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मवेशी, रसायन, पर्यावरण और हम..

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-अर्नेस्ट एल्बर्ट||

हममे से ज़्यादातर लोग ग्वालों से दूध लेते हैं, इस उम्मीद में कि घर पर आने वाला दूध अच्छा और स्वाथ्यवर्धक होगा. लेकिन हकीकत कुछ और ही है. हर छोटे ग्वाले के पास दो-तीन गाय या भैंसे होतीं हैं. इन भैंसों को रोजाना दूध निकालने से ठीक दो मिनट पहले ओक्सिटोक्सिन नाम का इंजेक्शन मवेशी को लगाया जाता है. ये टीकाकरण रोज़ दिन में दो बार होता है. ये टीके एक किस्म की वियाग्रा होते हैं जिनका इस्तेमाल फटाफट और अधिक मात्र में दूध निकालने के लिए किया जाता है. टीका लगते ही गाय भैंस के थन फूल जाते हैं जो छः से सात महीनों के बाद लगभग स्थायी तौर पर सूज जाते हैं. उनमे पस (मवाद) भर जाता है जो दूध दुहते समय नीचे बर्तन ही में टपकता है. मवेशी को कितनी तकलीफ होती होगी इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं. दर्द बहुत ज्यादा हो जाता है, कभी कभी तो छटपटाहट की हद्द तक, इसलि कईयों की टांगें बांधनी पड़ती हैं. इसीलिए आम लोगों को किसी डेयरी के अन्दर आसानी से प्रवेश नहीं करने दिया जाता है. Mastitis (मेस्टटाइटिस), थन-सूजन से संक्रमण (इन्फेक्शन) हो जाता है.

देखिये इस ग्वाले को जो टीका milk2लगा रहा है, उसे कोई परवाह नहीं की टीका लगाने से पहले वहां लगे गोबर को साफ़ कर ले. एक टीके की कीमत एक रुपये से कम होती है और एक टीका चार मवेशियों को देने के लिए काफी होता है. यहाँ तक कि चारों मवेशियों के लिए वही एक सिरिंज. यही टीके मवेशी के अंदर ज़हर बनाते जाते हैं. ज्ञात हो कि की इस ओक्सीटोक्सिन टीके का और गिद्धों के विलुप्त होने की कागार पर आने का सीधा ताल्लुक है. ये असंख्य टीके लगे मवेशी जब मरते हैं तो इनकी लाशों की सफाई गिद्ध किया करते है, नोच नोच कर सारा मांस खा जाते हैं. बस हड्डीयां बची रहती हैं. गिद्ध हमारे मित्र पक्षी के रूप में पर्यावरण को साफ़ रखते थे. अब ओक्सीटोक्सिन वाली लाशों को खाते हैं और मर जाते है. गिद्धों के विलुप्त होने का क्रम और ओक्सीटोक्सिन के बाज़ार में आने का समय लगभग एक ही है. मानसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ (अब तो लोकल भी) इन सस्ते टीकों को दशकों से खुलेआम बेरोकटोक बेच रहीं जबकी ये फूड एंड ड्रग अडल्टरेशन एक्ट/ प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनिमल्ज़ एक्ट 1960 के तहत गैरकानूनी है.
[slideshow_deploy id=’27704′] मेरे क्षेत्र के कुछ उत्साही युवाओं ने इसके विरूद्ध एक जागरूकता अभियान चलाया लेकिन ख़ास फर्क नहीं पड़ा. कुछ दोस्त हैं जो लामबन्द हो कर भी कुछ न कर पाये तो उस स्तिथि में गांवों डेरियों के नज़दीक पड़ती केमिस्ट की दुकानों से आक्सीटॉक्सिन टीकों के सारे डिब्बे खरीद ले जाते है ताकि डेरी वालों को, ग्वालों को मुहय्या ही न हों. उनको मेरा सलाम. अब आगे क्या करना है क्या नहीं, ये आपको तय करना है.

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About Author

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

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