/नरेगा कानून को योजना बनाने के मुख्यमंत्री राजे के पत्र से सहमत नहीं जनसंगठन, आन्दोलन करेंगे

नरेगा कानून को योजना बनाने के मुख्यमंत्री राजे के पत्र से सहमत नहीं जनसंगठन, आन्दोलन करेंगे

कानून ही रहे नरेगा, स्कीम नहीं स्वीकार –निखिल डे

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून को बदल कर योजना कर देने सम्बन्धी मुख्यमंत्री वसुंधराराजे के प्रस्ताव पर सूचना एवं रोजगार का अधिकार अभियान ने कड़ी आपत्ति करते हुए चेतावनी दी है कि नरेगा कानून ही रहे. अगर उसे योजना बनाने की कोशिश की जाएगी तो वह स्वीकार्य नहीं होगा. इसके खिलाफ राज्य व्यापी आन्दोलन किया जायेगा.
उल्लेखनीय है कि राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे ने एक पत्र केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी को लिख कर सुझाव दिया है कि नरेगा को एक कानून के बजाय स्कीम बना कर चलाया जाना चाहिए .श्रीमती राजे लिखती है कि –क्यों रोजगार गारंटी एक कानून से ही मिलनी चाहिए और क्यों इस रोज़गार की उत्पत्ति. बल्कि गारंटी. एक स्कीम सुनिश्चित नहीं कर सकता है. कानून के शायद ही कोई फायदे है सिवाय इसके कि विभिन्न प्रकार की संस्थाओं को इसके ज़रिये मुकदमेबाजी करने का मौका मिल जायेगा .इसे राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी स्कीम होना चाहिए या राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कानून. यह बहस और चर्चा का विषय है.IMG_20140704_144853

राजस्थान रोजगार गारंटी परिषद् के सदस्य एवं सूचना रोजगार अधिकार अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने आज जयपुर में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री राजे की इस मंशा पर सवाल उठाते हुए साफ तौर पर कहा कि नरेगा एक कानून है जो मजदूरों को काम का कानूनी अधिकार देता है और सरकार को जवाबदेह बनाता है. जबकि उसे अगर एक स्कीम बनाया गया तो इसके बाद राज्य की कोई जवाबदेही नहीं रहेगी .उन्होंने कहा कि यह कहना निराधार है कि कानून होने से मुकदमेबाजी का मौका मिलेगा. सरकार अगर 50 लाख सक्रीय जोबकार्ड धारको को रोजगार मुहैय्या करने की अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहेगी तो लोग उससे जवाबदेही मांगेगे और अपना हक लड़ कर भी लेंगे. अधिकार पाने की इस लड़ाई को मुकदमेबाजी कह कर बचा नहीं जा सकता है .निखिल डे का यह भी कहना था कि मुख्यमंत्री का यह प्रयास राज्य के विकास को पीछे धकेलने वाला है तथा गरीब ग्रामीण मजदूरों के खिलाफ है. जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है. हम वसुंधरा की चिट्ठी को गाँव गाँव ले जायेंगे और जनता की ताकत से नरेगा को बचाने के लिए आन्दोलन करेंगे.

इस मौके पर पी यू सी एल की महासचिव कविता श्रीवास्तव ने कहा कि सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने घोषणापत्र में नरेगा की प्रसंशा की थी और निरंतर यह कहा जाता रहा है कि जन कल्याणकारी कार्यक्रम बंद नहीं किये जायेंगे. लेकिन मुख्यमंत्री राजे का यह प्रस्ताव बढती हुयी मंहगाई और अकाल की आशंका से जूझ रहे राज्य के गरीब मजदूरों के जीने की आशा को ही ख़तम करने वाला है. उनका कहना था कि राज्य में नरेगा में 90 प्रतिशत महिलाएं काम पर जाती है. उनके हाथ में थोड़ी पूंजी आ रही है. जिसे भी यह सरकार छीनना चाहती है .

हरमाड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच नौरती बाई ने मुख्यमंत्री से जानना चाहा कि नरेगा कानून ही बना रहे तो इससे सरकार का क्या नुकसान हो जायेगा ?उन्होंने कहा कि नरेगा किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है. यह गरीबों के लिए जीने का सहारा बन गया है. उनको भरपेट खाना अपने ही गाँव में मिलने लगा है. सरकार मजदूरों के मुंह का निवाला भी छीनना चाहती है. जनचेतना मंच की कार्यकर्त्ता ऋचा का मानना था कि अगर यह एक स्कीम बन गयी तो नरेगा में रोजगार की गारंटी रह ही नहीं जाएगी. उदयपुर आस्था के अश्विनी पालीवाल ने कहा कि नरेगा लोगों को रोजगार का हक देता है. जिसे स्कीम बना कर कम नहीं किया जा सकता है. यह मजदूर विरोधी निर्णय होगा .

इस अवसर पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ विजय शंकर व्यास का लिखित वक्तव्य भी पढ़ कर सुनाया गया. जिसमे उन्होंने नरेगा को राज्य का एक उत्कृष्ट और संवेदनशील उदहारण बताते हुए कहा कि बिना व्यापक विचार विमर्श के कोई भी बदलाव नरेगा को कमजोर और निष्क्रिय कर सकता है जो यह दिखायेगा कि सरकार लोगों को रोजगार का अधिकार देने की प्रतिबद्धता से भाग रही है .
सूचना एवं रोजगार का अधिकार अभियान की ओर से आज स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राजस्थान नरेगा की जन्म स्थली है. यहाँ अक्सर अकाल पड़ते रहता है. लोगों को रोजगार की बहुत जरुरत रहती है. ऐसे में राज्य की मुखिया का यह प्रस्ताव निश्चित रूप से गंभीर चिंता का विषय है. सरकार ने कई मौकों पर यह कहा है कि राशन. पेंशन और नरेगा में कटौती नहीं की जाएगी. बल्कि इसमे सुधार लाया जायेगा और अब सरकार अपने ही वादे से मुकर रही है. जिसे स्वीकार नहीं किया जायेगा .इसके खिलाफ आन्दोलन किया जायेगा .जनसंगठनों का कहना था कि नरेगा में 90 प्रतिशत धन केंद्र से आता है. जो कि रोजगार गारंटी के एक कानून होने की वजह से यह कानूनी बाध्यता है लेकिन अगर नरेगा को सिर्फ योजना बना दिया गया तो यह बाध्यता खत्म हो जाएगी. जिसके चलते राज्य को हजारो करोड़ का नुकसान होगा और लाखों गरीब मजदूर रोजगार के हक से वंचित हो जायेंगे .

भंवर मेघवंशी /कमल टांक/मुकेश गोस्वामी
( सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान राजस्थान )

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.