/कोई नहीं चाहता दिल्ली में दोबारा विधानसभा चुनाव..

कोई नहीं चाहता दिल्ली में दोबारा विधानसभा चुनाव..

-नदीम एस. अख्तर||

आपको यह रोचक लगेगा कि दिल्ली में दोबारा विधानसभा चुनाव कोई नहीं चाहता. ना केन्द्र की सत्ता में परचम लहराने वाली बीजेपी, ना शानदार आगाज करने वाली आम आदमी पार्टी यानी आप और ना ही अपना सब कुछ गंवा चुकी कांग्रेस.delhi_mwn

सबको डर है कि अगर चुनाव हो गए तो ना जाने क्या हो??!! किसी पार्टी का विधायक फिर से चुनाव के पक्ष में नहीं. पहले तो मुझे लग रहा था कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली में शानदार प्रदर्शन करने वाली बीजेपी खुशी-खुशी विधानसभा चुनाव में जाने को तैयार हो जाएगी और उस वक्त माहौल भी पूरी तरह बीजेपी के पक्ष में था. लेकिन नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद हालात इतनी तेजी से बदले हैं कि दिल्ली में गारंटी के साथ ये नहीं कहा जा सकता कि जनता बीजेपी के पक्ष में ही जाएगी. -आप- नंबर दो पर रही है, सो उसे तो आस है पर लगता है कांग्रेस ये मान चुकी है कि उसके जो गिन-चुने विधायक पिछली बार चुन के आए थे, इस दफा जनता उन्हें भी घर बिठा देगी.

बीजेपी का रवैया सबसे चौंकाने वाला है. चुनाव में ना जाने के डर से अब उसके नेता कह रहे हैं कि कोई आएगा तो मिलकर सरकार बना सकते हैं. ये वही बीजेपी है, जिसने लोकसभा चुनाव से पहले नैतिकता की दुहाई देते हुए सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने का दावा पेश नहीं किया था. कहा था कि हम सरकार जोड़तोड़ करके नहीं बनाएंगे. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में लोकसभा चुनाव के मद्देनजर high moral ground लेते हुए सत्ता के करीब जाकर भी दिल्ली बीजेपी उससे दूर रह गई.

लेकिन अब जब लोकसभा चुनाव हो गए हैं तो बीजेपी अपने पुराने रंग में आ गई है. अब जोड़तोड़ उसे स्वाभाविक लग रहा है. इसका कारण है. दरअसल देशभर में जनता ने जिस उम्मीद से मोदी को केन्द्र की सत्ता दी है, सरकार बनने के बाद उस तस्वीर में कई काले छींटे पड़े हैं और इसी का डर दिल्ली बीजेपी को सता रहा है.

मोदी ने जिन अच्छे दिनों का वादा किया था, उसे दिल्ली की जनता अभी तक महसूस नहीं कर पाई है और इसके संकेत भी नहीं दिख रहे. दिल्ली में बिजली संकट और उससे उपजी दूसरी समस्याओं ने जनता में जबरदस्त गुस्सा भरा है और इसके लिए वह बीजेपी की अगुवाई वाली मोदी को सरकार को ही जिम्मेदार मानती है. दूसरा, महंगाई फिर बढ़ने लगी है. आलू-प्याज के दाम बढ़ रहे हैं. डीजल से लेकर रेल किरायों में बढ़ोतरी की खबरों ने जनता के मन में काफी टीस भरी है. और ऐसे में जब पीएम मोदी का बयान आता है कि -हमें कड़े फैसले लेने पड़ेंगे- तो जनता का गुस्सा एटम बम बन जाता है. वह पूछ रही कि क्या इसी अच्छे दिन का वादा था बीजेपी का??!! फिर कांग्रेस और बीजेपी में क्या अंतर रहा?? अगर यही होना था तो फिर कांग्रेस वाले ही क्या बुरे थे!!! उस पर कोढ़ मे खाज ये कि मोदी के किसी मंत्री की शैक्षणिक योग्यता विवाद में आ जाती है तो कभी एक मंत्री भावी थल सेनाध्यक्ष को गुंडा-डाकू बोल देता है और कभी एक मंत्री रेप के आरोप से घिर जाता है. फिर भी सारे के सारे अपने पद पर विराजमान हैं और पीएम मोदी, भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही मौन साध लेते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इन सारी परिस्थियों और घटनाओं से जनता में बीजेपी के प्रति बहुत बुरा संदेश गया है और अचरज है कि अभी मोदी सरकार को बने 100 दिन भी नहीं हुए हैं. इतना कुछ हो गया!!!

हां, इन सब के बीच आम आदमी पार्टी का थोड़ा फायदा होता दिख रहा है. दो नाव की सवारी करने वाले अरविंद केजरीवाल को लोकसभा चुनाव में तो जनता ने सबक सिखा दिया था लेकिन महंगाई और दिल्ली में बिजली संकट ने -आप- के प्रति जनता में सकारात्मक रूख भरा है. ऐसे में अरविंद केजरीवाल जब निःसंकोच कहते हैं कि हमने इस्तीफा देकर गलती की थी जी, तो जनता का दिल उन्हें माफ करने को भी चाहता है. फिर केजरीवाल अपने 49-50 दिनों की सरकार की उपलब्धियां भी गिनाते हैं और कहते हैं कि हमने बिजली-पानी के बिल घटा दिए थे और ये बीजेपी वाले केन्द्र की सत्ता में आने के बाद कांग्रेस की ही तरह महंगाई बढ़ा रही है. इससे जनता एक बार फिर आम आदमी पार्टी की ओर खिंचती दिख रही है.

लेकिन इतना सब होने के बावजूद -आप- में ये कॉन्फिडेन्स नहीं है कि वो ताल ठोंककर दोबारा विधानसभा चुनाव में जा सके, जैसा वो पहले करने के लिए तैयार थी. उसे लगता है कि कहीं विधानसभा में भी दिल्ली वालों ने लोकसभा के हिसाब से वोटिंग कर दी तो आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस की तरह गिन-चुने विधायकों को लेकर डोलती नजर आएगी.

बीजेपी को मोदी सरकार बनने के बाद पैदा हुई परिस्थितियों और दिल्ली में उत्पन्न हुए बिजली-पानी-महंगाई संकट पर जनता के गुस्से की मार झलने का डर सता रहा है. सो वह भी चुनाव में जाने से कतरा रही है कि अबकी दफा कहीं आम आदमी पार्टी को उससे ज्यादा सीटें ना आ जाए.

सबसे शांत और चिरसंतोषी मुद्रा में कांग्रेस है. उसे पता है कि कम से कम इस विधानसभा चुनाव में वह लड़ाई पहले हार चुकी है और उसके हक में ज्यादा कुछ होने की उम्मीद नहीं. हां, उसे सिर्फ एक डर है कि मौजूदा सारे विधायक भी कहीं चुनाव ना हार जाएं.

सो स्थिति दिलचस्प है. सब चाह रहे है कि जोड़तोड़ करके किसी तरह सरकार बना लिया जाए. तो कभी कांग्रेसी विधायकों के टूटने की खबर आती है तो कभी -आप- विधायकों के. कभी सुनने में आता है कि -आप- बीजेपी के साथ जाकर सरकार बना सकती है तो कभी -आप- और कांग्रेस के मिलकर सरकार बनाने की खबर उड़ती है. सारे विकल्प तलाशे जा रहे हैं और इसी के साथ सबकी पोलपट्टी भी जनता के सामने खुल रही है.

राजनीति में कुछ भी संभव है. हो सकता है कोई सरकार बन जाए या फिर दोबारा चुनाव हो जाएं. अगर सरकार बनी तो ठीक लेकिन यदि चुनाव हो गए तो हो सकता है कि जनता के नए मूड का पता तीनों पार्टियों को चलेगा. टीवी कैमरों के सामने जवाब देने के लिए वो रटारटाया जवाब सभी पार्टियों के नेताओं के पास है ही- देखिए जी, विधानसभा चुनाव का मूड और माहौल, लोकसभा चुनाव से अलग होता है. जनता अलग तरीके से वोट करती है. हम अपनी हार की समीक्षा करेंगे.

(नदीम एस. अख्तर की फेसबुक वाल से)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.