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आज कैंपाकोला सोसायटी के खाली करने होंगे 102 फ्लैट.. बेघर बार होंगे बाशिंदे..

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मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी में बने अवैध फ्लैट्स को खाली करने में अब महज कुछ घंटे बचे हैं. कैंपा कोला के 102 अवैध फ्लैट्स में रहने वाले लोगों को अपने घरों को छोड़कर आज शाम पांच बजे तक जाना होगा. सरकार और सुप्रीम कोर्ट से सारे दरवाजे बंद हो चुके हैं लेकिन लोग अड़े हैं. उनका कहना है कि वो किसी भी हालत में सरकार को अपने घरों की चाभी नहीं देंगे.mumbai-campa-cola-residents

सोसायटी के कंपाउंड में ही धरने पर बैठे लोगों ने कहा कि आज चाहे कोर्ट की अवमानना का मामला चले या फिर पुलिस जबरन हमें हटाए, हम किसी भी कीमत पर इस जगह को नहीं छोड़ेंगे.

लोगों ने कहा कि आज सरकार और बीएमसी हमें हटाने के लिए फोर्स लेकर आ रही है. ये फोर्स उस समय बिल्डर को हटाने के लिए क्यों नहीं आई. उस समय सरकार ने कदम उठाया होता तो आज हमें उसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ती. लोगों ने कहा कि आज चाहे पुलिस गोली मारे या लाशें गिरा दे लेकिन हम अपना ये घर नहीं छोड़ेंगे.

क्या है कैंपा कोला सोसायटी का विवाद
सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ रहा है, जिंदगी भर की इनकी पूंजी क्यों इनसे छिन रही है. आखिर क्या है कैंपा कोला सोसायटी में

फर्जीवाड़े और लोगों से धोखे की कहानी
– 1981 में कैंपा कोला की जमीन पर बिल्डिंग बनाने की इजाजत तीन बिल्डर्स यूसुफ पटेल, बीके गुप्ता और पीएसबी कंस्ट्रक्शन को मिली.
– 1983 में बिल्डर ने 5-5 मंजिलों की 9 इमारत बनाने का प्लान BMC को सौंपा, जिसे मंजूरी मिल गई.
– लेकिन फिर बिल्डर ने प्लान बदलते हुए ज्यादा मंजिलों का प्लान BMC को दिया जो नामंजूर हो गया.
फिर 5 मंजिल की मंजूरी के हिसाब से बिल्डर ने निर्माण कार्य शुरू किया. लेकिन BMC के नोटिस के बावजूद बिल्डर ने अवैध रुप से कई फ्लैट्स बना डाले. 1989 तक सारी बिल्डिंग बनाकर लोगों को फर्जीवाड़े की बात बताए बिना सारे फ्लैट बेच डाले. जब फ्लैट बिक गए तब BMC ने अपनी रिपोर्ट दी और कहा कि बिल्डर ने गैरकानूनी निर्माण किया है.

हर जगह से मिली हार
बीएमसी इस मामले को कोर्ट लेकर गई. पहले सिविल कोर्ट, फिर हाईकोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट. लेकिन उन लोगों को कोई राहत नहीं मिली जिन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई एक अदद छत लेने में लगा दी.
सरकार ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं तो दूसरे राजनीतिक दल भी खुद को अदालती आदेश के आगे बेबस बता रहे हैं. पर बड़ा सवाल आखिर जब अवैध निर्माण हो रहा था तब BMC कहां थी? बिल्डर पर महज चंद लाख का ही जुर्माना क्यों लगा? बिल्डर पर लोगों को धोखा देने का केस क्यों नहीं चलाया जाए? क्यों बिल्डर से लोगों के नुकसान की भरपाई न करवाई जाए?

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. बिल्डर को अधिकारीयों ने छूट दी , लोगों ने भी अपनी कमाई वहां लगा दी उनहें क्या पता था कि यह अंजाम होगा एक आज़ाद जनतंत्र में यह न्याय कैसा न्याय है अदालत तो यह सोच ही सकती थी कि बी एम सी ने जब बिल्डर से पैसा ले लिया तो अब वह जिम्मेदार है निवासियों को क्या पता था कि इसके निर्माण के लिए कितनी मंजिलों की अनुमति मिली है बेचारों ने धोखे पर धोखे खाए और फिर भीं कसूरवार रहे
    यह भारत में ही सम्भव है क्योंकि मेरा देश महान है

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