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‘सबका साथ, सबका विकास’ की मांग करना आर्थिक विकास को रोकना नहीं हैः ग्रीनपीस इंडिया

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नई दिल्ली, 11 जून 2014. ग्रीनपीस इंडिया ने इंडियन एक्सप्रेस के साथ साझा किये गए खुफिया ब्यूरो के रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों को खारिज किया है. प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपे गए रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी फंड से चलने वाले एनजीओ (मुख्यतः ग्रीनपीस) देश का विकास रोकने का काम कर रहे हैं. ग्रीनपीस इंडिया मानती है कि कई सारे तथ्य को गलत तरीके से पेश किया गए हैं. ग्रीनपीस के अभियान को गलत तरीके से समझा जा रहा है तथा यह एक सभ्य समाज में विरोध की आवाज को दबाने का प्रयास है.green peace

ग्रीनपीस के अभिषेक प्रताप ने कहा कि, ‘ग्रीनपीस एक स्वतंत्र संस्था है जो सतत विकास और स्थायी विकास के लिए अभियान करती है. हम सबका साथ, सबका विकास के सिद्धांत पर काम करते हैं. यह कैसे देश के आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है? हम उन शक्तिशाली कॉर्पोरेट हितों के लिए जरुर खतरा हैं जो लाखों लोगों और पर्यावरण की परवाह किए बिना अपना हित साधने में लगी है’.

एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रताप ने कहा कि, ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश में रहते हुए हमारे पास अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है. हम मानते हैं कि यह रिपोर्ट पर्यावरण और लोगों के अधिकार को लेकर आवाज उठाने वाले नागरिक समाज को चुप कराने के लिए लायी गई है’.

अभिषेक ने विस्तार से बताया कि, ‘जहां तक बात विदेशी फंड को लेकर है तो ग्रीनपीस इंडिया व्यक्तिगत समर्थकों के चंदे से संचालित है. ग्रीनपीस एक स्वतंत्र संस्था है जो किसी भी सरकार और कॉरपोरेट से पैसा नहीं लेती है. साल 2013-14 में ग्रीनपीस इंडिया ने 60 प्रतिशत फंड अपने 3 लाख भारतीय समर्थकों से जुटाए हैं. सिर्फ 37 प्रतिशत विदेशी अनुदान ग्रीनपीस इंटरनेशल ऑफिस से प्राप्त होता है’.

ग्रीनपीस इंडिया अपने अभियानों से उम्मीद करती है कि नयी सरकार अपने अभिनव सोच के साथ भारत को कोयला और खतरनाक परमाणु की जगह एक सुरक्षित ऊर्जा भविष्य की तरफ ले जायेगी, लोगों को समान ऊर्जा देने के साथ ही कार्बन उत्सर्जन के स्तर को भी नियंत्रित रखेगी. प्रताप कहते हैं कि, ‘भूमिगत कोयले को हासिल करने के लिए हमारे जंगलों को खत्म करने की जगह हम विश्वास करते हैं कि हमारे देश को अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ना चाहिए’.

ग्रीनपीस इंडिया विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा के माध्यम से आधुनिक बिजली के उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए अभियान कर रहा है. इस देश में 300 करोड़ लोग हैं जो अभी भी बिना बिजली के रहते हैं. प्रताप बताते हैं कि, ‘यह अफसोस की बात है कि आजादी के 60 साल बाद भी सभी घरों को बिजली मुहैया नहीं कराया जा सका है. क्या सबको बिजली मुहैया कराने का प्रयास विकास विरोधी कार्य है ? क्या इन 300 करोड़ लोगों को इस विकसित भारत का हिस्सा नहीं हैं? कोयले के विरोध का मतलब देश के आर्थिक विकास का विरोध करना नहीं है. सरकार को देश की जनता के आर्थिक विकास को सुनिश्चित करना चाहिए न कि कोयला और परमाणु ऊर्जा की पैरवी करने वाले लोगों की’.

विदेशी फंडिंग के आरोप का जवाब देते हुए प्रताप ने कहा कि, ‘ग्रीनपीस एक वैश्विक संस्था है जो पर्यावरण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर काम करती है जिसे किसी भी देश की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है. ऊर्जा और कृषि प्रौद्योगिकी विकल्पों के आसपास के निर्णय भारी विशाल विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनकी सरकारों से प्रभावित हैं. इन फैसलों से प्रभावित समुदायों की आवाज को प्रभावी बनाने के लिए हम दुनिया भर के लोगों की आवाज को उनके साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं. मानवता और पर्यावरण की लड़ाई दुर्भाग्य से सिर्फ भारत में ही नहीं है’.

ग्रीनपीस इंडिया ने कहा कि रिपोर्ट की एक प्रति के लिए गृह मंत्री से संपर्क किया गया है और उम्मीद है कि सरकार इस मुद्दे पर पारदर्शिता सुनिश्चित करेगी. ग्रीनपीस सभी सवालों के जवाब और चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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