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बबूल के पेड़ पर आम..

By   /  June 19, 2014  /  No Comments

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-तारकेश कुमार ओझा||

फिल्मों की दीवानगी के दौर में कई साल पहले एक बार प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर मेरे जिला मुख्यालय में कार्यक्रम देने आई, तो मेरे शहर के काफी लोग भी बाकायदा टिकट लेकर वहां कार्यक्रम देखने गए. लेकिन उनसे एक गड़बड़ हो गई. तब नामचीन कलाकारों के लिए किसी कार्यक्रम में तीन से चार घंटे लेट से पहुंचना मामूली बात थी. लिहाजा मेरे कुछ परिचितों ने सोचा कि क्यों न बहती गंगा में हाथ धोने की तर्ज पर कोई फिल्म भी देख ली जाए. कलाकार तो लेट आते ही हैं. समय का सदुपयोग हो जाएगा. लेकिन फिल्म देख कर निकलते समय उन्हें विपरीत दिशा से लौटती भीड़ नजर आई. पूछने पर पता चला कि लता मंगेशकर बिल्कुल निश्चित समय पर कार्यक्रम स्थल पर आई, और कुछ गाने गाकर लौट भी गई. यह जानकर फिल्म देख कर निकल रहे कलाप्रेमियों को मानो सांप सूंघ गया. उनकी टिकट बेकार गई और लोगों में जगहंसाई हुई, सो अलग.Preity-and-Ness-Wadia1

एक कलाकार की अनुशासनप्रियता के इस प्रसंग का उदाहरण मौजूदा दौर की फिल्म अभिनेत्री प्रीति जिंटा के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण हैं, जो इन दिनों एक अप्रिय घटना व विवादों के चलते चर्चा में है. यह नए जमाने का फंडा बन गया है कि तथाकथित बड़े लोग अपने लिए बिल्कुल उन्मुक्त और उच्श्रंखल जीवन चाहते हैं, लेकिन इसकी स्वाभाविक प्राप्ति होने पर आम इंसान की तरह बौखला भी उठते हैं.

यानी बबूल के पेड़ पर आम की तलाश करेंगे औऱ न मिलने पर हाय -तौबा मचाएंगे. क्या पता सब कुछ प्रचार पाने के लिए किया जाता हो. वैसे सच्चाई यही है कि प्रीति जिटा की कोई ज्यादा फिल्में नहीं चली. अपने कैरियर के शुरूआती दौर में प्रीति ने असम जाकर आतंकवादी संगठन उल्फा के खिलाफ कुछ बयान दे दिया, तो समाज के एक वर्ग ने उन्हें फौरन बहादुर लड़की का खिताब थमा दिया. एक सिगरेट कंपनी ने उन्हें बहादुरी का पुरस्कार भी दे डाला.

देश में होने वाली लोमहर्षक घटनाओं के दौरान प्रीति को मोमबत्ती लेकर चलते और मीडिया में बड़ी – बड़ी बातें करते हुए भी अक्सर देखा- सुना जाता है. वैसे उनकी चर्चा फिल्मों में अभिनय के लिए कम और अाइपीएल खेलों में उनकी भूमिका के लिए ज्यादा होती है. अपनी जीवन शैली से वे पेज थ्री कल्चर का खूब पोषण करती है. जिंटा विवाद के दूसरे पक्ष नेस वाडिया के साथ उनकी जो तस्वीरें मीडिय़ा में आ रही है, उससे पता चलता है कि उनके साथ प्रीति की कितनी नजदीकियां थी. एेसे में बदसलूकी का उनका आरोप रहस्यमय ही जान पड़ता है.

खैर रंगीन दुनिया के दूसरे विवादों की तरह जल्द ही यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा. लेकिन सच्चाई यही है कि प्रीति के अारोपों में सच्चाई होने या न होने के बावजूद इस प्रकरण से उन्हें जबरदस्त प्रचार जरूर मिल गया, जो समाज के लिए एक विडंबना ही है. क्योंकि तथाकथित सेलीब्रिटीज चर्चा में बने रहने के लिए गलत तरीके आजमाने लगे हैं. मी़डिया भी एेसे गाशिप्स को खूब हवा देता है. लेकिन मूर्ख तो बनती जनता ही है.

सबसे़ बड़ी बात यह कि यदि वाडिया ने सचमुच गलती की है तो यह गंभीर बात है और पुलिस इस मामले मे कारवाई करने में आखिर इतना समय क्यों ले रही है, क्या इसलिए कि मामला रईसजादे से जुड़ा है. क्या यही आरोप यदि किसी साधारण आदमी पर लगा होता तो क्या तब भी पुलिस कार्रवाई करने में इतना ही समय लेती. साधारण मामलो में तो पुलिस आरोपी पर तत्काल घरेलू हिसा या छेड़छाड़ का मामला दर्ज कर लेती है.

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  • Published: 3 years ago on June 19, 2014
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  • Last Modified: June 19, 2014 @ 2:42 pm
  • Filed Under: अपराध

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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