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मेरी पैदाइश की वजह मैं तो नहीं थी..

By   /  June 19, 2014  /  1 Comment

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मेरी पैदाइश की वजह मैं तो नहीं थी, जो मुझसे मेरा घर भी छीन लिया..
इस चित्र में दिखाई दे रही हर लडकी की यही सदा है..

मुंबई के कमाठीपुरा और पीला हाउस इत्यादि बदनाम इलाकों में बहुतेरी ऐसी लड़कियां हैं, जिन्हें ये भी नहीं पता कि उनका पिता कौन है..इन लड़कियों के बीच से निकली इन दस लड़कियों को महज़ इसलिए घर से निकाल फेंका गया है क्योंकि वे सेक्स वर्करों की लड़कियां हैं.. Find a safe home for teenage girls evicted in Mumbai
तेरह से उन्नीस साल की इन दस बच्चियों की सदा (आवाज़) आई है..

“I was thrown out of my house for no fault of mine.”

हम इनको इनके पिता से तो नहीं मिलवा सकते हैं, मगर इनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाने के साथ साथ इनको समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयत्न तो कर ही सकते है..
क्या हम सबको मिल कर सड़क पर फेंक दी गई इन दस बच्चियों की मदद करनी चाहिए..

यह लड़कियां एक याचिका के लिए हस्ताक्षर अभियान चला रहीं हैं.. इनकी मदद कीजिये अपना समर्थन देने के लिए.. इस याचिका पर हस्ताक्षर करें.. इसे समस्त हस्ताक्षरों सहित भारत की महिला और वाल विकास मंत्री मेनका गाँधी को भेजा जायेगा.. जानवरों से प्यार करने वाली मेनका इन ठुकराए हुए इंसानी बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करती हैं ये देखना दिलचस्प रहेगा..

https://www.change.org/en-IN/petitions/ms-maneka-gandhi-minister-of-women-child-development-maneka-gandhi-find-a-safe-home-for-teenage-girls-evicted-in-mumbai-findkrantiahome

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  • Published: 3 years ago on June 19, 2014
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  • Last Modified: June 19, 2014 @ 7:33 pm
  • Filed Under: देश

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

1 Comment

  1. चिंतनीय,समाज को खुद में झाँकने की ज़बरदस्त जरुरत आ गयी है

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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