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आखिरकार ज़मानत करवा ली यशवंत सिन्हा ने मुख्यमंत्री पद के लिए..

By   /  June 19, 2014  /  1 Comment

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-रमन भारती||

अपने नाम पर आडवाणी के मुहर के बाद जमानत ले ली है. सिन्हा ने मीडिया के सामने आडवाणी से यह भी कहलवा लिया कि “यशवंत सिन्हा मुख्यमंत्री मेटेरियल हैं. उन्हें पार्टी की ‘बिजली आंदोलन’ को नेतृत्व करना चाहिए.”18-14-yashwant-sinha345-600

कई दिनों से मित्रगण पूछ रहे थे कि यशवंत सिन्हा को जेल जाने से क्या मिलने वाला है? सिन्हा जमानत क्यों नहीं ले रहे हैं? इसलिए मित्रों, अब स्थित साफ हो गई है. सिन्हा केन्द्रीय नेतृत्व से मुख्यमंत्री के लिए अपने नाम पर मुहर लगवाना चाहते थे. जो कि यह आडवाणी की ही रणनीति थी.

यह सही है कि भाजपा को झारखंड के मुख्यमंत्री के लिए पार्टी के मजबूत नेता का चेहरा चाहिए था. और सिन्हा एक मजबूत नेता और एक मजबूत मुख्यमंत्री के तौर पर उपयुक्त भी हैं. लेकिन इस नाटक की क्या जरूरत थी. झारखंड के लोग भाजपा की ओर सिन्हा को मुख्यमंत्री यूँ ही स्वीकार कर लेतें. पार्टी नेतृत्व एक बार नाम उछाल कर तो देखतें.

लबोलुआब यह है कि भाजपा में विश्वास की कमी है, और काँग्रेस में विश्वास आवश्यकता से अधिक है. अधिकता को तो पिछले साठ सालों में नहीं घटाया जा सका, लेकिन कमी को दूर करने की कोशिश होनी चाहिए.

 

(रमन भारती की फेसबुक वाल से)

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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. बढ़ती आयु ,चूकती शक्ति अपने खुद में ही अविश्वास पैदा कर देती है ,सिन्हा नियोजित तरीके से अब पारी खेल रहे हैं मोदी के बढ़ते प्रभाव को देख लोक सभा चुनाव से हाथ खींच बेटे को टिकट दिला जितवा स्थापित कर दिया और खुद को राज्य राजनीति में सक्रिय कर लिया आडवाणी ,जोशी की तुलना में इन्होने ज्यादा समझदारी से काम लिया यही राजनीतिक पैंतरेबाजी है

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