कृपया अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे [email protected] पर भेजें | इस वेबसाइट पर प्रकाशित लेख लेखकों, ब्लॉगरों और संवाद सूत्रों के निजी विचार हैं। मीडिया के हर पहलू को जनता के दरबार में ला खड़ा करने के लिए यह एक सार्वजनिक मंच है। पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं। हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो। आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें -मॉडरेटर

साईं बाबा ही नहीं, स्वामीनारायण उर्फ़ घनश्याम पांडे भी “भगवान” नहीं थे..

2
Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

-अभिरंजन कुमार।।

साईं बाबा भगवान नहीं थे- यह तो तय है और इसीलिए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की कई “दलीलों” से सहमत नहीं होते हुए भी “तथ्य” के आधार पर मैंने उनका समर्थन किया। एक और तथाकथित “भगवान” हैं- स्वामीनारायण संप्रदाय के घनश्याम पांडे उर्फ नीलकंठवर्णी उर्फ सहजानंद स्वामी (2 अप्रैल 1781 – 1 जून 1830), जिनके अनुयायी उन्हें “भगवान स्वामीनारायण” मानते हुए उनकी पूजा करते हैं। अक्षरधाम मंदिर के नाम से गुजरात और दिल्ली में उनके बड़े मंदिर हैं।स्वामीनारायण उर्फ़ घनश्याम पांडे

दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर मैंने भी देखा है। यमुना के तट पर बने इस मंदिर का परिसर सौ एकड़ में फैला है और यह दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर परिसर है। गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी इसे दुनिया के सबसे बड़े मंदिर परिसर के तौर पर मान्यता दी है। इस मंदिर के गर्भगृह में स्वामीनारायण जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है, जबकि हिन्दू धर्म के दूसरे तमाम स्थापित देवी-देवताओं (जिनका शास्त्रो में वर्णन है) की छोटी-छोटी प्रतिमाएं इस तरह स्थापित हैं, जैसे वे सभी उनके मातहत कर्मचारी हों।

घनश्याम पांडे जी ने अच्छे काम किए होंगे और उम्दा संत रहे होंगे, इस बात से मुझे इनकार नहीं है और उनके लिए मान-सम्मान में भी कोई कमी नहीं है, लेकिन आर्य समाज के संस्थापक और महान समाज-सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी उन्हें “भगवान” मानने से इनकार किया था। क्या विडंबना है कि जिन लोगों ने देश और समाज के लिए ज़्यादा बड़े काम किये, उन्होंने कभी अपने को “भगवान” साबित करने की कोशिश नहीं की। तुलसी, सूर, कबीर और रविदास से लेकर ख़ुद दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय और महात्मा गांधी तक इसके ज्वलंत प्रमाण हैं।

“भगवान” कहलाये वे, जिन्होंने वस्तुतः देश और समाज का उद्धार कम किया और अंधविश्वास ज़्यादा फैलाया, मठों का विस्तार ज़्यादा किया, धन-सम्पत्ति ज़्यादा इकट्ठी की, तिकड़मियों, लैंड ग्रैवरों और ब्लैक मनी मेकरों के प्रति अधिक कृपालु रहे। मुझे यह भी समझ नहीं आता कि पिछले 100-200 साल में वो कौन-सा “वायरस” चला, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में संतों-आचार्यों-गुरुओं-बाबाओं के सिर पर “भगवान” बनने का “भूत” सवार हो गया?

आजकल भगवान और बाबा तो ऐसे पैदा हो रहे हैं, जैसे कुकुरमुत्ते पैदा होते हैं। और साफ़गोई से कहूं तो ये सारे भगवान और बाबा मुझे धर्म के गोबर पर उग आए गोबरछत्तों की तरह लगते हैं। इनमें से कई भगवान और बाबा तो तमाम तरह के धत्कर्मों में लिप्त रहते हैं, लेकिन आस्था के सम्मान के नाम पर और भावनाएं आहत होने के डर से आप इनके ख़िलाफ़ एक लफ़्ज़ भी नहीं बोल सकते।

मेरा स्पष्ट मानना है कि इस वक़्त देश को वह फ़र्ज़ी भगवान नहीं चाहिए, जिसके नाम पर तमाम तरह के धत्कर्म, मनी मेकिंग और लैंड ग्रैविंग के खेल चल रहे हों, बल्कि वह नायक चाहिए, जो लोगों को गरीबी, मुफलिसी, अशिक्षा, बेरोज़गारी और अंधविश्वास से मुक्ति दिलाए, उसे सही रास्ते पर ले जाए, उसकी ऊर्जा को देश के विकास के लिए केंद्रित करे। सॉरी, मैं धर्म का ज्ञाता नहीं हूं… इसके बावजूद मैंने कुछ कटु वचन कहे हैं। आशा करता हूं कि मित्र लोग बुरा मानने की बजाय मेरी बातों को सही संदर्भ में समझने की कोशिश करेंगे।

Facebook Comments
Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

संबंधित खबरें:

  • संबंधित खबरें उपलब्ध नहीं
Share.

About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

2 Comments

  1. सब पैसे और ठसक का खेल है ,मठों , मंदिरों में बैठे ये खाली लोग बेमतलब की बातें कर समाज में दूरियां बढ़ाते हैं ,कौन किसे पूजे यह उसकी निजता है। सरकार को देश में हर व्यक्ति के लिए काम करना अनिवार्य है ऐसा कानून बनाना चाहिए इन सब से खेतों में काम कराया जाये या अन्य शारीरिक श्रम , ताकि न तो इन फालतू बातों के लिए समय होगा न ये बकवास किसे गंगा में नहाने का हक़ है ?किसकी पूजा की जाये किसकी न की जाये यह सलाह देने वाले वे कौन होते हैं श्रम से इनका स्वास्थय भी ठीक रहेगा व राष्ट्र के विकास में योगदान भी

  2. सब पैसे और ठसक का खेल है ,मठों , मंदिरों में बैठे ये खाली लोग बेमतलब की बातें कर समाज में दूरियां बढ़ाते हैं ,कौन किसे पूजे यह उसकी निजता है।

पाठक चाहे आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं. हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो. आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें - मॉडरेटर

%d bloggers like this: