/बेहतर आपदा प्रबंधन और ठोस कदम वक़्त की ज़रूरत हैं..

बेहतर आपदा प्रबंधन और ठोस कदम वक़्त की ज़रूरत हैं..

-पुष्पेन्द्र सिंह||

उत्तराखंड त्रासदी को एक साल पूरा हो गया. १२ महीने बीत गए लेकिन साथ ही इन ३६५ दिनों में बहुत कुछ है जो उत्तराखंड में रीत गया. फेसबुक के माध्यम से राहत कार्य में जुटने के लिए कुछ युवाओं का एक दल आगे आया और त्रासदी के तीन दिन बाद हम १९ तारीख को हरिद्वार से आगे रायवाला पहुँच गए थे. वहां तकरीबन ९ लोग साथ मिले और जो राहत सामग्री थी. इकठ्ठा की और आगे की तरफ बढ़ लिए. नुकसान केदार घाटी में ज्यादा था. और जैसा पता चल रहा था रामबाड़ा और गौरीकुंड सबसे ज्यादा प्रभावित थे और सबसे ज्यादा जानमाल की क्षति वहीँ हुई थी इसलिए हम लोग उसी दिशा में आगे बढे. ऋषिकेश से आगे बढ़ते हुए रास्ते में भी कई आपदा राहत शिविर थे जो कि घाटी से बचकर लौटते हुए तीर्थयात्रियों को जल . भोजन दवाइयां आदि दे रहे थे. रास्ते में सुविधाजनक स्थानों से टिहरी के पास कई जगह रिपोर्टिंग करते पत्रकार दिखे. वापस आती हुई गाड़ियां और गाड़ियों के अंदर बैठे लोगों की हालत देखकर ही अंदाजा हो रहा था कि तीन दिन से क्या हो रहा है वहां. कइयों से बातचीत शुरू करने की कोशिश करते ही फफक फफक कर रोने लगते. हालात ये थे ऊपर प्राकृतिक आपदा की वजह से जो नुकसान हुआ सो अलग. कई तीर्थयात्रियों के साथ मार पीट. लूट और उसके बाद हत्या के भी मामले सामने आ रहे थे. हुआ यह था की जब बाढ़ आई तो सबने पहाड़ में ऊपर की तरफ जाने का प्रयास किया और ऊपर जो जा सके वो जंगल में खो गए. जैसा बच पाये लोगों ने बताया उससे पता लगा की वहां के कुछ लोकल लोग. कुछ नेपाली इन पर्यटकों को सही रास्ता बताने के बहाने गुमराह करके ले जाते और उनका सामान लूटकर या तो भगा देते या हत्या तक कर देते. सुनकर ही रूह कांप रही थी कि इंसान ने इंसानियत को कितना शर्मसार किया है. हाथ उस वक़्त काटे गए जब हाथ थामने का वक़्त था.uttrakhand

जैसा हमें महसूस हुआ कि प्रशासन की प्राथमिकताएं केवल पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को बाहर निकालना ही थी. एक दिन वही रूककर हम लोग आगे बढे. आगे मयाली कस्बे के पास हमने अपना एक कैंप बनाया जहां स्थानीय लोगों से पता चला कि अगस्त्य मुनि इलाका पूरी तरह सड़क मार्ग से कट चुका है और चंद्रपुरी. कंडारा और कई गाँव अब संक्रमण के शिकार होना शुरू हो गए हैं. राहत सामग्रियाँ लगातार आगे की तरफ जा रही थी लेकिन सही जगह पहुँच पा रही होंगी इसमें काफी संदेह था. सुनने में यहाँ तक भी आया कि राहत सामग्री सही जगह न पहुंचा पाने की वजह से ये ट्रक / जीप रास्ते में सामान गिराकर भी आ रहे थे और कहीं कहीं ये भी सुना कि इसको भी बेचकर पैसे कमाए गए. २४-२५ जून की रात मयाली में भी भारी बारिश हुई और भूस्खलन की वजह से रास्ता भी बंद हो गया. वहां एक दो रात बिताने के दौरान उन लोगों से भी बातचीत हुई जो गौरीकुंड से बचकर या राहतसामग्री देकर वापिस आ रहे थे. हालात वहां बदतर थे और शवों का अम्बार लगा हुआ था. इलाका बदबू से भरा हुआ और अब चूँकि ८-९ दिन बीत चुके थे इसलिए संक्रमण भी अब बहुत अधिक हो रहा था. NDMA के जवानों से वहां का हाल सुनकर अंदर तक सिहर जाते थे हम लोग. सेना के जवान. कई पैरामिलिट्री फोर्सेज राहत एवं बचाव कार्य में लगे हुए थे लेकिन समस्या यह थी की आपदा प्रबंधन में हम पूरी तरह असफल रहे. सरकार का ध्यान राहत नहीं सिर्फ बचाव पर ही था. सिर्फ तीर्थ यात्रियों के बचाव पर.

राहत सामग्री में कपडे. भोजन पानी दवाइयाँ जैसे सभी जरुरी चीजें थी लेकिन राहत सामग्रियाँ होना ही काफी नहीं था सबसे बड़ी समस्या उनको उचित एवं जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाना था. परिवहन सबसे बड़ी समस्या थी. सभी मुख्य मार्ग कटे हुए थे. तकरीबन ९००० किलोमीटर सड़क का नुकसान हुआ था और इस समस्या के तत्काल समाधान में सरकार और बाकी स्वयंसेवी संस्थाएं भी असमर्थ थीं.

सरकारी संस्थाओं और निकायों द्वारा बचाव कार्य के लिए जारी किये गए उचित दिशा निर्देशों का हमारे पास पूरी तरह अभाव था. जिस समय हमें तेज और जल्द निर्णय लेने होते हैं उस समय किसी को समझ नहीं आ रहा था कि योजना बढ़ तरीके से कैसे काम किया जाए. आज भी शवों के मिलने की खबर आती रहती है. कुछ दिन पहले ही १७ नरकंकाल मिले हैं और ये गवाही हैं कि हमारा तंत्र कितना सुस्त और ढीला है. अनुग्रह भी चूँकि सरकारी आंकड़ों के हिसाब से मिलना है इसलिए केवल ४००० लोगों को ही बांटा जा सका है १५०० लापता और १०००० के अनुमानित जान हानि के बीच ये आंकड़ा हास्यापद ही है.

राहत के लिए. बचाव के लिए लोग तो आगे आये. बढ़चढ़कर सहयोग भी दिया लेकिन उस सहयोग को जरूरतमंदों तक सही ढंग से पहुँचाया न जा सका. राहत शिविर हरिद्वार में भी लगे हुए थे जिसकी शायद ही कोई जरुरत हो. जरुरत हरिद्वार में खाना खिलाने की नहीं बल्कि रुद्रप्रयाग. गुप्तकाशी. केदार घाटी. रामबाड़ा और गौरीकुंड में ज्यादा थी .कुछ लोगों ने यह भी बताया कि शवो के विसर्जन के लिए जिससे संक्रमण न फैले सामूहिक तौर पर किन्ही रासायनिक पदार्थों का उपयोग कर उन्हें गला दिया गया. जिसका अवशेष भी नदियों द्वारा बह कर ही तो आया होगा.

वहाँ के हालात तकरीबन १५ दिन वही रहकर जितना महसूस किया उसे यह समझ आया की तीर्थयात्रियों के बचाव. शवों के विसर्जन के बाद जो जरुरत होगी वो है. पानी के संक्रमण रहना. स्वास्थ्य समस्याएं और फिर जब इन सब से मुक्ति मिले तो पुनर्वास सबसे बड़ी समस्या होगी. केदार घाटी में मुख्य आय श्रोत पर्यटन ही था जो की पूरी तरह तबाह हो गया था. आपदा प्रबंधन में हम बिलकुल असमर्थ एवं असफल रहे थे. जिस दिन हम लोग चन्द्रपुरी कई किलोमीटर ट्रेक करके पहुंचे और वहां की समस्याएं अपने सामने देख. महसूस कर रहे थे उस दिन अखबार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जी का बयान था ”चंद्रपुरी में कुछ डायरिया के मामले सामने आये जिनसे निपट लिया गया है . स्थिति वहां अब काबू में हैं” और हम वहां देख रहे थे कि सक्रमण से निबटने की छोड़िये. भोजन का भी अभाव था. परिवहन पूरी तरह से ठप्प पड़ा हुआ था।

अब एक साल बीत लेकिन उत्तराखंड में अब भी आपदा प्रबंधन के लिए हम तैयार नहीं है. हिमालय क्षेत्र में भविष्यवाणियाँ एवं अनुमान लगाने के लिए १२ डॉप्लर प्रस्तावित थे पर सरकार का प्रयास अभी बस प्रयासों की श्रेणी में ही है. पर्यावरणविद कहते हैं हिमालय राज्यों के लिए राज्य स्तर पर अलग नीतियां बननी चाहिए. वहीँ सरकार के एक मंत्री कहते हैं की बेहतर आपदा प्रबंधन के लिए नियम और व्यापक रणनीति तय होनी चाहिए. लेकिन इन सब बहसों/ मुबाहिसों के बीच पुनर्वास अभी भी अपनी सुस्त रफ़्तार में है. सरकार अभी भी लचर रवैये में. और उत्तराखंड के निवासी रोजगार. पुनर्वास से जूझने के लिए अभिशप्त.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.