम्र में हैवानियत का शिकार हुई. कभी बीच सड़क पर बेपर्दा कर दी गई. और कारण? कारण हर बार वही मिलते जुलते से. किसी ने किया था विद्रोह अपने नोचे जाने का, किसी ने चाहा ऊँचे आसमान की ऊंचाइयों को छूना, कोई बेचीं नहीं जाना चाहती थी वस्तु  की तरह, और कुछ का तो कोई कसूर नहीं वो तो इतनी मासूम रहीं होंगी कि अपने साथ हो रहे कुकर्म को समझ तक नहीं पाई  होगी .

लड़कियां कुछ नहीं आंकड़ों के सिवा कुछ नहीं, यकीन नहीं होता न पर यही सच है हर दिन होती रेप की घटनाएँ तो यही कहती है, तरह तरह के सवाल, बहस, वाद विवाद  सब अपनी जगह और लुटती हुई आबरू अपनी जगह . पर फर्क तो नहीं दिख रहा , मोमबत्तियाँ जलाकर, आंदोलन करके या सजा देकर भी हम क्या कर पाए ? जिन्हें जख्म मिला, जिनकी जान गई  वो अपना दर्द झेल रही है. और हम हर दिन किसी एसी खबर को देखकर “ओह नो ‘ कहकर लग जाते है काम में, या खरीद लाते  हैं एक और मोमबत्ती, या पूरा पैकेट  क्यूंकि, अगली आत्मा की शांति के लिए भी तो चाहिए होगा न कुछ जलाने  के लिए.

हम सब करेंगे, रो लेंगे, विलाप करेंगे गरियाएंगे, कोई बयान आएगा कि “हो जाती है लडको से गलतियाँ ” या “कोई जानकार रेप नहीं करता” तो सुनकर अपना खून खोला लेंगे  पर अपने बेटों को नहीं सिखाएँगे की लड़कियों की इज्जत करो, पर सिखाएगा कौन? वो आदमी जो खुद अपने घर की औरतों की इज्जत न कर सका कभी, न ही  उसने पिछली पीढ़ी में होते देखी, या वो औरतें जो खुद को इज्जत न किए जाने लायक समझने लगी है, या उन्हें पता ही नहीं होता की सच में वो क्या डीज़र्व करतीं हैं  उनके अपने अधिकार नहीं जानती.अपनी बेटी के लिए कभी नहीं लड़ी ,और उन्हें भी यही सिखाया .सच ये नहीं है की सब ऐसे  ही हैं सच बस ये है की हम सब आदि हो चुके हैं. घर की छोटी छोटी घटनाएँ, बेटियों के ऊपर बेटों को दिया जाने वाला विशेष दर्ज़ा चाहे जाने चाहे अनजाने में  धीरे धीरे कब बेटों को /लड़कों को आदमियों को ये अहसास दिलाता है की वो स्वामी है उनके पास सत्ता है उनके पास अधिकार है और वो अपने को विशेष समझने लगते हैं.

बचपन से आप उन्हें विशेष अधिकार  देते है और बड़े होकर ये सिखाने की चाहे कितनी ही कोशिश करें की लड़कियां उनके बराबर है वो नहीं मानेंगे ,नहीं मानेंगे की लड़कियां भोग की वस्तु नहीं, उनके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं.

एक कानून, एक नियम एक सजा बस डर पैदा कर सकता है  पर जब ये वहशी लोग डर के आगे जीत है मान बैठे, ये मान बैठे की लड़कियों को पेड़ों पर टांग देना  उनकी इज्जत लूट लेना उनका अधिकार है तो आप किसी सजा से उन्हें डरा नहीं सकते …सजा के डर के साथ सामाजिक बहिष्कार भी जरुरी है पर अपराध सिद्ध होने के बाद वरना ऐसे भी केस है जब कोई निरपराध सिर्फ झूठे आरोप के चलते मीडिया और समाज के बहिष्कार में बेवजह परेशां हुआ .

अब शर्म आती है ये कहने में की लड़कियों को इज्जत दीजिए… आप कुछ मत दीजिए वो इज्जत खुद कमा लेंगी आप बस इतना कर लीजिए की अपने बच्चो को अच्छे संस्कार दीजिए वरना लड़कियां क्या है एक आंकड़ा जो पुरषों की संख्या में कम होता है क्यूंकि उन्हें गर्भ में मारा गया और कभी इसलिए कम होता है की उन्हें इस दुनिया  में आने के बाद टांग दिया पेड़ों पर …

उन्हें आपकी मोमबत्ती की जरुरत नहीं ,हमदर्दी की भी नहीं  …सिर्फ उनका अधिकार उन्हें दीजिए जीने का अधिकार ,हसने का अधिकार, पढ़ने का बोलने का अधिकार , और सबसे ज्यादा अपने शरीर को मांस का लोथड़ा नहीं समझने का अधिकार ,उनके शरीर पर उनके मन पर उनका अपना अधिकार …

होता है ज़रा विवाद जब लुटती है लड़कियां

कुछ देर के लिए ही खुलती है खिड़कियाँ

बस फिर ज़रा सी देर में  सब काम में मशगूल हैं

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  • Published: 4 years ago on June 11, 2014
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  • Last Modified: June 11, 2014 @ 8:09 pm
  • Filed Under: अपराध

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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