/व्यापमं घोटाला: सुधीर शर्मा कौन है और अब तक आजाद कैसे..

व्यापमं घोटाला: सुधीर शर्मा कौन है और अब तक आजाद कैसे..

मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले के लिए ढेरों गिरफ्तारियां कर चुकी स्पेशल टास्क फ़ोर्स इस मामले के प्रमुख आरोपियों में से एक खनन कारोबारी सुधीर शर्मा के आगे बेबस दिख रही है. अब तक की कार्यवाही को देखते हुए यही का जा सकता कि शर्मा को लेकर एसटीएफ का रवैया ढुलमुल ही रहा है. पहले शर्मा को सिर्फ नोटिस दिया गया, लेकिन हाई कोर्ट की फटकार के बाद शर्मा पर पांच हज़ार का इनाम घोषित कर फ़र्ज़ की इतिश्री कर ली गयी है. शर्मा भले ही कागज़ी तौर पर फरार हो, लेकिन अपना चार हज़ार करोड़ का कारोबार बिना किसी रोकटोक के संभाल रहा है.sudheer

शर्मा की कंपनियां ये हैं : एसआर फेरो एलॉयज लिमिटेड, श्याम रिफ्रेक्टिरीज लिमिटेड, एसआर सिरेमिक एंड रिफ्रेक्टिरिज प्रा. लि., एसआर फार्मूलेशन इंडिया प्रा. लि., एसआर सिंह एंड कंपनी प्रा. लि., शिवालिका मिनरल्स जबलपुर, आर्चिड बायोटैक प्रा. लि., विद्या निकेतन समिति-वीएनएस ग्रुप का शिक्षण संस्थान और उत्तम एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड (इन कंपनियों का राजफाश 20 जून 2012 को इनकम टैक्स के छापे में हुआ था. हालांकि शर्मा ने विभाग की अप्रेजल रिपोर्ट में खुद की संपति के अनुमान को गलत बताया था.)

पिछले बीस सालों के अन्दर आम आदमी से मोटा असामी बने शर्मा ने शुरुआत विदिशा के एक कॉलेज में संविदा के आधार पर अस्सिटेंट प्रोफेसर के रूप में की थी, लेकिन बहुत जल्दी ही वो बेशुमार दौलत का मैल्क बन गया. विदिशा में वो सिरोंज के तत्कालीन विधायक लक्ष्मीकांत का करीबी बना. फिर उसने भोपाल में एक कॉलेज में नियुक्ति हासिल की. बाद में वो शर्मा का निजी सचिव बना. 2006 में उसने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह से खनन कारोबार में सक्रिय हो गया. सभी बड़े शहरों में संपत्तियां बनायीं जिनकी कीमत आयकर विभाग ने करोड़ों में आंकी है. दो साल पहले जब इनकम टैक्स अधिकारियों ने उसके ठिकानों पर दबिश दी तो सुधीर के पास चार हजार करोड़ रुपए की संपति होने का अनुमान जताया. छापे के दौरान शर्मा के घर से ही तीन करोड़ रुपए नगद मिले थे.

अब तक पुलिस की पकड़ से बचने के बाबत जानकारों का कहना है कि ऐसा बिना किसी राजनैतिक संरक्षण के असंभव है. इतनी बड़ी संपत्ति के मालिक का ऐसे फरार होना मुमकिन नहीं है. करीबियों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शर्मा अभी भी भोपाल आता जाता रहता है. एसटीएफ के अधिकारी भी इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी देने की स्थिति में नहीं दिख रहे, साथ ही ये बताने में असमर्थ हैं कि दो बार पूछताछ के लिए बुलाने पर हाजिर होने के बावजूद शर्मा की गिरफ़्तारी क्यों नहीं हुयी. दिसंबर 2013 में शर्मा के खिलाफ व्यापमं की सब इंस्पेक्टर, दुग्ध संघ और अन्य परीक्षाओं में गड़बड़ी के मामले में एसटीएफ ने एफआईआर दर्ज की थी. इसके बाद उसे दिसंबर 2013 व मार्च 2014 में दो बार पूछताछ के लिए बुलाया गया. इसके बाद एसटीएफ ने उसे तीन और नोटिस जारी किए, लेकिन शर्मा हाजिर नहीं हुआ.

सत्ता के गलियारों में तीखी दखल रखने वाले शर्मा को क्या सच में एसटीएफ गिरफ्तार करना चाहती है, इस पर सवाल उठने शुरू हो चुके हैं. ऐसा इसलिए होना स्वाभाविक है क्यों कि सुबूतों के आभाव में एसटीएफ़ ने शर्मा को सिर्फ पूछताछ कर के छोड़ दिया जबकि ठीक उसी समय पूरे प्रदेश से अधिकारीयों, छात्रों और अभिभावकों की गिरफ्तारियां हो रही थी.

इस पूरे मामले में शर्मा अहम् कड़ी है. सरकारी लोगों को भुगतान शर्मा के माध्यम से किया जाता था. सुधीर की व्यापमं के तत्कालीन प्रिंसिपल सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा से अच्छी पहचान थी. इस पहचान का इस्तेमाल कर के ही शर्मा ने इतनी भर्तियाँ करवायीं. जोगिंदर सिंह, पूर्व निदेशक, सीबीआई का कहना है कि हर व्यक्ति अपनी संपत्ति कुर्क होने से डरता है. ऐसे में कड़ी कार्यवाही का डर शर्मा को गिरफ्तार करवा सकता है. शर्मा को निश्चय ही राजनैतिक संरक्षण मुहैया करवाया जा रहा है जिससे वो अब तक गिफ्तारी से बचा हुआ है.
करोड़ों रुपए का कारोबार चलाने वाले व्यक्ति के संबंध में पता न लगने की बात गले से नहीं उतरती। एसटीएफ सही इंटेलीजेंस का उपयोग करे तो उसे गिरफ्तार करना मुश्किल नहीं है। पुलिस के पास गिरफ्तारी के लिए और भी तरीके होते हैं।” अरूण गुर्टू, पूर्व डीजीपी, म.प्र.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.