/ग्रीनपीस ऑफिस के बाहर हंगामा, सामाजिक संगठनों ने की निंदा..

ग्रीनपीस ऑफिस के बाहर हंगामा, सामाजिक संगठनों ने की निंदा..

सिंगरौली, 12 जून 2014. ग्रीनपीस ऑफिस के बाहर हंगामा करने वालों की सामाजिक संगठनों ने कड़ी निंदा की है. संगठनों ने इसे लोगों के अधिकार को लेकर उठने वाली आवाज को दबाने की कोशिश बताया है. आज वैढ़न स्थित ग्रीनपीस ऑफिस के बाहर कुछ लोगों ने हंगामा किया.green-peace

ग्रीनपीस न तो महान संघर्ष समिति को किसी तरह का फंड देती है और न ही किसी राजनीतिक दल से उसका कोई संबंध है. महान संघर्ष समिति पूरी तरह से ग्रामीणों का स्वतंत्र संगठन है जो सदियों से अपनी आजीविका के लिए महान जंगल पर निर्भर है. समिति के कार्यकर्ता अपनी इसी आजीविका को बचाने के लिए पिछले कुछ सालों से संघर्षरत हैं. ग्रीनपीस महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं को वनाधिकार कानून 2006 के तहत सामुदायिक वनाधिकार दिलाने के लिए प्रयासरत है. ग्रीनपीस महान संघर्ष समिति को आगे भी उनके अधिकारों के लिए जागरुक करती रहेगी. महान जंगल को कोयला खदान के लिए महान कोल लिमिटेड को आवंटित किया गया है. इस जंगल पर कोयला खदान आने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से करीब 54 गांवों के 50 हजार से अधिक की आबादी प्रभावित होगी.

ग्रीनपीस की कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने कहा कि, “हमलोग इस घटना की कड़ी निंदा करते हैं. यह स्पष्ट रुप से कंपनी के द्वारा करवाया गया है. आईबी रिपोर्ट के अनुसार ग्रीनपीस विकास विरोधी है जो बिल्कूल ही गलत तथ्य है और यह हमारी आवाज को दबाने का प्रयास है. हमलोग किसके विकास की बात कर रहे हैं ? क्या सिंगरौली में लोगों की जीविका खत्म करके उन्हें विस्थापित करना ही विकास है? हमें विकास के मॉडल पर फिर से विचार करने की जरुरत है जो कंपनियों के विकास के लिए बनायी गयी है. ग्रीनपीस आगे भी लोगों के अधिकारों और पर्यावरण के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी.”

ग्रीनपीस एक स्वतंत्र संस्था है जो अपने तीन लाख से अधिक भारतीय समर्थकों से व्यक्तिगत चंदा इक्टठा करती है. ग्रीनपीस न तो किसी भी सरकार और न ही किसी कॉर्पोरेट संगठन से पैसा लेती है.

किसान आदिवासी विस्थापित एकता मंच की एकता ने इस घटना को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि, “इस तरह हंगामा खड़ा करके लोगों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. विरोध का तरीका लोकतांत्रिक होना चाहिए.”

ग्रीनपीस एक अराजनीतिक संगठन है लेकिन ग्रीनपीस का कोई भी कर्मचारी व्यक्तिगत रुप से किसी भी राजनीतिक विचारधारा को रखने के लिए स्वतंत्र है. यदि कोई कर्मचारी चुनाव जैसे राजनीतिक गतिविधि में भाग लेता है तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है. पंकज सिंह के मामले में भी इसी नियम का पालन किया गया है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.