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अन्ना हजारे कहाँ हो? पुकार रहे हैं मणिपुर वासी और इरोम शर्मिला

By   /  September 9, 2011  /  4 Comments

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-सलाम बिजेन सिंह ||
अन्ना हजारे के आंदोलन ने संसद को हिला दिया. सरकार अन्ना की आवाज़ अनसुना नहीं कर पाई, उसने अन्ना की मांग को गंभीरता से लिया और उस पर अमल भी करना शुरू कर दिया. पूरे देश की जनता ने अन्ना का साथ दिया. दो सप्ताह तक पूरा देश अन्नामय रहा. दूसरी तऱफ इरोम शर्मिला चनु हैं, जो पिछले 11 वर्षों से अहिंसात्मक तरीक़े से आमरण अनशन कर रही हैं, सेना के विशेषाधिकार क़ानून को मणिपुर से हटवाने के लिए. इस क़ानून की आड़ में सेना जो चाहे कर सकती है. थांगजम मनोरमा इस बात का जीता-जागता उदाहरण है. आतंकवादियों से कथित संबंधों के आरोप में सुरक्षाबल के जवान उसे घर से उठाकर ले गए और सामूहिक बलात्कार करने और मौत के घाट उतारने के बाद अगले दिन उसकी लाश घर के पास फेंक गए. मनोरमा को सात गोलियां मारी गईं. मनोरमा जैसे कई और उदाहरण हैं, जिन्हें लोग सुनना और जानना नहीं चाहते. इस घिनौनी हरकत के विरोध में पेबम चितरंजन नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता ने आत्मदाह कर दिया. वर्ष 1958 में यह क़ानून इस उद्देश्य के साथ लागू किया गया था कि नगालैंड में सशस्त्र विद्रोह का सामना करने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों को अधिक शक्तियां प्रदान की जा सकें. 1980 में यह क़ानून मणिपुर में भी लागू हो गया.

2 नवंबर, 2000 को असम रायफल्स के जवानों ने मणिपुर घाटी के मालोम क़स्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों को गोलियों से भून डाला. एक किशोर और एक बूढ़ी महिला को अपनी जान गंवानी पड़ी. हादसे की दर्दनाक तस्वीरें अगले दिन अख़बारों में छपीं. 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार एवं कवयित्री इरोम शर्मिला ने भी ये तस्वीरें देखीं. असम रायफल्स ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आत्मरक्षा के प्रयास में क्रॉस फायर के दौरान ये नागरिक मारे गए, लेकिन आक्रोशित नागरिक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे. इसकी अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि असम रायफल्स को अफसपा के तहत ओपन फायर के अधिकार हासिल थे. तभी से शर्मिला ने शपथ ली कि वह लोगों को इस क़ानून से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करेंगी. उनके सामने अनशन के अलावा और कोई चारा नहीं था. उन्होंने अपनी मां का आशीर्वाद लिया और 4 नवंबर, 2000 को अनशन शुरू कर दिया. एक दशक बीतने के बावजूद क़ानून यथावत लागू है और शर्मिला का अभियान भी जारी है.
मणिपुर वूमेन गन सरवाइवर्स नेटवर्क की संस्थापक महासचिव बीना लक्ष्मी नेप्रम कहती हैं कि अन्ना हजारे के आंदोलन को देखकर मणिपुर के हज़ारों युवाओं के दिल में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर शर्मिला के अहिंसात्मक आंदोलन को नज़रअंदाज़ क्यों किया जा रहा है. मणिपुर में भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार है. एक ओर देश की संसद लोगों को जीने का अधिकार देती है, मगर अफसपा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट) लोगों का वह अधिकार छीन लेता है. अगर केंद्र सरकार वाकई पूर्वोत्तर के लोगों की चिंता करती है तो उसे यह क़ानून हटा लेना चाहिए. मणिपुर में प्रतिदिन तीन-चार आदमी सेना की गोली का शिकार बनते हैं. लोग कहते हैं कि हमें अन्ना पर गर्व है. इस देश को उनकी ज़रूरत है. अन्ना इंफाल आएं और शर्मिला के आंदोलन का समर्थन करें.

सलाम बिजेन सिंह

शर्मिला का आंदोलन 11 साल से जारी है, मगर आज तक राज्य और केंद्र सरकार ने कोई पहल नहीं की. शर्मिला की मांग पर चर्चा क्यों नहीं हो रही है. 2005 में जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी भी इस क़ानून को दोषपूर्ण बता चुकी है. फिर भी सरकार ने चुप्पी साध रखी है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अनशन केवल उत्तर भारतीयों के लिए विरोध का हथियार है? अगर दो सप्ताह के अंदर ही सरकार और संसद अन्ना की मांग पर चर्चा करना ज़रूरी समझ लेती है तो उसे 11 सालों से अनशन कर रही शर्मिला की मांग ज़रूरी क्यों नहीं लगती? शर्मिला को बीते 30 अगस्त को एक मामले की सुनवाई के लिए अदालत आई थीं, तब उन्होंने कहा कि एक दिन मानवाधिकार हनन के ख़िला़फ मेरे संघर्ष और मांग को सरकार मान्यता देगी. उन्होंने कहा कि अन्ना मणिपुर आएं और यहां की स्थिति अपनी आंखों से देखें. शर्मिला के भाई सिंहजीत सिंह का कहना है कि सरकार शर्मिला की मांग को नहीं सुन रही है. शर्मिला आम लोगों की लड़ाई लड़ रही है. उसका अनशन अंतिम समय तक चलता रहेगा. मणिपुर के सांसद थोकचोम मैन्य सिंह कहते हैं कि 2005 में जस्टिस जीवन रेड्डी कमेटी ने कहा था कि अफसपा को हटाना ज़रूरी है. कई मंत्रियों ने भी इसका समर्थन किया. मैं हमेशा इस एक्ट को हटवाने के लिए अपील करता रहता हूं, मगर संसद में अकेला पड़ जाता हूं.
उत्तर-पूर्व को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार को वहां की जनता की भावनाओं को समझना होगा. एक अनुरोध अन्ना से भी है कि वह अब आप स़िर्फ महाराष्ट्र या उत्तर भारत के नहीं हैं, पूरा देश उनका है. वह शर्मिला का समर्थन करके यह दिखा दें कि आज भी भारत एक है, हम सब एक हैं. मणिपुर और शर्मिला को आपका इंतज़ार है अन्ना.
बकौल सलाम बिजेन सिंह उनके बारे में: ”अपने बारे में बताने के लिए कुछ खास नहीं है. क्‍योंकि कोई खास काम अब तक किया नहीं.पढ कर सीख रहा हूं… सीख कर पढ रहा हूं… सीखने और समझने में लगा हूं. साधारण रहना पसंद करता हूं. दुनिया टेढी और लोग अवसरवादी है. इस माहौल में खुद को ढालना आसान नहीं है. स्थितियों का सामना करना और उससे सीखना जितना कष्‍टकर लगता है उतना ही आनंददायी भी. फिलहाल अखबारी दुनिया का ज्ञान हासिल कर रहा हूं. वैसे मैं ईमानदारी चाहता हूं, मगर मिलती नहीं है..अपने ऊपर भरोसा है..सो आसपास के माहौल से सीख रहा हूं…खुद को सुधार रहा हूं..” साभार: http://www.blogger.com/profile/12959185585551907900
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About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

4 Comments

  1. Adv. Suresh Rao says:

    अन्ना जी को इसमें क्या फायदा होगा ये तो बताया नहीं किसी ने ……….फिर बी,जे.पी.से भी तो बात करनी पड़ेगी…यदि इस मामले में बी.जे.पी.का कोई इंटेरेस्ट है तभी वो अन्ना जी को इसमें कुछ करने के लिए बोल सकती है…….वरना हमें कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए……..में आपको विश्वास दिलाता ह्नु की अन्ना और उनकी टीम इसमें कुछ नहीं करेगी ……इतने बरसो से इरोम , एक ग्रेट सामाजिक कार्यकर्ता , पत्रकार और कवित्री अनशन कर रही है कहाँ थे इतने वर्षो से सब सामाजिक लोग ..जो आज भर्ष्टाचार की बात कर रहे है… , दो – दो आंख वाले अन्धो को दीखता नहीं ……….मणिपुर की समस्या इतने दिनों से चल रही …….इरोम संघर्ष कर रही है…….है कोई कुछ पूछने वाला ..नहीं……..

  2. gaurav says:

    bahut accha lega

  3. Deborah says:

    Very nice, i suggest webmaster can set up a forum, so that we can talk and communicate.

  4. nitin kamble says:

    भाई मई अपने पुरे दिल से शर्मीला जे का सपोर्ट करता हु और आना से गुजरिषा करता हु की वह भी इसे सपोर्ट करे जय हिंद .

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

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