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छात्र तो छात्र.. पैरेंट्स, बाप रे बाप..

By   /  June 28, 2014  /  No Comments

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-सतीश मिश्रा।।

देशभर में पिछले दस-बारह साल से एक अंधी दौड़ चल रही है, जिसकी न तो कोई मंजिल है और न ही कोई उद्देश्य, लेकिन लोग हैं कि बस भाग रहे हैं, भागते जा रहे हैं और भागते ही जा रहे हैं। यह आपाधापी शहर या कस्बों तक ही सीमित नहीं है बल्कि अब तो सुदूर के गांव भी इसमें शामिल हो चुके हैं। परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा अंक पाने की इस रेस में छात्र, पैरंट्स, स्कूल, कॉलेज, प्रिंसिपल, टीचर, कोचिंग क्लास, गाइड, बुक स्टोर्स, ट्यूशन सभी एक-दूसरे के ऊपर से कूदते-फांदते-लांघते चले जा रहे हैं। एक ऐसी दौड़ जिसमें न तो किसी को वर्तमान की चिंता है और न ही भविष्य की। ना जाने कहां जा कर ठहरेगा ये ग्राफ। बस एक लक्ष्य…दूसरों से आगे निकलना है। छात्र तो छात्र….पैरंट्स बाप रे बाप!! इसकी इन्तेहां है एसएससी और एचएससी परीक्षाएं। हाल यह है कि अंक देनेवाले बोर्ड भी एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में इसे खुलेआम लुटा रहे हैं। बोर्डों ने बच्चों के लिए गुरुकुल नहीं कुरुक्षेत्र तैयार किया है। मुंबई में आठवें दशक के मध्य तक बोर्ड परीक्षा का मतलब एक ही था यानी राज्य द्वारा संचालित माध्यमिक व उच्च माध्यमिक बोर्ड की परीक्षा। परंतु इसके बाद आर्थिक उदारीकरण के साथ पश्चिम से आए उपभोक्तावाद ने पढ़ाई को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया। अभिजात्य वर्ग से ताल्लुकात रखने की लालच में पैरंट्स ने पहले ICSE के बोर्ड को तरजीह दी और उसी प्रतिस्पर्धा से सामने आया CBSE हुई और इसके बाद तो ओपन स्कूल बोर्ड, IB जैसे कई बोर्ड कुकुरमुत्तों की तरह उग आए।2014-06-28 14.01.38

इसके बाद राज्य बोर्ड से बीस होने/दिखाने के लिए इन बोर्डों ने अपने बच्चों को ज्यादा अंक देने शुरू किए और यहीं बीमारी लाइलाज बनती गई। 80% से 90% और फिर 95% से होकर अब 99-100% पहुंचे अंकों की होड़ के कारण ऐसा कई बार हुआ है कि 95% से अधिक अंक पाने के बावजूद छात्र प्रवेश से वंचित रह जाते हैं। यह शिक्षा व्यवस्था का मजाक नहीं तो और क्या है? एक उदाहरण काफी है कि सन् 2008 के बाद से CBSE की 12वीं की परीक्षा में 95% से अधिक अंक पानेवाले छात्रों की संख्या में 2000% का इजाफा हुआ है। अच्छे स्कोर के कारण ICSE व CBSE के छात्र मुंबई के सभी टॉप कॉलेजों की अधिकांश सीटें पा लेते और राज्य बोर्ड के बच्चे (अधिकांशत: स्थानीय) नीला आकाश ही देखते रहते। तब सरकार ने कॉलेजों में ऐडमिशन का पैमाना पहले राज्य बोर्ड की प्राथमिकता, फिर पीसीएम के अंक, बाद में डोमिसाइल धारक और नवीनतम टॉप पांच विषय का एग्रीगेट जैसा आधार बनाया। लेकिन हर बार मामला कोर्ट में गया। क्लास में महीनों की देरी होती रही।

इस सबके लिए सरकार की ढुलमुल नीतियां जिम्मेदार हैं। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या होगा कि आजादी के 67 साल बाद तक देश में मेडिकल और इंजिनियरिंग प्रवेश परीक्षा के नॉर्म तय हो पाए हैं। सरकार की लचर नीतियों की बदौलत विभिन्न बोर्डों ने जिरॉक्स मशीन की तरह ले दनादन बच्चे पास कर आगे बढ़ा दिए लेकिन इसके बाद क्या? चूंकि हायर पढ़ाई के लिए सभी बच्चे पुराने और नामी कॉलेजों-संस्थानों में ही जाना चाहते हैं इसलिए कमी की आड़ में भ्रष्टाचार भस्मासुर बन गया। विभिन्न स्कूल बोर्डों की इजाजत देने से शुरू हुआ शैक्षणिक भ्रष्टाचार UGC पहुंचते-पहुंचते लावा उगलने लगा। आज दिल्ली यूनिवर्सिटी में फैले पैरालिसिस में सबसे बड़ा योगदान UGC का ही है। अंदाज लगाइए UGC के भ्रष्टाचार का कि उसने इस साल से 10+2 के बाद सीधे एमएससी करने की इजाजत दे दी है। यह कदम केवल बीएससी को ही अर्थहीन नहीं बनाता बल्कि हमारे पूरे शैक्षणिक ढ़ांचे का मखौल उड़ाता है, ऐसे में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की क्या बात करें? UGC भ्रष्टाचार वायरस फैलाने की मशीन बन गई है लेकिन उसको भंग कर देना ही समाधान नहीं है, पहले जरूरत है ठोस राष्ट्रव्यापी विकल्प तैयार करने की।

चलते चलाते

विकास के पापा की नजर यूं तो बड़ी शार्प कही जाती है लेकिन अरबपति चीनी मिल मालिकों को 0% पर कर्ज देने की घोषणा करने के बाद क्या एक बार भी उन्हें खयाल नहीं आया कि मौसम के मिजाज पर जीनेवाले विपन्न गन्ना किसान किस तरह 14% का ब्याज़ चुका पाएंगे जबकि आपने दोनों को एकसमान ‘किसान’ श्रेणी में रखा है?

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  • Published: 3 years ago on June 28, 2014
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  • Last Modified: June 28, 2014 @ 2:03 pm
  • Filed Under: शिक्षा

About the author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक “मुखौटों के पीछे – असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष” में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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