/मोदी उवाच: हमें तो हनीमून पीरियड भी नहीं मिला..

मोदी उवाच: हमें तो हनीमून पीरियड भी नहीं मिला..

नरेंद्र मोदी सरकार ने गुरुवार को एक महीने पूरे कर लिये. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने ब्लॉग में लिखा कि हमने आज सरकार में एक महीने पूरे कर लिये हैं.narendramodi--621x414

इस अवसर पर मैं यह कहना चाहता हूं कि लोगों के सहयोग और प्रेम से हमें काम करने की प्रेरणा मिली है और हम कठिन परिश्रम करने के लिए प्रेरित हुए है. पिछले 67 वर्ष की सरकारों के कार्यकाल के मुकाबले यह एक माह कुछ भी नहीं है, इसलिए इसकी तुलना बेमानी है. लेकिन इस एक माह में हमारी सरकार ने हमेशा जनहित के बारे में सोचा और उसके लिए कार्य किया. हमने जो भी निर्णय किये उसका ध्येय सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रहित था.

जब एक माह पूर्व मैंने कमान संभाली थी, तो मुझे ऐसा लगा था कि मैं इस जगह के लिए नया हूं और कुछ लोगों को यह भी लगा था कि मुझे काम समझने में एक वर्ष से अधिक का समय लगेगा. लेकिन एक माह के अंदर ही मेरे दिमाग से यह बात निकल गयी और अब मेरा आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है.

मेरे सहयोगियों के सामूहिक अनुभव से मैंने काफी कुछ सीख लिया है. साथ ही चार बार के मुख्यमंत्री के रूप में मेरा जो अनुभव था, उसने भी मुझे काफी सहयोग दिया है. लोगों के प्रेम और अधिकारियों के विश्वास से भी मेरा आत्गविश्वास काफी बढ़ा है.

विगत कुछ दिनों में मैंने विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों से बातचीत की उन्होंने मुझे जो जानकारियां दी उससे सूचनाओं और योजनाओं का आदान-प्रदान हुआ, जिससे वह रोडमैप तैयार हुआ, जिसपर मंत्रालयों का कामकाज होना है.

मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि जब कोई नयी सरकार बनती है, तो उसके एक वर्ष के कार्यकाल को मीडिया हनीमून पीरियड करार देता है. पिछली सरकारों को इस हनीमून पीरियड का सुख मिला है.

लेकिन हमारी सरकार को यह सुख नहीं मिला है. हमारी सरकार की निंदा तो 100 दिन क्या 100 घंटे बाद ही होने लगी थी. लेकिन मैं यह मानता हूं कि जो देशहित के लिए काम करना चाहते हैं और जो उनके जीवन का लक्ष्य है, यह उनके लिए खास मायने नहीं रखता है.

अपनी सरकार के एक महीने के कार्यकाल का अनुभव लिखते वक्त मोदी ने इमरजेंसी को भी याद किया. उन्होंने ब्लॉग में लिखा है कि आज के ही दिन इमरजेंसी की घोषणा हुई थी. इससे संबंधित कई बातें मेरे स्मरण में हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.