/‘उमेश- कार्तिक’ अब कैसे जाएं कलकत्ता…

‘उमेश- कार्तिक’ अब कैसे जाएं कलकत्ता…

-तारकेश कुमार ओझा||
किसी भी महानगर से उपनगरों की ओर जाने वाली ट्रेनों में मैले – कुचैले कपड़ों में भारी माल – आसबाब के साथ पसीने से तर – बतर दैनिक यात्री आपको सहज ही नजर आ जाएंगे. मेरे शहर से प्रतिदिन सैकड़ों लोग कोलकाता के लिए 116 किमी की एकतरफा दूरी तय कर अपने व परिवार के लिए किसी तरह रोजी – रोटी का जुगाड़़ करते हैं.jamshedpur kolkata

वैसे चंद यात्रा के लिए कोलकाता की दैनिक यात्रा करने वालों में जमशेदपुर के काफी लोग भी शामिल है. जबकि जमशेदपुर से कोलकाता की एक तरफ की दूरी लगभग 235 किमी है. रेलवे की भाषा में इन्हें डेली पैसेंजर कहा जाता है. उमेश – महेश जैसे नामों वाले इन दैनिक यात्रियों को साधारणतः कोई पसंद नहीं करता. क्योंकि इनकी सीट को लेकर अक्सर यात्रियों के साथ बकझक होती रहती है. यही नहीं अक्सर भारी माल – आसबाब से जुड़े नियमों को लेकर काले कोट वाले टिकट निरीक्षकों से लेकर खादी वाले आरपीएफ व जीअारपी के साथ भी इनकी अमूमन रोज ही ठनी रहती है.

देश की नई सरकार द्वारा रेलवे के किराए खास कर मासिक टिकटों की दर में लगभग दोगुनी वृद्धि से इस वर्ग पर मानो वज्रपात हुआ है. बेशक हर किसी की नजर में ये खटकें, लेकिन इनकी जिंदगी बड़ी कठिन होती है. क्योंकि चंद रुपयों के लिए भारी परेशानियों से गुजरने वाले इन दैनिक यात्रियों के लिए जिंदगी का हर कदम नई जंग के समान होता है. पांच परसेंट पर कार्य करने वाले ये दैनिक यात्री छोटे शहरों के बड़े दुकानदारों का माल बड़े शहरों से लाने का कार्य करते हैं.

हर दिन अहले सुबह उठ कर महाजनों से आर्डर लेना औऱ फिर ठसाठस भरी ट्रेन में सवार होकर महानगरों को जाना. वहां पहुंच कर खरीदारी से जुड़ी तमाम झंझटें. फिर उन्हें लाद – फांद कर वापसी का ट्रेन पकड़ने की आपाधापी. इस बीच उनकी कुलियों से लेकर आऱपीएफ व जीअारपी जवानों तथा ट्रेन टिकट निरीक्षकों के साथ अमूमन रोज ही भिड़ंत होती है. ट्रेनों में यात्री भी इन्हें पसंद नहीं करते. क्योंकि भारी माल – आसबाब के चलते वे उनके लिए असुविधाएं पैदा करते हैं. इस स्थिति में ये अमूमन रोज तीन से चार सौ किलोमीटर तक की रेल यात्रा करते हैं.

अपने शहर को लौटने के बाद भी इनका काम खत्म नहीं होता. महाजन तक माल पहुंचाने औऱ पूरा हिसाब देने के बाद ही उन्हें अपने हथेलियों पर अपनी कमाई नजर आ पाती है. जो उनके परिश्रम की तुलना में काफी कम होती है. विकल्प के अभाव में सैकड़ों एेसे लोग इस पेशे से जुड़े हुए हैं. रियायती दर पर उपलब्ध मासिक टिकट अब तक इनका बड़ा सहारा थी. जो नई सरकार ने इनसे छिन लिया. मोदी सरकार को कम से कम इस वर्ग का तो ख्याल रखना ही चाहिए था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.