/दवाओं की मंडी: दुकानदार मालामाल, ग्राहक खस्ताहाल

दवाओं की मंडी: दुकानदार मालामाल, ग्राहक खस्ताहाल

-नितीश के. सिंह||
भारत के हर शहर में लगभग एक बाज़ार ऐसा होता हैं जहां दवाओं की खरीद बिक्री होती है. ऐसे बाज़ार कुछ इस तरह से दवाओं को समर्पित होते हैं कि इन्हें दवाओं की मंडी कहा जाये तो गलत नहीं होगा. इन बाज़ारों में बड़े मुनाफे पर दवाएं बेचीं जाती हैं. इस बड़े मुनाफे में जहाँ विक्रेताओं का हाथ होता है वहीँ दवा निर्माता और बिक्री करने वाली कंपनियां भी महती भूमिका निभाती हैं.nppaindia.nic.in 12thPresentations 5CChinuShrisan.pdf

प्राइस comparison 2इस बारे में मीडिया अक्सर खबरें और जागरूकता अभियान सामने लता रहा है, लेकिन आज के दौर में जिस तरह से कॉर्पोरेट मीडिया हावी हो चुका है और सरोकारी मीडिया को पीछे छोड़ते हुए बाज़ार के साथ कदमताल कर रहा है ऐसे में दवा कंपनियों की मनमानी के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले किसी गैर-कॉर्पोरेट और गैर-सरकारी भोंपू की कमी महसूस होने लगी है. सरकारी तंत्र की सुस्ती उन्हें भी संशय के दायरे में लाती है.

भारत में गंभीर बिमारियों की स्थिति:
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सन 2004 में किये गए दस वर्षों में होने वाले मेडिकल सर्वे के अनुसार :
– संसार में क्षय रोग से ग्रसित लोगों में से एक तिहाई भारत में हैं. लगभग 15 करोड़.
– एचआईवी एड्स के लगभग आधे मरीज़ अपने देश में हैं. लगभग 3.5 करोड़
– श्वास सम्बंधित रोगों से हर साल 9.5 लाख से अधिक लोग मरते हैं देश में.
– डायरिया के लगभग 19 करोड़ मामले हैं देश में.
– डायबिटीज के मरीज़ दुनिया में सबसे अधिक संख्या में भारत में ही हैं.
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साथ ही ये भी ज्ञात है कि भारत में निम्न आय वर्ग ही सबसे अधिक जनसँख्याधारी है. ऐसे में इन बिमारियों के लिए दवाएं खरीदना इस वर्गे के लिए टेढ़ी खीर साबित होती है.
वर्ल्ड बैंक के अनुसार (2004 की रिपोर्ट) भारत जैसे विकासशील देश के निम्न आय वर्ग को गरीबी रेखा से ऊपर मानने के लिए लगभग डेढ़ हज़ार रूपए मासिक आमदनी होनी चाहिए.-
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ऐसे में ह्रदय रोग से ग्रसित किसी दिहाड़ी मजदूर जिसकी आमदनी लगभग सौ रूपए प्रतिदिन है, को अपनी दवाएं लेने के लिए न्यूनतम एक साल के आस पास काम करना पड़ेगा. इसी तरह भारत के मजदूर को एक पेरासिटामोल का पत्ता खरीदने के लिए लगभग एक से डेढ़ घंटे मजदूरी करनी पड़ती है.

ऐसे में सरकारी नियामको का इस और ध्यान एक बार फिर आना ज़रूरी सा लगता है. इनकी व्यस्तताओं के बीच प्राइवेट कंपनिया दाम बेतहाशा बढाती जा रही हैं और इलाज गरीबों की पहुँच से दूर होता जा रहा है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.